मॉब लिंचिंग : तो राजनाथ जी 1984 जैसी किसी वारदात का इन्तजार कर रहे हैं ?

मॉब लिंचिंग को लेकर हमारा और हमारी सरकार का नजरिया बेहद अफसोसनाक है. सरकार समस्या का समाधान खोजने के बजाये तुलना पर आमादा है, इससे स्थिति और गंभीर हो रही है...

तो राजनाथ जी 1984 जैसी किसी वारदात का इन्तजार कर रहे हैं ?

भीड़, हत्या और राजनीति

राकेश अचल

भीड़ द्वारा किसी भी आरोपी को पीट-पीट कर मार डालना अब नया सियासी मुहावरा बन गया है. अराजक भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याएं ''मॉब लिंचिंग'' कही जाती हैं. इन दिनों सड़क से संसद तक ये मुहावरा जेरे बहस है लेकिन उपाय किसी के पास नहीं है. भारत में मॉब लिंचिंग का कोई बहुत पुराना इतिहास नहीं है लेकिन देश के गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह के मुताबिक़ देश में सबसे बड़ी मॉब लिंचिंग 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुई थी.

भारत में भीड़ के हाथ में क़ानून पता नहीं कबसे है लेकिन दुनिया में ये मानसिकता दक्षिण अफ्रीकी देशों में सबसे पहले आयी और दुर्भाग्य ये है कि आज हम भी इस जंगली, पाश्विक, वीभत्स मानसिकता के शिकार हैं. अफ्रीका में जब गोरों ने कालों पर अपना राज कायम करने के लिए मनमाने संविधान बनाये तब रंगभेद के आधार पर भीड़ अराजक हुई. भीड़ अपने शत्रु को पकड़ती और फांसी देकर मार डालती। अमरीकियों, मैक्सिकोवासियों के बाद एशिया में भी भीड़ की यही हत्यारी मानसिकता विस्तार पाती गयी और आज ये एक राजनीतिक शक्ल अख्तयार कर चुकी है.

देश की संसद में हिन्दुस्तान के लिनचिस्तान में बदलने की आशंकाएं जताई जा रहीं हैं. दुर्भाग्य ये है कि जहां -जहां ये वारदातें हुईं हैं वहां-वहां भाजपा की सरकारें हैं, मारे जाने वाले लोग अल्पसंख्यक और महिलाएं हैं. किसी को गोरक्षक मार रहे हैं तो किसी को समाज के ठेकेदार. क़ानून मुंह बाएं खड़ा हुआ है और हमारे जिम्मेदार मंत्री कहते हैं कि ये कोई नई बात नहीं है.

गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह के बयान से तो लगता है कि जैसे सरकार देश में 1984 में कथित रूप से हुयी मॉब लिंचिंग जैसी किसी भयावह वारदात का इन्तजार कर रही है.

दो अलग अपराध हैं दंगे और मॉब लिंचिंग

राजनीतिक नजरिये से अगर बात होती है तो फिर गड़े हुए मुर्दे उखाड़े जाने लगते हैं. भाजपा अगर कांग्रेस को 1984 के दंगों को लेकर लांछित करती है तो गैर भाजपा दल 2002 में गुजरात में हुए दंगों के लिए भाजपा को निशाने पर लेते हैं. आरोप-प्रत्यारोपों के बीच कोई ये समझने को राजी नहीं कि दंगे और मॉब लिंचिंग दो अलग अपराध हैं.

मॉब लिंचिंग को लेकर हमारा और हमारी सरकार का नजरिया बेहद अफसोसनाक है. सरकार समस्या का समाधान खोजने के बजाये तुलना पर आमादा है, इससे स्थिति और गंभीर हो रही है. परोक्ष रूप से हत्यारी भीड़ को सरकार का संरक्षण मिल रहा है. बात की जा रही है की मॉब लिंचिंग रोकने के लिए नए और प्रभावी क़ानून की जरूरत है, लेकिन मै कहता हूँ की हमारे पास आज जो भी क़ानून मौजूद हैं. वे ही इसे रोकने के लिए पर्याप्त हैं, सरकार एक बार मौजूदा कानूनों का इस्तेमाल तो होने दे. इसी साल देश में दलितों के भारत बंद के दौरान भी एक तरह से मॉब लिंचिंग हुयी लेकिन कहीं किसी अपराधी के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की गयी.

देश में मॉब लिंचिंग के अलावा अन्य जघन्य अपराधों को रोकने के लिए पहले से अनेक क़ानून मौजूद हैं. नए क़ानून भी बनते-बिगड़ते रहते हैं लेकिन न सामूहिक बलात्कारों पर लगाम लग रही है न आर्थिक घोटालों पर. क़ानून को धता दिखार आरोपी मजे से खुले घूम रहे हैं. जमानतें मिल जाएँ तो सत्तारूढ़ दल के मंत्री ऐसे लोगों का हार-फूल पहनाकर अभिनंदन करते हैं, ऐसे में क़ानून किसी का क्या बिगाड़ लेगा ?

अराजक भीड़ को कानून के सहारे ही काबू में लाया जा सकता है, सरकार को इसके लिए क़ानून को आजाद छोड़ना होगा, राजनीतिक दखल पूरी तरह से बंद करना होगा, जब तक ये नहीं होगा कोई मॉब लिंचिंग नहीं रुकने वाली. मॉब लिंचिंग केवल सड़क पर पीट-पीट कर हत्या करना ही नहीं, सामूहिक बलात्कार भी मॉब लिंचिंग है, तमाम बाबाओं के जेल जाने के बाद भी तमाम रसूखदार बाबा कानूनों को ठेंगा दिखाकर आजाद घूम रहे हैं, मॉब लिंचिंग में शामिल लोगों का सार्वजनिक अभिनंदन हो रहा है,

मॉब लिंचिंग पर भाजपा का रवैया जितना लिजलिजा है कांग्रेस का रवैया भी उतना आक्रामक नहीं है. छोटे दल और क्षेत्रीय दल भी इस मुद्दे पर संगठित नजर नहीं आते,जबकि जरूरत इस बात की है की इस मुद्दे पर पूरा देश एक हो और सरकार को इस तरह की बीभत्स वारदातों को पूरी तरह से रोकने के लिए बाध्य करे.

यदि आप सभी को ये सही लगता है तो मुझे मॉब लिंचिंग के बारे में कुछ नहीं कहना ,अगर आप सब मेरी बात से सहमत हैं तो आगे आइये, जनमानस को अराजक भीड़ से अलग कीजिये, क़ानून को स्मार्थन दीजिये ताकि ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण वारदातें बंद हों. ऐसी वारदातों से विश्व गुरु बनने का दावा करने वाले भारत की पूरी दुनिया में बदनामी होती है.

दुनिया के बहुत से देश जो गरीब हैं, अशिक्षित हैं, अविकसित हैं, जहाँ दो जून की रोटी आसानी से नसीब नहीं है, जहां जिस्मफरोशी अघोषित रूप से वैध कारोबार है। उन देशों में भी भारत की तरह मॉब लिंचिंग नहीं होती, और अगर दुर्भाग्य से हो भी जाये तो आरोपियों को ऐसी सजा दी जाती है कि उसकी नजीर युगों तक दी जाती है.

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