मोदीभक्त गुप्ता जी को पता है योगी अगली बार मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे और यू पी में भाजपा की भयंकर हार होने वाली है

धर्म में धंधेबाज आज इज्जत से टी वी पर आ रहे हैं, हम लुट रहे हैं. लोग कर्ज लेकर बाबाओं के पास जाते हैं और कर्ज में डूबने पर गुप्ता जी के पास आते हैं. कर्ज का एक साइकिल है वो ख़त्म नहीं होता....

Vidya Bhushan Rawat

नए साल का धर्म

विद्या भूषण रावत

नया साल मुबारक हो गुप्ता जी, मैंने कहा. आप बिलकुल गलत हैं हमें मुबारक नहीं चाहिए मंगलमय कहिये, उन्होंने मुझे सुधारते हुए कहा. मैंने उनसे पूछा क्यों : कहते हैं मुबारक मुसलमानों को होता है। तो मैंने बताया कि साल भी उन्हीं का होता है आपका तो वर्ष होना चाहिए और वो भी अप्रैल में. वैसे तो जनवरी से तो अंग्रेजी कैलंडर वर्ष शुरू होता है. गुप्ताजी को हैप्पी न्यू इयर बोलने में भी कोई अफ़सोस नहीं. परेशानी थी तो केवल मुबारक से.

ये वाकया अभी दो दिन पहले का है, जब पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक इलाके में मैं था और गुप्ता उस क्षेत्र के बहुत बड़े साहूकार हैं, जिनके कर्जे के तले वहां के मुसहर और अन्य दलित पिछड़ी जातियां हमेशा दबे रहते है.

भारत में बैंकों ने कभी भी अपने नियम कानून ऐसे नहीं बनाये कि गरीब व्यक्ति उस तक पहुँच सके.

गुप्ता वैसे तो अपने को पिछड़ा कहते हैं, लेकिन वैसे ही जैसे नरेन्द्र मोदी भी पिछड़े हैं. वैसे उनका अधिकांश 'ग्राहक' दलित और पिछड़े ही हैं. शायद ही कोई बनिया या ब्राह्मण उनसे उधार ले. बैंकों के हरासमेंट से बचने के लिए गरीब मजदूर, किसान लोग साहूकारों के पास जाते हैं जहां बहुत बड़ी कागजी कार्यवाही नहीं करनी पड़ती है और लोन आसानी से मिल जाता है. आखिर गाँव के गरीबो को लोन भी कितना चाहिए लेकिन इसकी कीमत बहुत बड़ी है क्योंकि गरीब को 36% वार्षिक ब्याज के तौर पर देने पड़ते है. साहूकार 3% मासिक की दर पे ब्याज देते हैं. देखिये, है न हैरानगी की बात, की जहाँ दलाल स्ट्रीट के बड़े-बड़े दलालों को सरकारी बैंक न्यूनतम दर पर ब्याज देते हैं और नहीं लौटाने पर कुछ नहीं करते, वहीं साहूकार लोग गरीब की साइकिल से लेकर उसकी बची-खुची जमीन तक गिरवी रखवा देते हैं। वैसे गुप्ता साहेब ब्याह शादियों में भी मदद कर देते हैं और इस कारण समाज में उनकी बहुत 'पकड़' है. लेकिन ये ही वो 'ताकत' है जो कम संख्या में होने के बावजूद भी सवर्ण जातियों का समाज में दबदबा बनाये रखती है. दुर्भाग्यवश इस तरफ कोई भी सकारात्मक प्रयास नहीं हुए. दलित पिछड़ों में ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्कता है जो लोगों को साहूकारो के चंगुल से मुक्त कर सके, लेकिन उसके लिए बहुत मेहनत करने की आवश्यकता है और ऐसे काम प्रोफाइल बिल्डिंग से नहीं हो सकते. ये बड़ी लड़ाई है.

बहुत बार स्थानीय 'नेता' गुप्ताजी की जगह खुद को रख देते हैं और शोषण वैसे ही चलता रहता है. इससे कोई फरक नहीं पड़ता के शोषक कौन है. शोषक कोई भी हो उसका प्रतिकार होना चाहिए.

गलती गुप्ता जी की नहीं अपितु इस व्यवस्था की है जिसने अधिकांश लोगों को मानसिक गुलामी का शिकार बनाया है और लोग जब गुस्सा होकर विद्रोह भी करना चाहते हैं तो जो जाति के नाम पर विकल्प उपलब्ध  होता है वो शायद गुप्ता से भी अधिक खतरनाक होता है और इसलिए लोग थक हारकर वापस उन्हीं के पास चले जाते हैं.

बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा था कि राज्य की जिम्मेवारी बनती है अपनी जनता के हितों को संरक्षित करने के लिए, लेकिन लगता है कि राज्य बड़े लोगो को देश का पैसा देकर गरीबों की जमीन हडपना चाहता है या उसमें मदद करता है.

खैर, गुप्ता साहेब बहुत  मिलनसार हैं. खाते पीते हैं और खुद भी दिन भर भैंस चराते हैं. वो अपने सारे काम खुद करते हैं. सुबह और शाम कलेक्शन करना और दिन भर भैंस चराना. उनकी पैसा कमाने की इच्छा अनंत है और इसके लिए वो स्वयं ही सभी काम करते हैं. यानी कि पुरानी परम्पराओं के अनुसार गुप्ता जी बेहद ही कम खर्च में अधिक बिज़नस कर रहे हैं और मस्त भी रहते हैं. मोदी और योगी के परम भक्त. पिछले साल उत्तर प्रदेश में भाजपा के जीतने पर उन्होंने जोश में कहा था कि मोदी जिन्दगी भर शासन करेंगे. उन्हें इस बात की बेहद ख़ुशी थी कि एक बनिया देश का प्रधानमंत्री बन गया है और अब हम हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हैं. वो बोले, मोदी जी विदेश भ्रमण इसीलिये कर रहे ताकि यू एन ओ में भारत को हिन्दू राष्ट्र मान लिया जाए. मैंने उनसे पूछा कि किसान मर रहे हैं, छोटे व्यापारी तबाह हैं, रोजगार बढ़ा नहीं तो उन्होंने हामी भरी. कहते है, अगली बार योगी मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे और यू पी में भाजपा में लोग अब टिकेट लेने के लिए भी तैयार नहीं है क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी भयंकर हार होने वाली है लेकिन देश में मोदी को कोई नहीं हटा सकता क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान को सबक सिखाया, देश के सुरक्षा मज़बूत की है और चाइना से  भी अच्छे से निपट रहे है.

गुप्ता जी की भावनाएँ कोई व्यक्तिगत नहीं है वो एक जाति के खयालों को दर्शा  रहा है हालाँकि अपवाद हर जगह हो सकते है्. अगर गुजरात के अभी के चुनावो् ्को देखे तो जी एस टी की मार व्यापारी वर्ग पर बहुत पड़ी और सूरत के व्यापारियों के वीडियोस वाट्सएप पर जबरदस्त सैर कर रहे थे लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो सूरत के व्यापारियों ने अपने सभी 'गम' भुलाकर वापस हिंदुत्व की नाव की सवारी करना उचित समझा.

अपने गुप्ता जी के गणित को भी आप समझ सकते हैं और उससे अंदाजा लगा सकते हैं कि जाति से बड़ा कोई नहीं. अगर आप जाति छोड़ देंगे तो समाज से टूट जाते है. इसलिए जातितोद्को को समाज में मानता नहीं है.

गुप्ता जी कह रहे हैं कि योगी का उत्तर प्रदेश में सफाया हो जायेगा लेकिन मोदी शासन करते रहेंगे. दरअसल, जाति बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए गुप्ताजी मोदी जी में तो अपनापन देख रहे हैं, लेकिन योगी के लिए रिस्क लेने को तैयार नहीं.

यह भी हकीकत है कि योगी की ठकुराई में दूसरी जातियां परेशान हैं और राजपूतों को लेकर उग्र हिन्दुवाद को जिस तरीके से संघ आगे बढ़ाना चाहता है वो तो जातियों के अंतर्द्वंद्व के वजह से कभी चल नहीं पायेगा, क्योंकि इस उग्रता के इनाम स्वरूप ब्राह्मणवादी भाजपा को उत्तर भारत के अधिकांश राज्य ठाकुरों या राजपूतो को सौंपने पड़े हैं. अब ये ऐसे गले की हड्डी है जो न निगलते बनती न रोकते, क्योंकि नागपुर के संघ के मुख्यालय के सभी दिग्गज जानते हैं कि राजपूतो या ठाकुरों का गुस्सा मोल लेकर अभी तो राजनीति नहीं हो सकती हालाँकि राजनाथ तो हाशिये पर ही हैं.

गुप्ता जी से बात कर पता चलता है कि संघ की वाट्सएप यूनिवर्सिटी में कैसी-कैसी कहानियां तैयार की जा रही हैं, जिसमें भारत की महानता से लेकर, मुसलमानों को खलनायक के तौर पर दिखाना, भारतीय संस्कृति की ब्राह्मणवादी व्याख्या करना और विकास के नाम पर मोदी जी की तरह जोर-जोर से फेंकना. चाहे मोदी और उनकी सरकार के विरुद्ध जैसे भी माहौल हो लेकिन भक्तों का विश्वास थोड़ा डोला तो है लेकिन फिर भी कायम है. यानी जो विकास के नाम पर मोदी आये थे वो बिलकुल झूठा था और मूलतः भक्त लोग उन्हें हिंदुत्व के अजेंडे पर देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें खतरा केवल जाति से है, जैसे गुप्ता जी मोदी में अपनी जाति देख रहे हैं और योगी में नहीं, वैसे है अधिकांश राजपूत तभी तक भाजपा में हैं जब तक उनके नेताओं की स्थिति अच्छी है. गुजरात में पटेलों ने बीस साल में अपनी राजनैतिक ताकत खो दी इसलिए उसे प्राप्त करने के लिए ही इतना संघर्ष चल रहा है. हिंदुत्व इसलिए कुछ नहीं केवल पुरोहितवाद की मोनोपोली को बनाये रखने का एक तंत्र है जिसको ताकत देने के लिए उन्हीं जातियों की सेवाएं ली जाएँगी जो मनुवादी व्यवस्था का शिकार हैं. अंतर्द्वंद्व से अपने काम बनाने में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का कोई मुकाबला नहीं. भारत के इतने बड़े इतिहास में इन अंतर्द्वंद्व को समझ कर उनसे निपटना पड़ेगा. उनको छुपाकर सामाजिक या राजनीतिक एकता नहीं बन सकती है.

हिंदुत्व ने आर्य बनाम अनार्य या ब्राह्मण बनाम गैर ब्राह्मण वाली बहस को बहुत चालाकी से मुस्लिम बनाम गैर मुस्लिम में बदल दिया है, इसलिए ही ये सारे प्रपंच हो रहे हैं. अब साल के स्वागत में धर्म है, रंगों में धर्म है, खाने में धर्म और देशभक्ति है, कपड़े पहनने और भाषा में भी धर्म है. लेकिन किसी को मारने में कोई शर्म नहीं है. धर्म में धंधेबाज आज इज्जत से टी वी पर आ रहे हैं, हम लुट रहे हैं. गाँव-गाँव निरंकारी बाबा, शिव चर्चा, और अन्य महान आत्माएँ पहुँच चुकी हैं. प्रवचन जारी है. लोग कर्ज लेकर बाबाओं के पास जाते हैं और कर्ज में डूबने पर गुप्ता जी के पास आते हैं. कर्ज का एक साइकिल है वो ख़त्म नहीं होता. शादी, मुंडन, अंतिम संस्कार, ब्रह्मभोज अभी भी सबसे जायदा कहाँ होता है इसके लिए समाज शास्त्रियों को गाँव की और रुख करना पड़ेगा.

असल में गुप्ता जैसे लोग ज्यादा बड़े समाजशास्त्री हैं, क्योंकि वो उसकी मानसिकता को ज्यादा अच्छे से समझकर ही अपना व्यापार करते हैं.

भारत चाहे हिन्दू राष्ट्र बने या नहीं, भारत में एक हिंदूवादी सरकार है जो पुरोहितवादी पूंजीवादी अजेंडे पर काम कर रही है.

इस हिन्दू राष्ट्र का मॉडल क्या होगा ?

क्या पेशवाई वाला या ट्रावन्कोर का जहाँ पर शूद्रों अति शूद्रों को मनुवादी व्यवस्था के अनुसार काम करना पड़ता था. क्या आज के इस दौर में, जब बाबा साहेब अम्बेडकर, ज्योति बा फुले, और पेरियार का साहित्य पढ़कर अनार्य समाज खुल कर चनौती दे रहा हो, हिन्दू राष्ट्र के अनुयायी मनुवादी व्यवस्था को लागू करवा पाएंगे ? 21वीं सदी का अम्बेडकरवादी भारत तो कम से कम इस चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देगा, लेकिन इसके लिए उसे उन लोगों के पास भी जाना पड़ेगा जो उनके तरह नहीं पढ़ लिख पाए या जिन्हें शहरों में आने का मौका नहीं मिला और जो जातियों के खेल में भी अल्पसंख्यक ही रह गए और आन्दोलन भी उन तक नहीं पहुंचा. उनकी भावनाओं, परम्पराओं या भोलेपन का मजाक न उड़ाकर, उन्हें गले लगाकर, उनके दुःख दर्दो को समझकर ही हम उन्हें अपने आन्दोलन का हिस्सा बना सकते हैं.

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