मोदीजी को अब तक भरोसा नहीं हुआ वे सचमुच प्रधानमंत्री बन गए हैं

क्यों विजय माल्या लंदन में खुला घूम रहा है? क्यों लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं? क्यों हमारे जवान रोज शहीद हो रहे हैं? क्यों जम्मू-कश्मीर के नौजवान पत्थरबाज बन गए? ...

देशबन्धु
हाइलाइट्स

कुल मिलाकर संसद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रैली कर ली और धन्यवाद प्रस्ताव पर भाषण को निंदा प्रस्ताव में बदल दिया। उनके दोनों भाषण आगामी विधानसभा और आम चुनावों की भूमिका के लिए दिए गए या चार साल में अच्छे दिन न ला पाने की हताशा में दिए गए, कहा नहीं जा सकता।

मोदीजी क्यों विजय माल्या लंदन में खुला घूम रहा है? क्यों लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं?

धन्यवाद प्रस्ताव पर निंदा भाषण

मोदीजी को शायद अब तक ये भरोसा नहीं हुआ है कि वे सचमुच इस देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं। उनकी महत्वाकांक्षाओं से तो जनता अच्छे से वाकिफ है...

मोदीजी को शायद अब तक ये भरोसा नहीं हुआ है कि वे सचमुच इस देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं। उनकी महत्वाकांक्षाओं से तो जनता अच्छे से वाकिफ है। बीते चार-पांच सालों में चुनावी रैलियों में वे सब कुछ पा लेने की उत्कट इच्छा का प्रदर्शन भी करते रहे हैं। जनता ने उन्हें चुनाव में जिता कर लोकसभा भेजा भी और वहां वे प्रधानमंत्री भी बना लिए गए। मई 2014 के बाद से यानी लगभग चार सालों से देश की बागडोर उनके हाथ में है और वे अपनी मर्जी के निर्णय लेते भी रहे हैं। इतना सब होने के बावजूद उनका यह रोना नहीं छूटता कि इस देश में जो कुछ गलत हुआ है, वह कांग्रेस के कारण हुआ है। आज संसद में उन्होंने पहले लोकसभा और फिर राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब दिया तो उसमें भी उन्होंने पानी पी-पीकर कांग्रेस को कोसा।

प्रधानमंत्री की भाषा, मुखमुद्रा, हाव-भाव सब कुछ देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके मन में कांग्रेस के लिए कितनी नफरत भरी हुई है।

उनके भाषण में देश के प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि धुरविरोधी नेता की छवि झलक दिख रही थी।

मोदीजी पहले भी सदन में चुनावी रैली के अंदाज में भाषण दे चुके हैं और आज भी उन्होंने वही किया। विपक्ष के लिए कहा कि जितना कीचड़ उछालोगे, उतना कमल खिलेगा। क्या सदन में कोई चुनाव चल रहा था, जो मोदीजी को यहां भी कमल खिलाने की चिंता हुई?

देश ने तो भाजपा को भारी बहुमत से जिताकर, अच्छे दिनों की उम्मीद में सत्ता सौंपी थी। मोदीजी को उन उम्मीदों का जवाब देना था। लेकिन वे तो अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने लगे कि 3 साल में 1 लाख 20 किमी. सड़कें बनीं, 1 लाख से अधिक पंचायतों में ऑप्टिकल फाइबर पहुंचाए, एक करोड़ लोगों को रोजगार मिला, 28 करोड़ एलईडी बल्ब बांटे, आदि।

सवाल यह है कि अगर उनकी सरकार ने तीन-साढ़े तीन सालों में इतना ज्यादा काम कर लिया है, तो देश में युवाओं, किसानों, छात्रों, व्यापारियों, हर वर्ग में इतना असंतोष क्यों दिख रहा है? क्यों भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ?

क्यों विजय माल्या लंदन में खुला घूम रहा है? क्यों लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं? क्यों हमारे जवान रोज शहीद हो रहे हैं? क्यों जम्मू-कश्मीर के नौजवान पत्थरबाज बन गए? क्यों असदुद्दीन ओवैसी को यह मांग उठानी पड़ी कि मुसलमानों को पाकिस्तानी कहने वालों को 3 साल की सजा हो? मोदीजी को भी नजर आ ही रहा होगा कि उनके सारे निर्णयों से जनता खुश नहीं है और समय आने पर जवाब मांगेगी, इसलिए उन्होंने उसकी नाराजगी का सिरा फिर कांग्रेस की ओर मोड़ दिया कि हमने कुछ नहीं किया, सब इनका किया-धरा हुआ है।

सदन में बेहद अशोभनीय तरीके से उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री प.जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी से लेकर दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक को कोसा। वैसे भाजपा ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर पहले कई बार कीचड़ उछाला है, लेकिन वे भारत के प्रधानमंत्री नहीं रहे, इसलिए राजनैतिक विरोध के दायरे में उनकी निंदा करना गलत नहीं है। पर यह कहना कि इस देश को लोकतंत्र नेहरू ने नहीं दिया, या इस देश का बंटवारा कांग्रेस ने किया, देश के टुकड़े किए और जो जहर बोया, आज आजादी के 70 साल बाद भी उस पाप की सजा सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानी भुगत रहे हैं, एकदम भ्रामक है और सीधे शब्दों में कहें तो झूठ है। मोदीजी इतिहास को पढ़ेंगे तो जानेंगे कि देश का विभाजन किन त्रासद परिस्थितियों में अंग्रेजों ने करवाया।

मोदीजी मेरा कश्मीर कहकर जो देश प्रेम की भावुकता दिखला रहे हैं, उस भावुकता से कश्मीरियों के दर्द को क्यों नहीं महसूस करते और क्यों हालात नहीं सुधारते? उन्होंने लिच्छवी गणराज्य के लोकतंत्र की बात की, कि हमारे देश में तो यह पहले से है। लेकिन क्या वे इतना भी नहीं जानते कि लिच्छवी गणराज्य का दायरा सीमित था और भारत तब एक देश नहीं था। राज्यसभा में उन्होंने फिर कांग्रेसमुक्त भारत की बात की और इसे गांधीजी से जोड़ दिया। उन्होंने गांधी के सपनों के भारत की बात की। लेकिन क्या वे नहीं जानते कि अपने सपनों के भारत को आगे ले जाने के लिए गांधीजी को नेहरू ही सबसे सुयोग्य लगे थे।

गांधी को मारने वाले गोडसे के मंदिर बनाने की पहल मोदीजी के शासन में होती है, तब वे इस पर कुछ क्यों नहीं बोलते? मोदीजी ने सिख दंगों का उल्लेख किया, लेकिन गोधरा दंगे भूल गए। आपातकाल को याद किया, लेकिन उनके शासन में सवाल उठाने वालों को देशद्रोही कहा जाता है, यह भूल गए। मोदीजी यह भी भूल गए कि लालकिले से अपने भाषणों में उन्होंने केवल अपनी पीठ थपथपाई है और पिछली सरकारों की देश-विदेश हर जगह निंदा की।

उन्होंने इसमें भी कांग्रेस का दोष गिनाया कि उसके प्रधानमंत्रियों ने कभी पिछली सरकारों या राज्य सरकारों के अच्छे कामों का श्रेय नहीं दिया।

कुल मिलाकर संसद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रैली कर ली और धन्यवाद प्रस्ताव पर भाषण को निंदा प्रस्ताव में बदल दिया। उनके दोनों भाषण आगामी विधानसभा और आम चुनावों की भूमिका के लिए दिए गए या चार साल में अच्छे दिन न ला पाने की हताशा में दिए गए, कहा नहीं जा सकता।

(देशबन्धु का संपादकीय)

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