युवा हुंकार रैली : सरकार को आंदोलनों, रैलियों से डर क्यों लगता है जी ?

दलितों का मुद्दा आज भी बड़ी जनता के लिए कोई मायने नहीं रखता है। खासकर दिल्ली जैसे शहर में, जहां आए दिन आंदोलन होते रहते हैं, लेकिन दलित आंदोलन को खास बढ़ावा मिले, ऐसी जमीन यहां अब तक तैयार नहीं हुई है...

देशबन्धु

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कभी हां, कभी ना करते-करते आखिरकार दिल्ली में युवा हुंकार रैली आयोजित हो ही गई। इस साल की शुरुआत में ही महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में दलित विजय का उत्सव मनाने पर हिंसा भड़क उठी थी और इसका जिम्मेदार गुजरात के विधायक और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी तथा जेएनयू के छात्रनेता उमर खालिद को बताया गया था। इन का एक कार्यक्रम मुंबई में भी होना था, लेकिन आखिर वक्त में पुलिस ने उसे रुकवा दिया था। इसके बाद दिल्ली में 9 जनवरी को युवा हुंकार रैली प्रस्तावित थी, लेकिन इसके लिए भी दिल्ली पुलिस अनुमति नहीं दे रही थी। संभवत: उसे महाराष्ट्र की तरह कानून-व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा हो। लेकिन दिल्ली पुलिस की ओर से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश का हवाला देते हुए ट्वीट किया गया कि 'एनजीटी के आदेशों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली पुलिस द्वारा पार्लियामेंट स्ट्रीट पर रैली करने को लेकर इजाजत नहीं दी गई है। आयोजकों से अनुरोध है कि वे किसी अन्य इलाके में रैली करें।'

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हालांकि इसके बाद वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण का ट्वीट आया कि –

'डीसीपी नई दिल्ली कृपया लोगों को भ्रमित न करें, एनजीटी का आदेश जंतर मंतर के लिए है, संसद मार्ग के लिए नहीं। उच्चतम न्यायालय ने हमेशा कहा है कि शांतिपूर्वक प्रदर्शन और बैठकों का अधिकार एक बुनियादी अधिकार है। कल युवा रैली को रोकने का पुलिस का कोई भी प्रयास अलोकतांत्रिक तथा मूलभूत अधिकारों का हनन होगा।'

वैसे आखिरी समय तक दिल्ली पुलिस रैली की नामंजूरी पर अड़ी रही, फिर न जाने क्या हुआ कि रैली तय जगह पर, तय समय पर आयोजित हो गई। इस दौरान दिल्ली पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद थी।

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यूं पुलिस की ऐसी सतर्कता तारीफ की बात है, लेकिन यह देखकर दुख भी होता है कि आखिर हमारे देश का माहौल कैसा बन गया है और कैसा बनता जा रहा है कि आंदोलनों, रैलियों से सरकार को डर लगने लगा है। बहरहाल, दलित संगठन भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद की रिहाई की मांग, शैक्षिक अधिकार, रोजगार, आजीविका और लैंगिक न्याय जैसे मुद्दों को उठाते हुए युवा हुंकार रैली आयोजित हुई। इसमें जिग्नेश मेवाणी, प्रशांत भूषण, अखिल गोगोई, कन्हैया कुमार, उमर खालिद, शेहला रशीद आदि के साथ-साथ जेएनयू, डीयू, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र भी उपस्थित थे।

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उम्मीद के मुताबिक रैली में नहीं उमड़ी भीड़

चंद्रशेखर की तस्वीरें और पोस्टर लिए उनके कई समर्थक भी रैली का हिस्सा बने। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि जैसी उम्मीद थी, वैसी भीड़ रैली में नहीं उमड़ी। इसके दो कारण हो सकते हैं, पहला यह कि दिल्ली पुलिस रैली की इजाजत नहीं दे रही थी, इससे बहुत से लोग रैली को रद्द मान चुके होंगे। दूसरा यह कि दलितों का मुद्दा आज भी बड़ी जनता के लिए कोईर् मायने नहीं रखता है। खासकर दिल्ली जैसे शहर में, जहां आए दिन आंदोलन होते रहते हैं, लेकिन दलित आंदोलन को खास बढ़ावा मिले, ऐसी जमीन यहां अब तक तैयार नहीं हुई है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि में दलित अस्मिता का सवाल काफी पहले से उठाया जाता रहा है, लेकिन वहां भी इसे दबाने की कोशिशें हो रही हैं। उत्तरप्रदेश से उठकर राजनीति में बड़ा कद हासिल करने वाली मायावती, अब फिर शांत बैठ गई हैं।

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रोहित वेमुला से लेकर भीमा-कोरेगांव तक कितना कुछ हो रहा है, लेकिन उनमें वह आग नजर नहीं आ रही, जो दलितों में जोश की गर्मी जगाती थी। सहारनपुर में पिछले साल दलित-ठाकुर संघर्ष के बाद चंद्रशेखर जिस तरह से नए नेतृत्व के रूप में उभरे, तो उससे सत्ता को डर लगा, और चंद्रशेखर जेल भेज दिए गए। अब जिग्नेश मेवाणी नए दलित नेता के रूप में तेजी से उभरे हैं। गुजरात के ऊना कांड के बाद उनकी ही अगुवाई में बड़ा आंदोलन हुआ था। लेकिन इतनी तेजी से वे राजनीति में आगे बढ़ेंगे, यह उम्मीद शायद राजनीति के दिग्गजों को नहीं थी।

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क्या कांशीराम और मायावती का विकल्प बन पाएंगे जिग्नेश

विधायक बनने के बाद जिग्नेश गुजरात से बाहर निकल कर देश के अलग-अलग हिस्सों में जा रहे हैं। वे न केवल दलितों, बल्कि किसानों, अल्पसंख्यकों की बात भी कर रहे हैं। शिक्षा और रोजगार का सवाल भी उठा रहे हैं। क्या वे कांशीराम और मायावती का विकल्प बन पाएंगे और दलित राजनीति को नए आयाम दे पाएंगे, इस बारे में कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी। क्योंकि राजनीति समय-समय पर करवट लेती है।

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कई हैं सवाल, शायद 2019 में जवाब मिलें

रहा सवाल हुंकार रैली का, तो इसे देखकर अन्ना आंदोलन का अहसास हुआ। उस वक्त भी सत्ता विरोधी मिजाज़ आंदोलन की नब्ज हो गया था। 9 जनवरी की रैली में भी सभी वक्ताओं ने मोदी सरकार की जमकर आलोचना की। अब यह देखना होगा कि क्या अन्ना आंदोलन की तरह ऐसे नए आंदोलन भी देशव्यापी असर डालते हैं? क्या सरकार इन्हें आगे बढ़ने देगी? कांग्रेस और भाजपा के अन्य विरोधी दल क्या इनके साथ आते हैं? सवाल कई हैं, जवाब शायद 2019 में मिलें।

देशबन्धु का संपादकीय

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