अंतिम फैसला : महेशचंद्र शर्मा जी, मोदी मार्का विकास में गो-वंश की नहीं, गो-वध की ही जगह है

सर्वोच्च न्यायालय ने एक सुचिंतित फैसला दिया कि गोवंश की अंधाधुंध हत्या नहीं की जा सकती है. इसके लिए सरकार को निश्चित व स्पष्ट मानक बनाने चाहिए लेकिन गो-वध पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग असंवैधानिक है....

हाइलाइट्स
  • महेशचंद्र शर्मा ने बुनियादी अनुशासन का पालन नहीं कर देश की कुसेवा ही की है
  • मानवद्रोही परंपराओं के खिलाफ भी समाज को तैयार करना है. आप ऐसा करेंगे तो आप गाय के साथ खड़े हैं; ऐसा नहीं करेंगे तो गोवध करने वालों के साथ खड़े हैं भले आपका धर्म कुछ भी हो.
  • गाय एक प्राणीमात्र नहीं है, वह एक खास तरह की सामाजिक व्यवस्था का केंद्र-बिंदु है. यह सरकार उस सामाजिक व्यवस्था को न तो समझती है और न उसमें विश्वास रखती है

कुमार प्रशांत

राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश महेशचंद्र शर्मा ने अपने न्यायिक जीवन का आखिरी फैसला सुना दिया ! उन्हें पूरा अधिकार था कि वे अपना आखिरी फैसला ऐसा सुनाते कि जिससे न्यायालय को नई गरिमा मिलती या फिर अपना आखिरी फैसला ऐसा सुनाते कि जिससे न्यायालय की गरिमा कम होती या कि हमारा पूरा न्यायतंत्र किसी अर्थहीन विवाद में उलझ जाता. उन्होंने दूसरा विकल्प चुना. उन्होंने राजस्थान की हिंगोनिया गोशाला में हुई गायों की मौत के मामले में दायर जनहित याचिका पर अपने जीवन का आखिरी फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे और गोहत्या करने वालों को उम्रकैद की सजा का प्रावधान होना चाहिए. क्या उन्हें यह मालूम नहीं था कि इस सवाल पर देश में एकमत नहीं है और संविधान सभा में भी इस पर कभी एक राय नहीं बनी थी ? क्या उन्हें पता नहीं था कि लंबे विमर्श के बाद संविधान सभा ने गाय और पशुओं का यह पूरा मामला संविधान के नीति-निर्देशक अध्याय की धारा 48 में डाल कर इससे छुट्टी पा ली थी ?

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1950 में हमारा संविधान स्वीकृत हुआ और उसके तुरंत बाद ही, 1959 में मुहम्मद हनीफ कुरैशी का वह चर्चित मुकदमा चला जिसमें संपूर्ण गोवधबंदी के हर पक्ष की, हर तरह से पड़ताल हुई. सर्वोच्च न्यायालय ने एक सुचिंतित फैसला दिया कि गोवंश की अंधाधुंध हत्या नहीं की जा सकती है. इसके लिए सरकार को निश्चित व स्पष्ट मानक बनाने चाहिए लेकिन गो-वध पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग असंवैधानिक है.

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सर्वोच्च न्यायालय ने तभी इस तरफ हमारा ध्यान खींचा कि हमारे देश में मुसलमानों, ईसाइयों, अनुसूचित जातियों व जनजातियों की एक बहुत बड़ी आबादी परंपरागत गोमांसहारी है. हम इसकी अनदेखी कर कोई निर्णय नहीं कर सकते. इस फैसले के बाद देश के राज्यों ने अपनी-अपनी तरह से अपने गोवंश की रक्षा के कायदे आदि बनाए. हर कायदे की तरह इन कायदों का भी सीमित असर हुआ लेकिन गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध किसी भी राज्य ने, कभी भी नहीं लगाया. इसके बाद भी गोभक्तों की एक जमात 1961, 1969 और 1996 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह मामला लाती रही और हर बार न्यायालय एक ही फैसला सुनाता रहा. अंतत: न्यायालय को यह कहना पड़ा कि उसे इस बात से गहरी वेदना हुई है कि एक वर्ग-विशेष उसके फैसले को अर्थहीन बनाने की लगातार कोशिश कर रहा है.

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2005 में 7 जजों के एक बेंच ने इसकी फिर से सुनवाई की और फिर कहा कि इस पर पूर्ण कानूनी बंदिश नहीं लगाई जा सकती है. क्या यह सारा अदालती इतिहास न्यायमूर्ति महेशचंद्र शर्मा को मालूम नहीं था ? अगर नहीं था तो वे हमारी न्याय व्यवस्था के इस शिखर तक कैसे पहुंचे ? और अगर उन्हें यह सब मालूम था तो उन्हें अपना अंतिम फैसला देते समय इसका होश होना ही चाहिए था उनकी व्यवस्था का सर्वोच्च न्यायालय बार-बार क्या कह रहा है ! अदालतों का काम सरकारों को यह बताना नहीं है कि उसे किस आदमी को राष्ट्रपिता या राष्ट्रमाता घोषित करना चाहिए, किसे राष्ट्रीय पशु या पंछी बनाना चाहिए. अदालतें तो सरकारों को या देश को यह बताने का काम करती हैं कि संविधान ने उनके लिए क्या और कहां लक्ष्मण-रेखा खींची है कि जिसे पार करने की अनुमति किसी को नहीं है. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का हर फैसला निचली अदालतों के लिए नजीर बनता जाता है और उन्हें उस लक्ष्मण-रेखा को पार नहीं करना चाहिए. महेशचंद्र शर्मा ने इस बुनियादी अनुशासन का पालन नहीं कर देश की कुसेवा ही की है.

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गाय की रक्षा हमारी कृषि संस्कृति वाले देश के लिए अस्तित्व-रक्षा का सवाल है. लेकिन हमें एक क्षण को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि कृषि संस्कृति वाला हमारा यह देश लोकतांत्रिक नागरिकों का देश है. इसलिए यहां वही चलेगा, वही चलना चाहिए कि जिसके लिए आम सहमति बन गई हो. जब तक आम सहमति नहीं बनती है, तब तक हर तरह का नुकसान झेलते हुए भी हमें आम सहमति बनाने का अपना काम जारी रखना होगा. इसके बगैर किसी भी तरह का संसदीय या सरकारी या अदालती आदेश सूखी रूई में चिनगारी फेंकने के बराबर होगा. इसलिए किसी जमात या किसी मतवाद या किसी धार्मिक संगठन से डर कर नहीं बल्कि लोकतंत्र की मर्यादा का पालन करते हुए हमें सामाजिक सहमति बनाने का काम करना होगा. इसलिए महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं गाय की रक्षा को इतना जरूरी मानता हूं कि उसके लिए अपनी जान दे सकता हूं लेकिन उसके लिए किसी इंसान की जान लेने की अनुमति नहीं दे सकता.

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आजादी के बाद राजनीतिक चालबाजी से दूर, सामाजिक मंच से गोरक्षा के लिए किसी ने सबसे सशक्त आवाज उठाई और उसे सामाजिक  विश्वास व जन आंदोलन में बदलने की भरसक कोशिश की तो वे थे आचार्य विनोबा भावे ! शुद्धतम मन से और शुद्धतर प्रक्रिया से उन्होंने इस जरूरी कदम की तरफ सरकार व समाज का ध्यान खींचा और एक बार तो जान की बाजी भी लगा दी. लेकिन वे भी भारतीय सामाजिक चेतना को उस स्तर तक नहीं ले जा सके कि जहां पहुंच कर गो-रक्षा स्वत: सिद्ध हो जाती.

हमें यह देखना और समझना ही होगा कि मोदी सरकार ने भी और इससे पहले की तमाम सरकारों ने भी जिसे विकास समझा और जिसे समाज के ऊपर लाद दिया, क्या उसमें गो-वंश के लिए कोई जगह बनती और बचती है ?

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गाय एक प्राणीमात्र नहीं है, वह एक खास तरह की सामाजिक व्यवस्था का केंद्र-बिंदु है. यह सरकार उस सामाजिक व्यवस्था को न तो समझती है और न उसमें विश्वास रखती है. यह समाज को जिस तरफ ले जा रही है वहां गो-वंश की नहीं, गो-वध की ही जगह है. वहां गाय जीने का नहीं, पैसा कमाने का साधन भर है. समाज इतना सयाना होता ही है कि वह कोई बोझ लाद कर नहीं चलता है. उसके लिए जो उपयोगी नहीं है, वह रक्षणीय नहीं है -  चाहे भाषा हो चाहे गाय !

आप बहुत हैरान मत होइएगा कि जिस दिशा में हम अपना लोकतंत्र ले जा रहे हैं उसमें एक वक्त आएगा ही कि जब समाज लोकतंत्र को अस्वीकार कर देगा. आखिर गन्ने का सारा रस निचोड़ लेने के बाद, गन्ने के रस का धंधा करने वाला भी उसकी सिट्ठी फेंक ही तो देता है न !

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पिछले सालों में हमने अपने लोकतंत्र की तमाम संभावनाओं को चूस कर, उसे एक सारहीन, सत्वहीन मशीनी व्यवस्था में बदल दिया है. इस सारहीन सिट्ठी में से समाज को कुछ मिल ही नहीं पा रहा है. ऐसा समाज गाय को ढो कर क्या करेगा ? इसलिए गो-वंश के व्यापार में सभी लगे हैं - हिंदू भी, मुसलमान भी ! इन्हें कानून से आप मजबूर नहीं कर सकेंगे. हर बार हमारा संविधान हमें पीछे हटने पर मजबूर कर देगा. फिर रास्ता क्या है ? दो ही रास्ते हैं : पहला कि हम अपना रास्ता बदलें;  दूसरा कि गो-वंश, कृषि संस्कृति आदि का बोझ हम उतार फेंके और उस अंधी दौड़ में शामिल हो जाएं जिसमें हम बड़े कमजोर खिलाड़ी के रूप में शामिल तो हैं लेकिन किसी गिनती में नहीं आते ! यह फैसला है जो करना है. इसमें कायरता भी नहीं चलेगी, चालाकी भी नहीं. भारत को और दुनिया को बचाना है तो हमें यह अंतिम फैसला करना ही होगा. कृषि-संस्कृति ही वह मानवीय, वैज्ञानिक संस्कृति है जिसका आधुनिकतम विकास करना है असली वैश्विक चुनौती है. जिनके परंपरागत भोजन में गो-मांस आदि शामिल हैं, उन्हें भी समझना होगा कि आज की दुनिया में यह परंपरा मानव-विरोधी व पर्यावरण का स्थायी विनाश करने वाली है. यह वैसी ही कालवाह्य परंपरा है जैसे सती-प्रथा, बाल-विवाह, छूआछूत, तीन तलाक आदि-आदि हैं. जैसे इनके खिलाफ समाज का मन तैयार किया है हमने वैसे ही दूसरी मानवद्रोही परंपराओं के खिलाफ भी समाज को तैयार करना है. आप ऐसा करेंगे तो आप गाय के साथ खड़े हैं; ऐसा नहीं करेंगे तो गोवध करने वालों के साथ खड़े हैं भले आपका धर्म कुछ भी हो.

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