हमारे मोदी, योगी और राजनीतिक बाबाओं का योग के प्रति नजरिया एक प्रकार की प्रवंचना और ठगी का ही है

जनता को वैज्ञानिक स्वास्थ्य-चेतना और सेवाएं प्रदान करने में अक्षम ये लोग टोटकेबाजियों से बाजी मात करना चाहते हैं।...

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष

अरुण माहेश्वरी

योग का शैव मत, वैदिक हिंदू और बौद्ध धर्म, सबने धार्मिक कर्मकांडों के एक हिस्से के रूप में प्रयोग किया हैं। शैव तांत्रिकों ने अपने भाववादी दार्शनिक लक्ष्यों के लिये भी शरीर और आत्म के संबंधों के संधान में इसकी क्रियाओं को साधने की कोशिश की हैं। इस प्रकार, शुरू से योग के प्रति सभी धार्मिक पंथों का एक उपयोगितावादी नजरिया रहा है, एक प्रकार से व्यायाम को धर्म का विषय बना कर धर्म के प्रचार में उसका इस्तेमाल करने का नजरिया। नमाज़ की क्रियाओं में भी कुछ-कुछ यही तर्क काम करता है।

लेकिन ग़ौर करने की बात है कि ईसाई धर्म ने अपने प्रचार के लिये ऐसी किसी प्रच्छन्न, शारीरिक क्रियाओं की गुह्यता का उपयोग नहीं किया। उनके यहाँ शुरू से दया, तर्क और क्रिया का प्राधान्य रहा। आज भी हमारे मोदी, योगी और राजनीतिक बाबाओं का योग के प्रति नजरिया राजनीतिक और वाणिज्यिक उपयोगितावाद का, एक प्रकार की प्रवंचना और ठगी का ही है। जनता को वैज्ञानिक स्वास्थ्य-चेतना और सेवाएं प्रदान करने में अक्षम ये लोग टोटकेबाजियों से बाजी मात करना चाहते हैं।

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