विकास और गरीब के कंधों पर सवार है मोदी का फासिज्म लेकिन इसके संचालक कारपोरेट घराने

मोदी के फासिज्म की धुरी है मीडिया प्रबंधन और राज्य के संसाधनों की खुली लूट...

विकास और गरीब के कंधों पर सवार है मोदी का फासिज्म लेकिन इसके संचालक कारपोरेट घराने

मोदी मार्का फासिज्म

जगदीश्वर चतुर्वेदी

फासिज्म के मायने क्या हैं? इस पर भारत में बहुत बहस है। इस बहस में बड़े- बड़े दिग्गज उलझे हुए हैं, लेकिन आजतक उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा तय नहीं कर पाए हैं। फासिज्म वह भी है जो हिटलर और मुसोलिनी ने किया, फासिज्म वह भी जो आपातकाल में श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया, फासिज्म का एक रूप वह भी है जो पीएम नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं।

मोदी के फासिज्म की धुरी है मीडिया प्रबंधन और राज्य के संसाधनों की खुली लूट

मोदी के फासिज्म की लाक्षणिक विशेषताएँ भिन्न हैं। मोदीजी का फासिज्म विकास और गरीब के कंधों पर सवार है लेकिन इसके प्रशासन के संचालक कारपोरेट घराने हैं। इसकी धुरी है मीडिया प्रबंधन और राज्य के संसाधनों की खुली लूट। यह अपने विरोधी को राष्ट्रद्रोही, राष्ट्र विरोधी कह कहकर कलंकित करता है, इसके पास मीडिया और साइबर मीडिया की बेशुमार ताकत है। यह ऐसी सत्ता है जो किसी की आवाज नहीं सुनती बल्कि सच यह है यदि जीना चाहते हैं तो सिर्फ उसकी आवाज़ें सुनो।

मोदी के शासन में आने के बाद से अहर्निश मोदी की सुनो, मोदी के भक्तों की सुनो।

दिलचस्प पहलू यह है कि इस समय मोदी और भक्तों के अलावा कोई नहीं बोल रहा। सब लोग इनकी ही सुन रहे हैं। जनता बोल नहीं रही। वो सिर्फ सुन रही है और आज्ञा पालन कर रही है। हमारे जैसे लोग जो कुछ कह रहे हैं उसे न तो जनता सुन रही है और न सत्ता सुन रही है, सिर्फ हम ही अपनी आवाज सुन रहे हैं। हम तो सहमत को सुना रहे हैं। अपने ही हाथ से अपनी पीठ ठोक रहे हैं। जब जनता न सुने, सरकार न सुने, संवादहीनता हो तो समझो फासिज्म के माहौल में जी रहे हैं। इस माहौल को पैदा करने के लिए प्रत्यक्षत: हक छीनने, या संविधान को स्थगित करने या बर्बर हमले करने की जरूरत नहीं है।

इटली और जर्मनी के फासिज्म से भिन्न है भारत का फासिज्म

भारत का फासिज्म इटली और जर्मनी के फासिज्म से भिन्न है। भारत में मोदी के फासिज्म की धुरी है जनविरोधी योजनाएं और गरीबों को अधिकारहीन बनाने की साजिशें। यह सीधे अमेरिकी लिबरल फासिज्म की जीरोक्स कॉपी है।आज फासिज्म का अर्थ है,राज्य प्रशासन का चंद कारपोरेट घरानों के सामने पूर्ण समर्पण। न्यायालयों के फैसलों की खुली अवहेलना।

फासिज्म को नया रूप दिया है मोदी ने

मोदी ने फासिज्म को नया रूप दिया है उसने हिंदुत्व को सर्वोपरि स्थान दिया है देश -विदेश सब जगह हिंदुत्व के फ्रेमवर्क में चीजों को पेश किया है। हिंदू मिथकों और मिथकीय पात्रों को सामान्य अभिव्यक्ति का औज़ार बनाया है। हिंदू नैतिकता को महान नैतिकता बनाया है और उसके कारण देश में हिंदुत्व का माहौल सघन हुआ है। दूसरा बडा परिवर्तन यह कि किया है उसने "सर्जिकल स्ट्राइक " या "युद्ध "इन दो पदबंधों को हिंदुत्व की नैतिकता बना दिया है। अब हर चीज के खिलाफ मोदीजी "सर्जिकल स्ट्राइक" कर रहे हैं या "युद्ध "कर रहे हैं। मसलन्, कालेधन के खिलाफ सर्जीकल स्ट्राइक, गंदगी के खिलाफ युद्ध, गरीबी के खिलाफ युद्ध आदि पदबंध आए दिन सत्तातंत्र के प्रचार के रूप में कारपोरेट मीडिया हमारे ज़ेहन में उतार रहा है। वे "सर्जीकल स्ट्राइक'' या "युद्ध" के नाम पर सभी किस्म के वैचारिक मतभेदों को अस्वीकार कर रहे हैं।वे मांग कर रहे हैं कि वैचारिक मतभेद बीच में न लाएँ। वे यह भी कह रहे हैं यह बहस का समय नहीं है, काम करने का समय है बहस मत करो, सवाल मत करो, सिर्फ सत्ता का अनुकरण करो।

एक जमाना था आम आदमी साम्प्रदायिक विचारों से नफरत करता था अपने को उनसे दूर रखता था लेकिन आज स्थिति गुणात्मक तौर पर बदल गयी है, आज साम्प्रदायिक विचारों से आम आदमी नफरत नहीं करता बल्कि उससे जुड़ना अपना सौभाग्य समझता है। कल तक धार्मिक पहचान मुख्य नहीं थी लेकिन आज दैनन्दिन जीवन में वह प्रमुख हो उठी है, पहले जाति पूछने में संकोच करते थे आज खुलकर जाति पूछते हैं।

आज फासिज्म वह है जो आपको पसंद नहीं है। आज आप पुरानी फासिज्म की अवधारणाओं के आधार पर उसे समझा नहीं सकते। मसलन् मोदीभक्तों और मोदी सरकार को जो पसंद नहीं है उसे वे मानने को तैयार नहीं हैं। वे सिर्फ इच्छित बात ही सुनना चाहते हैं। अनिच्छित को इन लोगों ने फासिज्म बना दिया है। यह ओरवेलियन परिभाषा है कि जो बताती है अनिच्छित है वह फासिज्म है।

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