राजनीति में माँ : सत्ता की माँ और प्रतिरोध की माँ

आज कपिल मिश्रा की माँ के पत्र पर मीडिया और राजनीति में कोहराम मचा हुआ। आज जरूरत है कि हम फर्क करना सीखें। सत्ता की माँ और प्रतिरोध के माँ के बीच। ...

डा. मंज़ूर अली 

अनिल कुमार यादव 

आप के नेता रहे कपिल मिश्रा के मां का पत्र मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं। पत्र में लिखे गए वाक्य समाचारों के हेडलाइन्स में तब्दील हो गए हैं - झूठ तुम्हारी मदद नहीं कर सकता, केजरीवाल भगवान से डरो। झूठ कितनी बार, अरविन्द ? जैसी हेडलाइन्स तैर रही हैं।

लोग सोशल मीडिया पर इस माँ के पत्र को शेयर कर रहे हैं। भावनाओं से ओत-प्रोत।

मां शब्द ही ऐसा है।

कपिल की मां से कई मांओं की याद आ रही है।

मैक्सिम गोर्की की मां से चंदू की माँ तक। डॉ रामकुमार वर्मा की  'दीपदान' की पन्ना धाय माँ से लेकर नजीब की माँ तक।

महाभारत में अपने बेटों की रक्षा के लिए कर्ण से कवच और कुण्डल मांगने गयी कुंती से लेकर नोटबंदी के समय पैसे निकलने गयी प्रधानसेवक की माँ तक। हर माँ  का चेहरा सामने आ रहा है।

आज इन सभी माँओं की बात होनी चाहिए कि माँओं ने क्या -क्या नहीं किया है अपने बेटों के लिए। 

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महाभारत के समय जब पांडव युद्ध में कमजोर पड़ने लगे तो कुंती दानवीर कहे जाने वाले कर्ण के पास गयीं और उससे उसका कवच और कुण्डल दान में मांग लाईं, जिसके रहते कर्ण को हरा पाना मुश्किल था। यह नैतिक नहीं था, विश्वासघात था। एक शातिर रणनीति का हिस्सा था। राजनीति ने माँ का इस्तेमाल किया।

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ठीक जब नोटबंदी तब भी एक मां लाइन में लगी और सत्ता नैतिकता की नई सीमा रेखा बना डाली कि माँ लाइन में लगी है। लाइन में लगी माँ के बहाने कई बुनियादी और जरुरी सवाल दबा दिए गए।

डॉ. रामकुमार वर्मा की एकांकी है - दीपदान।

दीपदान में भी  माँ का कैरेक्टर है - पन्ना धाय। जो एक राजकुमार को बचाने के लिए अपने बेटे को उसके उस बिस्तर पर लिटा देती है, जहां राजकुमार सोता था और पन्ना धाय का बेटा सत्ता की लड़ाई में मार दिया जाता है और राजकुमार बच जाता है। यानि सत्ता अपने को बचाने के लिए भावनाओं  बुनकर गरीब माँ के बेटे की बलि ले लेती है।

एकांकी की पृष्ठभूमि मध्यकालीन है।

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अब बात थोड़ा लोकतंत्र की कर लें।

केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला नाम के छात्र को राजनीति ने शातिर तरीके से मार डाला। लेकिन इस बार माँ दीपदान करते सिर्फ रोई नहीं, बल्कि सड़क पर उतरी। हैदराबाद से लेकर दिल्ली तक हर मोर्चे पर इन्साफ की लड़ाई में रोहित की माँ आगे खड़ी रहीं।

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इसके बाद जेएनयू से गायब हुए नजीब की माँ सत्ता के असंवेदनशीलता के खिलाफ सड़क पर उतरी।

सिवान के जेपी चौक पर शहीद हुए चंद्रशेखर की माँ के बाद यह शायद पहली बार हुआ कि हज़ारों की संख्या में पूरे देश में छात्र और युवा इन मांओं के नेतृत्व में आंदोलनरत हैं। आज कपिल मिश्रा की माँ के पत्र पर मीडिया और राजनीति में कोहराम मचा हुआ। आज जरूरत है कि हम फर्क करना सीखें। सत्ता की माँ और प्रतिरोध के माँ के बीच। 

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