शिक्षा कर्मियों का आन्दोलन : गुमराह कर रही रमन सरकार

हड़ताली कर्मियों की आलोचना आज से नहीं हमेशा से समाज में सरकार के द्वारा की जाती है और कराई जाती है। छत्तीसगढ़ में यह कोई नयी बात नहीं है।...

अतिथि लेखक

शिक्षा कर्मियों की कत्लगाह बन गया है छत्तीसगढ़

शिक्षा कर्मियों के आन्दोलन के समर्थन में

अरुण कान्त शुक्ला

हर आन्दोलन के साथ कुछ ऐसी भी मांगें जुडी रहती हैं, जो अत्यंत साधारण होती हैं। उन पर अनमने ढंग से हाँ करके यह प्रचार करना कि शिक्षा कर्मियों की मांगों को मुख्यमंत्री ने मान लिया, यह अखबारों और लोकल चैनल के माध्यम से सरकार का ही काम था। शिक्षा कर्मी सिर्फ यह कहकर मुख्यमंत्री निवास से बाहर आये थे कि वे बैठक करके निर्णय को बताएँगे। प्रत्येक संगठन जब सरकार या प्रबंधन की मांगों से असहमत होता है तो उसे ऐसा ही करना पड़ता है। यह एक जनतांत्रिक बात है, जिसका पालन सरकार और उसके नुमाइंदे तो नहीं करते, पर, ट्रेड युनियन जैसे संगठनों में यह अभी तक जारी है और देश में भी थोड़ा बहुत जो जनतंत्र है, उसमें इसका बड़ा योगदान है। यदि सरकार ईमानदार और सही है तो सार्वजनिक रूप से घोषणा क्यों नहीं करती कि शिक्षाकर्मियों को किन मांगों को उसने मंजूर किया है?  सारा कच्चा चिठ्ठा बाहर आ जाएगा।

हड़ताली कर्मियों की आलोचना आज से नहीं हमेशा से समाज में सरकार के द्वारा की जाती है और कराई जाती है छत्तीसगढ़ में यह कोई नयी बात नहीं है

शिक्षा कर्मियों की कम से कम तीन मांगे तो ऐसी हैं, जो बरसों से लंबित हैं। पहली यह कि शिक्षा कर्मियों का राज्य सरकार संविलियन करे।

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि वर्षों शिक्षा क्षेत्र में सेवाएं देने के बाद भी और समय-समय पर, जब भी वे आन्दोलन की राह पर चले, उनके मानदेय को बढ़ाते रहने के बावजूद, शिक्षाकर्मी आज भी असंगठित क्षेत्र के ठेका मजदूरों की हैसियत में हैं।

आज राज्य सरकार यह प्रचारित करने में लगी हुई है कि वर्ष 1998 में शिक्षकों के पद को ‘मृत’ घोषित कर यह नीति बनी थी कि भविष्य में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जायेगी। यह एक गढ़ा हुआ तर्क है। पहली बात तो 1998 में यह नीति मध्यप्रदेश की दिग्विजय सरकार ने बनाई थी और तब भी इसका व्यापक विरोध पूरे मध्यप्रदेश में हुआ था। अब, जबकि छत्तीसगढ़ पृथक राज्य है, वह मध्यप्रदेश सरकार की बनाई हुई नीति को ढोने के लिए बाध्य नहीं है। दूसरी और महत्वपूर्ण बात कि वर्ष 2003 और 2008 में हुए विधानसभा के चुनावों के दौरान भाजपा ने अपने घोषणापत्रों में शिक्षा कर्मियों को संविलियन देने का वायदा किया था। उसी वायदे को याद दिलाते हुए शिक्षा कर्मियों ने 2011 तथा 2012 में हड़तालें की थीं। क्या ऐसा वायदे करते समय इस सरकार को और भाजपा को नहीं मालूम था कि वह एक तथाकथित ‘मृत’ पड़ के लिए यह वायदा कर रही है? भाजपा की रमन सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुकरते हुए आज उनके आन्दोलन को दबाने के लिए वही कदम उठा रही है जो उसने 2011 तथा 2012 में उठाये थे। याने बर्खास्तगी की धमकी और कुछ दिनों बाद शायद उनके पंडाल उखाड़ने तथा उन्हें लाठियों से खदेड़ने का काम भी शुरू हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। यह गुस्सा दिखाना कि मुख्यमंत्री के बात करने के बाद भी हड़ताल की जा रही है, लोकतांत्रिक नहीं है     

दूसरा मुद्दा उनको दिये जाने वाले मानदेय से संबंधित है। आज भी शिक्षा कर्मियों को अन्य नियमित कर्मचारियों के समान भुगतान नहीं होता है। प्रत्येक दो तीन माह में राज्य मंत्रीमंडल उनके लिए अलग से राशि जारी करता है और ब्लाक मुखायल पहुँचते-पहुँचते अनेक बार दो तीन माह का समय बीत जाता है। शिक्षा कर्मियों के लिए तीन से चार माह बिना वेतन गुजारने में और कितना कष्ट और समाज में कितने उपहास का पात्र बनना पड़ता है, यह उनके साथ नजदीक से जुड़े बिना नहीं जाना जा सकता। यही कारण है कि यहीं छत्तीसगढ़ में बीमारी का इलाज नहीं करवा पाने के कारण या बाजार में उधारी नहीं चुकाने के कारण शिक्षा कर्मियों की मृत्यु या आत्महत्या के मामले भी सामने आये हैं। उनकी सातवें वेतन आयोग के समान वेतन मान देने की मांग जायज मांग है। विडंबना है कि एक दिन की विधायकी से प्रत्येक बार वेतन में बढ़ोत्तरी का फायदा तथा एक दिन की विधायकी से पेंशन के लिए हकदार होने और उसमें हर बढ़ोत्तरी का फ़ायदा लेने वाले विधायकों और उन्हीं में से चुने गये मुख्यमंत्री और मंत्रियों को  शिक्षा कर्मियों  की मांग बेजा लगती है। पंचायत कर्मी होने का अर्थ जायज वेतन से वंचित रहना तो कतई नहीं हो सकता।

छत्तीसगढ़ में अधिकाँश शिक्षाकर्मी राज्य गठन के बाद नियुक्त हुए हैं। जिला पंचायतों ने न केवल उनको भर्ती करने का दायित्व उठाया, बल्कि उनकी पदस्थापना भी जिले में पंचायत के द्वारा ही की गयी है। आज जिलों की संख्या बढ़कर 27 हो गयी है। जिले बदलने से शिक्षा कर्मियों का स्थानान्तरण लगभग बंद हो गया है। जबकि नया जिला बनने के बाद उन्हें अपने मूल जिले में जाने का अवसर मिलना चाहिये था। उनके स्थानान्तारण की कोई भी नीति पिछले 17 सालों में सरकार नहीं बना पाई है। इसने उनके जीवन को कठिन बना दिया है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि उन्हें राज्य सरकार संविलियन देने तैयार नहीं। उन्हें शासकीय कर्मचारी का दर्जा देने तैयार नहीं, पर, स्थानान्तारण नीति राज्य सरकार घोषित करती है। यह सत्ता के पाखंड की चरम सीमा है। उनकी एक और प्रमुख मांग पदोन्नति की भी है। पर, उस सरकार से जो उन्हें उचित सम्मान नहीं दे पा रही, पदोन्नति की मांग पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता।  मैं नहीं जानता कि वे इस आन्दोलन को संवेदनहीन सरकार के दबाव के सामने कितने दिन चला पायेंगे, पर, उनके आन्दोलन को एकदम खारिज करना बहुत गलत है।

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