मोदी जी ! कौन डरता है चुनाव से?

मोदी सरकार के लिए चुनाव एक मुसीबत है.... मोदी सरकार ने जिस समर्थन मूल्य की घोषणा की है, वह किसानों की वास्तविक लागत से डेढ़ गुना किसी भी तरह नहीं है।...

मोदी जी ! कौन डरता है चुनाव से?

0 राजेंद्र शर्मा

मोदी सरकार ने हाल ही में खरीफ की फसलों के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी की घोषणा की है। इसके साथ ही उसने जोर-शोर से इसका प्रचार शुरू कर दिया है कि उसने किसानों की पैदावार के लिए, उनकी लागत के ऊपर से पचास फीसद लाभ सुनिश्चित करते हुए, लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने का 2014 के चुनाव का अपना वादा पूरा कर दिया है। इस दावे में काफी बड़े झोल हैं, जिनकी ओर सिर्फ किसान संगठनों तथा विपक्षी दलों ने ही नहीं बल्कि खेती के अर्थशास्त्र के अनेक जानकारों ने भी देश का ध्यान खींचा है।

पहला झोल तो यही है कि मोदी सरकार ने जिस समर्थन मूल्य की घोषणा की है, वह किसानों की वास्तविक लागत से डेढ़ गुना किसी भी तरह नहीं है। हां! भाजपा हाथ की सफाई दिखाकर इसी को लागत से डेढ़ गुना बताने की कोशिश जरूर कर रही है। दरअस्ल उसने अपने चुनावी वादे के विपरीत, खेती की लागत की गणना के स्वामिनाथन फार्मूले को आधार न बनाकर, एक ऐसे फार्मूले के आधार बनाया है जो लागत की गणना में जमीन के खर्चे को हिसाब में ही नहीं लेता है और इस तरह किसानों की लागत को, उनकी वास्तविक लागत से काफी कम कर के आंकता है। इसका नतीजा यह है कि जिस समर्थन मूल्य का एलान किया गया है, सभी उपजों के मामले में वास्तविक लागत के डेढ़ गुने से काफी कम है।

          दूसरा बड़ा झोल यह है कि सरकार ने जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की भी है, वह भी किसानों के लिए वास्तविकता तभी बन सकता है, जब घोषित मूल्य पर बड़े पैमाने पर सरकारी एजेंसियां पैदावार की खरीद करने के लिए बाजार में उतरें। किसानों को इस घोषित मूल्य का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है, जब यह सुनिश्चित हो कि इस न्यूनतम मूल्य पर उसकी पैदावार खरीदने के लिए सरकारी एजेंसियां तो हैं ही। इस तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य को आमतौर पर बाजार का ही न्यूनतम मूल्य बनाया जा सकता है और सरकारी एजेंसियों की खरीदी के बाहर के बाजार में भी किसानों को यह न्यूनतम मूल्य मिलना सुनिश्चित किया जा सकता है। लेकिन ऐसी कारगर सरकारी खरीद के दूर-दूर तक कोई आसार नजर नहीं आते हैं। उल्टे नवउदारवादी नीतियों के हल्ले में, सरकारी खरीद की व्यवस्था को लगातार कमजोर ही किया जा रहा था और मोदी के राज के चार साल में तो इसके तंत्र को बिल्कुल छिन्न-भिन्न ही कर दिया गया है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि खासतौर पर छोटे तथा सीमांत किसान, विभिन्न मजबूरियों के चलते घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम में अपनी पैदावार बेचने पर मजबूर होंगे और इस तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य में इस बढ़ोतरी का लाभ भी नहीं पा सकेंगे।

मोदीराज में पहली बार न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई

          बहरहाल, मोदी सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की हाल में जो घोषणा की है उसके बाद भी किसानों को लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाने का उसका चुनावी वादा चाहे कितनी ही दूर रह जाता हो, फिर इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। सच तो यह है कि मोदी राज के चार साल में न्यूनतम समर्थन मूल्य के मामले में जो कुछ होता रहा था उससे बिल्कुल अलग, न्यूनतम समर्थन मूल्य में पहली बार उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। और जैसे इसका बाकायदा एलान करते हुए कि यह बढ़ोतरी आने वाले आम चुनाव में किसानों के वोटों को नजर में रखकर ही गयी है, इस बढ़ोतरी की घोषणा के साथ ही खुद प्रधानमंत्री ने देश के विभिन्न हिस्सों में अपने धुंधाधार दौरों तथा चुनावनुमा सभाओं का सिलसिला शुरू भी कर दिया है। वास्तव में इस सिलसिले के शुरू होने के साथ ही, इसकी खबर भी आयी है कि इस सिलसिले को ऊंचे स्वर में जारी रखते हुए, खुद प्रधानमंत्री फरवरी के महीने तक देश के विभिन्न हिस्सों में 50 सभाएं करने जा रहे हैं, जिनमें से हरेक के जरिए श्रोताओं को जुटाने के रूप में औसतन तीन या तीन से ज्यादा लोकसभाई क्षेत्रों को कवर किया जा रहा होगा। ऐसा समझा जाता है कि इस साल के आखिर तक होने वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान के विधानसभाई चुनावों के लिए होने वाली प्रधानमंत्री की चुनावी सभाएं, इस गिनती में शामिल नहीं हैं। बाद में यह स्पष्टीकरण भी आया कि उक्त अभियान के हिस्से के तौर पर प्रधानमंत्री की तरह ही, अमित शाह तथा अन्य बड़े भाजपा नेताओं की भी सभाएं की जानी हैं।

मोदी सरकार के लिए चुनाव एक मुसीबत है

          यह पूरा प्रसंग यह तो बताता ही है कि भाजपा किस तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी को चुनाव में अपनी कामयाबी के लिए जरूरी मान रही है तथा उसे भुनाने की उम्मीद कर रही है। यह प्रसंग यह भी बताता है कि अगर चुनाव के लिए किसानों का समर्थन हासिल करने की मजबूरी नहीं होती, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य में इतनी बढ़ोतरी भी, मोदी सरकार के हाथों से छूटने वाली नहीं थी। बेशक, यह बढ़ोतरी देने की अनिच्छुक सरकार की नजर से देखा जाए तो, चुनाव एक मुसीबत है जिसकी वजह से उसे किसानों को यह राहत देनी पड़ी है। लेकिन, इससे राहत पाने वाले किसानों की नजर से देखा जाए तो वही चुनाव एक तरह का वरदान है, जो आमतौर पर प्रतिकूल हालात में भी उन्हें कुछ न कुछ राहत दिलाता है। जो बात किसानों के लिए सच है, वही बात आज के हालात में दूसरे तमाम मेहनत-मशक्कत की रोटी खाने वालों के लिए भी सच है। चुनाव ही है जो आमतौर पर सत्ता में पहुंचने वाली पार्टियों को आम जनता की याद दिलाता है और उसकी अपेक्षाओं के प्रति संवेदनशील बनाता है। इसलिए, कम से कम आम जनता को बार-बार या जल्दी-जल्दी चुनाव होने से कोई तकलीफ नहीं है। हां! इससे हमारे जैसे देशों के सत्ताधारी वर्गों को और राजनीति से लेकर मीडिया तक, विभिन्न क्षेत्रों में उनके प्रतिनिधियों को जरूर तकलीफ होती है। उनके लिए तो पांच साल में एक बार जनता की सुनने, उसे खुश करने के लिए थोड़ी-बहुत रियायतें देने की मजबूरी भी, बहुत भारी बोझ है।

          इसीलिए, वही प्रधानमंत्री जो चुनाव वर्ष में किसानों को खुश करने के लिए खेती की उपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी का संदेश खुद देश भर में घूम-घूमकर देने में लगे हुए हैं, सिर्फ इस तर्क के आधार पर कि जल्दी-जल्दी चुनाव होने से देश पर अनावश्यक बोझ पड़ता है, लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ कराने की मुहिम छेड़े हुए हैं। वास्तव में इस तथाकथित ‘चुनाव सुधार’ का उनका तथा उनके पीछे खड़े सत्ताधारी वर्ग का आग्रह इतना ज्यादा है कि इसके लिए वे देश के संविधान में ही भारी कांट-छांट करने के लिए भी तैयार हैं। विशेष रूप से राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल में काट-छांट करने से लेकर, बहुमत का समर्थन न होते हुए भी किसी न किसी तरह सरकार चलाते रहने तथा अवधि से पूर्व विधानसभा भंग होने पर शेष अवधि का राष्ट्रपति/ राज्यपाल शासन अपनाने तक के, विधि आयोग तथा नीति आयोग के सुझाव, इसी के सबूत हैं। लेकिन, यह देश की नहीं, देश के सत्ताधारी वर्ग की ही मांग है। वही है जिसे सरकार के अपने हितों की सेवा करने के रास्ते में, टीवी विज्ञापन की तरह बार-बार चुनाव का व्यवधान मंजूर नहीं है। जहां तक जनता का सवाल है, वह तो इस व्यवधान की उत्सुकता से प्रतीक्षा ही करती है। यह जनता के हितों को प्रतिबिंबित करने की नजर से, पहले ही संकुचित जनतंत्र को और भी सिकोड़ने की ही मांग है। सत्ताधारी वर्ग ही चुनाव से डरता है। आम जनता के लिए तो चुनाव एक त्यौहार है।                                                                   0

         

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।