मुक्तिबोध की यह स्पष्ट मान्यता है कि अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे

मुक्तिबोध लेखक के लिए जनतंत्र की तलाश करने वाले लेखक हैं। वे जानते हैं कि लेखक की स्वतंत्रता को खत्म करने से समाज की कितनी हानी होगी। असल में यह समाज के लिए अत्यंत घातक है...

अतिथि लेखक

अभिव्यक्ति की आज़ादी और मुक्तिबोध

-आदित्य कुमार गिरि

मुक्तिबोध लेखक की शक्ति में विश्वास करने वाले लेखक हैं। अपनी रचनाओं में वे इसे बार-बार प्रकट भी करते रहे हैं। उनकी मान्यता है कि लेखक अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता से ही बड़ा बन सकता है। उसे अपने समाज के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। कला तभी सार्थक है जब वह अपनी सामाजिक भूमिका को पूरे करे। तमाम शक्तियां हैं जो लेखक को उसके मार्ग से डिगाने का काम कर रही हैं। और करती भी रही हैं। मुक्तिबोध जानते हैं कि लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता से उन शक्तियों को डर होता है,जो समाज को अपने फायदे के लिए शोषण की चक्की में पीसते हैं। अपने तरीके से उसे संचालित करते हैं।

मुक्तिबोध लेखक की प्रकृति से भलिभाँति परिचित हैं। वे जानते हैं कि लेखक प्रकृत्या स्वतंत्र होता है और वह शोषण के हर प्रकार पर अपनी लेखनी को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।

मुक्तिबोध लेखक के इर्द-गिर्द के पूरे माहौल की पड़ताल करते हैं और लेखक को पहले से ज्यादा चौकन्ना होने की सलाह देते हैं। मुक्तिबोध के ऐसे लेख जिनमें लेखक के कर्म,उसकी जिम्मेदारी,उसकी चुनौतियों आदि पर उन्होंने लिखा है,उन निबंधों का अध्ययन करना चाहिए। उन निबंधों में कथन में जो तीव्रता है वह असल में मुक्तिबोध के लेखन-कर्म के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को व्यक्त करता दिख पड़ता है।

मुक्तिबोध के लेखक का निर्माण जिन परिस्थितियों की उपज है उनमें प्रगतिशील आंदोलन की बड़ी भूमिका रही है। इसी के तहत वे नई(बदल रही) परिस्थितियों की सही पड़ताल भी कर पाये हैं। मुक्तिबोध पूंजीवाद के खतरों की तरफ इशारा भी करते रहे हैं। पूंजीवाद ने लोकलुभावने वादों की आड़ में शोषण का नया चक्र रचा है। मुक्तिबोध इसे समझ पाते हैं।

मुक्तिबोध यह भी जानते हैं कि पूंजीवाद लेखक की शक्ति से परिचित है तभी वह तमाम उपायों और प्रपंचों को रच रहा है ताकी लेखक को उसके मार्ग से भटका सके। मुक्तिबोध ऐसे कठिन समय में लेखक की ओर से मोर्चा सँभालते हैं और ऐसा करते हुए वे न सिर्फ पूंजीवाद के षडयंत्रों का पर्दाफाश करते हैं बल्कि लेखक का भी मार्ग दर्शन करते हैं।

आदित्य कुमार गिरि, लेखक सेठ आनन्दराम जयपुरिया कॉलेज, कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं।

पूंजीवादी शक्तियां लेखक के सामने कई सारी चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। जिनमें लेखक की दो सबसे बड़ी प्रवृति को कुंद करने का प्रयास किया जा रहा है। पहला जनवादी दृष्टिकोण और दूसरी प्रवृति है उसके प्रोटेस्ट करने की प्रवृति। पूंजीवाद समाज में जिन मूल्यों की स्थापना का प्रयास कर रहा है वहां लेखक अपनी इन दोंनों प्रवृतियों से दूर होता जा रहा है। मुक्तिबोध स्पष्ट करते हैं कि विरोध के सारे मंचों को पूंजीवाद ने अपने कब्ज़े में ले लिया है। अभिव्यक्ति के सारे साधनों पर उसका अंकुश है। इसके साथ ही लेखक के जो मूल्य थे जो प्रगतिशील आंदोलन के कारण बने थे,उन्हें पूंजीवाद नष्ट करने में लगा हुआ है। उसकी पूरी कोशिश है कि लेखक जनवादी चेतना का त्याग कर दे और कॉस्मेटिक प्रसाधन के एक प्रकार के रुप में काम करे। वह विरोध की कोई बात न करे। उसे केवल कलावादी मूल्यों के तहत काम करना चाहिए। यथार्थवाद के प्रति घृणा का प्रचार किया जा रहा है। यथार्थ को व्यक्त करने वाले लेखक को कला की शुद्धता का प्रश्न उठाकर उसके खिलाफ जमीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है। मतलब जो इस चेतना को व्यक्त करे उसे असामाजिक घोषित करने का षडयंत्र किया जा रहा है।

मुक्तिबोध अपनी लेखनी की शुरुआत इसी बिंदु से करते हैं। वे जानते हैं कि शीतयुद्धीय राजनीति की आड़ में पूंजीवाद हर तरह से समाजवादी मूल्यों को नष्ट करने के प्रयास में लगा हुआ है। वे लेखक को अपनी छोटी-छोटी जरुरतों को भूलकर पूंजीवाद के खिलाफ और ज्यादा आक्रामक होने को कहते हैं। मुक्तिबोध की यह स्पष्ट मान्यता है कि अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। क्योंकि अब शोषण के नये-नये रूपों ने जन्म ले लिया है। समाज के जनवादी मूल्यों,खेमों और मोर्चों को नष्ट करने के नए-नए उपक्रम किये जा रहे हैं। लेखक के सामने जो नया समाज है वह ग्रामीण समाज से एकदम भिन्न अत्यंत जटिल समाज है। इस समाज की प्रकृति पुराने समाज से बहुत तीव्र है। यह मनुष्य को शोषण के कभी न खत्म होने वाले चक्र में फँसाने का अंतहीन संसार है। जो वैचारिक मोर्चे पर काम कर रहा है। अतः उसके विरोध में रहने वालों को जनवादी मोर्चों को शक्तिशाली बनाना चाहिए। मुक्तिबोध इसलिए लेखक को एकजुट होने तथा पूंजीवाद से लड़ने की बात करते हैं। चूंकी अभिव्यक्ति के सारे मंच हथिया लिए गये हैं इसलिए लेखक को अपनी रचना में नए तरीके से अभिव्यक्ति के मंचों को निर्मित करना होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि समाज के अंदर जिन विश्वासों को पूंजीवाद निर्मित करने की कवायद में लगा हुआ है उन मूल्यों का पर्दाफाश करना अब पहले से कठीन हो गया है। इसके अलावा लेखक के सामने और कई ऐसे प्रश्न भी उठा दिए जा रहे हैं जिसकी भूलभुलैया में लेख के खो जाने के खतरे हैं। मुक्तिबोध का लेखकीय मानस लेखक को इस मोर्चे से अवगत कराता है। आज मुक्तिबोध की प्रासंगिकता इसलिए और ज्यादा बढ़ जाती है।

मुक्तिबोध लेखक के लिए जनतंत्र की तलाश करने वाले लेखक हैं। वे जानते हैं कि लेखक की स्वतंत्रता को खत्म करने से समाज की कितनी हानी होगी। असल में यह समाज के लिए अत्यंत घातक है। समाज की स्वतंत्रता और लेखक की स्वतंत्रता के बीच के संबंध को मुक्तिबोध अच्छी तरह से समझते हैं। मुक्तिबोध के लेखन में लेखक और लेखन के जनतंत्र की चिंता उनके साहित्य को अत्यंत महत्वपूर्ण बना देता है। क्योंकि मुक्तिबोध की यह चिंता समाज की समवतंत्रता का भी आधार है। और पूंजीवादी समाज लेखक को भी अंकुश में रखने के षडयंत्र के तहत काम कर रहा है। मुक्तिबोध के लेख इसलिए भी और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि उनके लेखों की टाइमिंग बहुत महत्वपूर्ण है। नई राजनीतिक व्यवस्था में जब कल्याणकारी राज्य की अवधारणा दी जा रही थी,मुक्तिबोध उसी समय इस कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के पीछे के षडयंत्र को न सिर्फ समझा है,बल्कि उसका पर्दाफाश भी किया है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के पीछे के शोषण और गुलामी को मुक्तिबोध साफ देख पा रहे थे। मुक्तिबोध इस मायने में एक बड़े लेखक हैं जिन्हें कायदे से पढ़ा जाना चाहिए।

 

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