मुसलमानों को सामूहिक अवसाद से निकलना है तो उन्हें राजनीति करना ही होगा... राजनीति यानी चुनावी राजनीति

NGOs ने किसी भी अन्य समुदाय के मुकाबले सबसे ज़्यादा सियासी नुकसान मुसलमानों का किया है। इसने हमारी जेहनियत को ही गैर राजनीतिक बना कर हमारी दिशा ही लोकतंत्र के खिलाफ कर दी है

शाहनवाज आलम
Updated on : 2018-09-02 10:14:26

मुसलमानों को सामूहिक अवसाद से निकलना है तो उन्हें राजनीति करना ही होगा... राजनीति यानी चुनावी राजनीति

शाहनवाज आलम

मुस्लिम विरोधी माहौल के चलते आज मुसलमानों में राजनीतिक व्यवस्था को लेकर घोर निराशा, ग़ुस्सा, डर और मोहभंग जैसी स्थिति बनी हुई है। लेकिन अगर हम ऊपर की चारों स्थितियों का मूल्यांकन मुल्क की मौजूदा हालात और दूसरे सामाजिक समूहों के मौजूदा और ऐतिहासिक तजुर्बों के बरक्स करें तो पाएंगे कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समुदायों की निराशा की स्थितियां उन्हें नई उम्मीदों के द्वीप तैयार करने में भी मददगार साबित हुए हैं। मसलन दलित या पिछड़ों की राजनीति का उदय ही दूसरे दलों और सियासी निज़ाम से निराशा के कारण नये रास्तों की तलाश के कारण हुई। इसी तरह निज़ाम से ग़ुस्से ने भी समुदायों के नए सियासी तहरीक़ों का रास्ता बनाया, वहीं डर तो संभवतः भारतीय लोकतंत्र को विस्तार देने, उसे सबसे निचले सतह के लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने के लिए तैयार करने की सबसे बड़ी वजह रही है।

निज़ाम के ज़ुल्म से डरे समुदायों ने निज़ाम पर कब्ज़ा करके उसे अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की सलाहियत का प्रदर्शन किया है। बसपा इसकी सबसे प्रासंगिक नज़ीर है।

कहने का मतलब ये कि निज़ाम से निराशा, ग़ुस्सा और डर किसी भी समुदाय के राजनीतिक उत्थान में बाधा साबित नहीं हो सकती, बल्कि उल्टे catalyst का काम करती हैं, बशर्ते कि इन स्थितियों को काउंटर करने और उसके बेहतर इस्तेमाल की सलाहियत हो। उसके पास दूरंदेश लीडरशिप हो। इसलिये मैं मानता हूँ कि मौजूदा हालात में मुसलमानों में छाई निराशा, ग़ुस्सा और डर कोई बड़ी समस्या नहीं है। समस्या चौथी स्थिति यानी निज़ाम से मोहभंग है। ये एक ऐसी समस्या है जो ना सिर्फ हमें दूरदर्शी होने से रोकती है बल्कि इसके चलते हम मौजूदा दौर में अप्रासंगिक होते चले जाते हैं। क्योंकि मोहभंग की यह स्थिति हमें अपने डर, ग़ुस्से और निराशा को अपनी ताकत बनाने से रोकती है। लिहाजा हम दूसरों की ताकत को बढ़ाने और दूसरों की ताक़त की पनाह में महफूज़ महसूस करने लगते हैं।

दूसरे पीड़ित समुदायों से मुसलमानों को उनका व्यवस्था से मोहभंग उन्हें एक अलग समुदाय बना देता है। इसलिए मुसलमानों को अगर अपने समाजी और सियासी वजूद को बचाना है तो उन्हें सबसे पहले व्यवस्था से मोहभंग की स्थिति से निकलना होगा।

लोकतंत्र में जिसका तरीका व्यवस्था में भागीदारी की ख्वाहिश पैदा होना है। हालांकि ये बहुत आसान नहीं होता। क्योंकि किसी एक समुदाय में इस ख्वाहिश के जागने का मतलब दूसरे समुदायों की ऐसी ही ख्वाहिशों से उसका टकराव होना होता है। इसीलिए हम देखते हैं कि स्थापित वर्गों द्वारा हमेशा कमज़ोर तबक़ों में ऐसी ख्वाहिशों के पनपने यानी उनके राजनीतिक तौर पर जागरूक होने की सुगबुगाहट को हमेशा दबाने की कोशिश होती है। लेकिन जब वे इसमें कामयाब नहीं होते तो वो खुद उनसे उनकी ताक़त को स्वीकार करके उससे समझौता और दोस्ती करते हैं।

आज अगर मुसलमान अपने को ठगा महसूस करता है तो उसकी वजह यही है कि अभी दूसरे लोग उसे इस लायक नहीं मानते कि वो इतने समझदार और जागरूक हो पाए हैं कि उनसे बराबरी के स्तर पर समझौता और दोस्ती किया जा सके।

कहने का मतलब यह कि लोकतंत्र में ठगा वही जाता है जो बेवक़ूफ़ और कमज़ोर होता है। यानी लोकतंत्र की यह एक अलिखित निर्मम सच्चाई है कि आप अपने शोषण के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते।

और हां, यहां यह कह कर भी आप अपनी ज़िम्मेदारी से फ़ारिग नहीं हो सकते कि संविधान सेक्युलर और सबको बराबरी का दर्ज़ा देता है इसलिए सब कुछ ठीक हो जायगा या न्यायपालिका आपका साथ इसलिए दे देगी कि आप मजलूम हैं। ऐसा सोचना अपने को जानबूझ कर धोके में रखना होगा। क्योंकि अदालतें भी उसी की तकलीफ को एड्रेस करती हैं जो हल्ला मचा सकने की ताक़त रखता है। जो सियासत को प्रभावित करने की हैसियत रखता है। सब ने देखा है कि रिजर्वेशन के खिलाफ कई बार निर्देश देने के बावजूद न्यायपालिका को हमेशा ओबीसी और दलित आक्रोश के आगे झुकना पड़ा है।

इसीलिये हमारी सबसे बड़ी और फौरी ज़रूरत है कि हम उन कारणों और एजेंसियों की शिनाख्त करें जो हमें लगातार मोहभंग की स्थिति में बनाये रखना चाहते है।

मेरी समझ में ये दो एजेंसियां हैं। पहला, धार्मिक नेतृत्व का दावा करने वाले यानी उलमा। इस पर फिर कभी बात रखूंगा। फ़िलहाल सिर्फ यह कि मुसलमान इस बात पर बहुत गर्व करते हैं कि लाखों उलेमाओं ने जंगे आज़ादी में शहादत दी। जो बिल्कुल सही है। ज़ाहिरा तौर पर वो एक सियासी जंग थी यानी ये शहादतें ये स्थापित करती हैं कि उस दौर के उलेमा सियासी तौर पर बहुत जागरूक थे और अवाम को भी सियासी तौर पर बेदार करने में कामयाब थे। सवाल उठता है कि बाद में अचानक ऐसा क्यों हो गया कि यह तबका सियासत को अछूत समझने लगा और मुसलमानों में भी सियासत को लेकर मोहभंग को और बढ़ाने लगा? लाखों धार्मिक संगठनों के बावजूद सियासी बेदारी का यह हाल क्यों? यह स्वाभाविक स्थिति नहीं है। इस पर सोचना होगा।

दूसरी एजेंसी है NGONGOs ने किसी भी अन्य समुदाय के मुकाबले सबसे ज़्यादा सियासी नुकसान मुसलमानों का किया है। इसने हमारी जेहनियत को ही गैर राजनीतिक बना कर हमारी दिशा ही लोकतंत्र के खिलाफ कर दी है, या कहिये कि लोकतंत्र के उलट कर दी है। मसलन, कोई ऊना कांड नया दलित नेतृत्व पैदा कर देता है तो वहीं किसी मुज़फ्फरनगर या गुजरात के तज़ुर्बे के बाद हम NGO के कार्यकर्ता पैदा करते हैं। जो राजनीतिक व्यवस्था से बाहर रहकर राजनीति जनित समस्याओं को हल करने पर ज़ोर देता है और इस तरह राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग को मजबूत करता है। जहां पहली स्थिति से निकले लोग सदन में पहुँच कर अपनी बात रखने की जद्दोजहद करते हैं तो दूसरी स्थिति वाले लोग किसी देशी विदेशी funder के सामने फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट रखते हैं। जहां पहले के लिए डेमोक्रेसी जीवन मरण का सवाल है तो दूसरे के लिए महज एक प्रोजेक्ट। जहां पहला इसे बचाने के लिए अम्बेडकर की तस्वीर लेकर कहीं लड़ते हुए मरकर तो कहीं आत्महत्या करके इस जंग में अपनी भूमिका अदा करता है तो दूसरा फ़र्ज़ी बिल बाउचर बनाकर अपनी दयनीयता साबित करता है। सोचना होगा कि आखिर ऐसा क्यूँ है कि मुसलमान युवक अपनी आबादी के अनुपात से बहुत कम सियासी पार्टियों में है और बहुत ज़्यादा NGO में है? जबकि दूसरे मज़लूम समुदायों के युवा सियासी तौर पर ज़्यादा सक्रीय दिखते हैं।

दरअसल इस स्थिति ने मुसलमानों को एक सामूहिक अवसाद (मास डिप्रेशन) की स्थिति में पहुंचा दिया है। आप किसी 80 साल के मुसलमान से बात करिये या 50, 30 या 15 साल के मुसलमान से, सब एक ही जैसे भय और अवसाद की बात करते दिख जाएंगे। ये एक भयानक स्थिति है। जिसे राजनीतिक मोहभंग ने पैदा किया है। इसलिए अगर इस सामूहिक अवसाद से निकलना है तो आपको राजनीति करना ही होगा। राजनीति यानी चुनावी राजीनीति। इस बीमारी की कोई दूसरी दवाई नहीं होती। इसलिए आप जिस भी पार्टी से न्यूनतम मुद्दों पर भी सहमत हैं, उससे सक्रिय तौर पर जुड़िये। बिल्कुल सहमत नहीं हैं तो अपने विचार पर आधारित अलग पार्टी बनाइये। लेकिन हर हाल में करिए राजनीति ही। और कोई रास्ता नहीं है।

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