सरकार नियम बनाकर जनता से धन ले रही और धोखेबाज कारोबारी उसका धन बैंकों से लूट रहे

पीएनबी जैसे प्रकरण बता रहे हैं कि जनता दोनों ओर से लुट रही है। सरकार नियम बनाकर उससे धन ले रही है और धोखेबाज कारोबारी उसका धन बैंकों से लूट रहे हैं। क्या इसी तरह हमारी बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होगी?...

देशबन्धु
हाइलाइट्स

पीएनबी जैसे प्रकरण बता रहे हैं कि जनता दोनों ओर से लुट रही है। सरकार नियम बनाकर उससे धन ले रही है और धोखेबाज कारोबारी उसका धन बैंकों से लूट रहे हैं। क्या इसी तरह हमारी बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होगी?

पीएनबी : जनता दोनों ओर से लुट रही है। सरकार नियम बनाकर उससे धन ले रही है और धोखेबाज कारोबारी उसका धन बैंकों से लूट रहे हैं

महाघोटाले के सवाल

क्या इसी तरह हमारी बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होगी?

देश के सबसे बड़े रईसों में से एक नीरव मोदी पर एक महाघोटाले का आरोप लगा है। 2016 में फोर्ब्स ने अमीरों की जो सूची जारी की थी, उसमें हीरा कारोबारी नीरव मोदी का नाम 46वें स्थान पर था और उन्हें 11,237 करोड़ रुपयों की संपत्ति का मालिक बताया गया था।

संयोग और हैरत की बात यह है कि नीरव मोदी पर पंजाब नेशनल बैंक से 11,300 करोड़ रुपयों को फर्जी तरीके से लेने का ही आरोप लगा है। यानी उनकी संपत्ति जितनी है, उससे कहीं ज्यादा की ठगी की रकम है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े बैंक पीएनबी में लगभग 1 अरब रुपयों के इस घोटाले का खुलासा बुधवार को हुआ। इसके बाद से पीएनबी के शेयर एकदम टूट गए, जिससे उसके शेयरधारकों को खासा नुकसान हुआ।

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नीरव मोदी और उनसे जुड़ी आभूषण बनाने वाली कंपनियों ने पीएनबी से धोखे से एल ओ यू यानी लेटर आफ अंडरटेकिंग जारी करवा के विदेशों में स्थित बैंकों से एडवांस रकम हासिल की।

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पीएनबी का कहना है कि उसके दो कर्मियों ने धोखाधड़ी कर एलओयू स्विफ्ट के जरिए विदेश में स्थित बैंको को दिए। स्विफ्ट यानी सोसायटी फार वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंनशियल टेलिकम्युनिकेशन के जरिए एलओयू एक बैंक से दूसरे बैंक भेजे जाते हैं। इस प्रक्रिया की जांच तीन स्तरों पर की जाती है। स्विफ्ट इंस्ट्रक्शन का मतलब होता है कि बैंक की सहमति से यह किया जा रहा है। यानी बैंक इसे बनाता है, फिर इसकी जांच होती है और उसके बाद एक और बार सारी जानकारियां पुख्ता करके ही अगले बैंक तक इसे भेजा जाता है। तीन स्तरों पर की गई इस जांच प्रक्रिया के कारण इसे सुरक्षित माना जाता है और अब तक दुनिया में इसके कारण कोई धोखे की खबर नहीं आई है। लेकिन पीएनबी के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से आरोपी नीरव मोदी और उनके सहयोगियों ने यह धोखा भी कर दिखाया।

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एलओयू अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन के लिए इस्तेमाल होते हैं। यह एक तरह से गारंटी पत्र के समान होता है, जिसे एक बैंक अपने ग्राहक की ओर से दूसरे बैंक को जारी करता है। मतलब दूसरा बैंक ग्राहक को एडवांस रकम या कर्ज दे सकता है और उसका अपना बैंक इसकी गारंटी लेता है कि यह रकम तय समय पर चुकता की जाएगी। चूंकि एलओयू एक तरह का उधार पत्र है, इसलिए इसके साथ गारंटी भी होती है। लेकिन पीएनबी मामले में अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि उसने कौन सी गारंटी के बदले एलओयू जारी किए। ऐसा भी नहीं है कि पीएनबी ने अपने बड़े और रईस ग्राहक के फेर में धोखे से एलओयू जारी किया हो। अभी कुछ दिन पहले ही इन्हीं नीरव मोदी पर 2017 में पीएनबी के साथ 280.70 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया था। इसकी जांच सीबीआई और ईडी कर रहे हैं। जब नीरव मोदी और उनके सहयोगियों पर पहले से ही एक फर्जीवाड़े का मामला सामने आ चुका था, फिर कैसे उन्हें चंद दिनों के भीतर दूसरा बड़ा घोटाला करने का मौका मिल गया? बेशक यह सब बैंक के बड़े अधिकारियों की शह के बिना नहीं हुआ होगा। फिलहाल पीएनबी ने अपने कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरु कर दी है। सीबीआई भी जांच कर रही है।

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वित्त मंत्रालय घोटाले को लेकर जताई जा रही आशंकाओं को खारिज करते हुए कहता है कि यह मामला 'नियंत्रण के बाहर’ नहीं है और इस बारे में उचित कार्रवाई की जा रही है।

आश्चर्य है कि मामले का खुलासा होते ही वित्त मंत्रालय को पता चल गया कि मामला नियंत्रण के बाहर नहीं है। क्या सरकार को इतना यकीन है कि वह आरोपियों को पकड़ लेगी, उन्हें दोषी साबित करवा लेगी और उनसे सारी रकम वसूल भी लेगी? अभी तो विजय माल्या और ललित मोदी को ही पकड़ कर देश में वापस नहीं लाया जा सका है। ऐसे में किस आधार पर वह आशंकाओं को खारिज कर रही है।

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 पीएनबी में इस देश की जनता का ही धन जमा है, जिसमें से हजारों करोड़ कुछ लोग चपत कर गए हैं। इससे पहले भी 2015 में बैंक आफ बड़ौदा में भी दिल्ली के दो कारोबारियों की ओर से 6,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का मामला सामने आया था। दो दिन पहले ही देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई ने 2416 करोड़ रुपयों का घाटा होने की सूचना दी है।

बैंकों में एनपीए बढ़ता जा रहा है। मतलब साफ है कि कार्पोरेट घराने कर्ज ले रहे हैं और उसे वापस नहीं कर रहे हैं। सरकार एनपीए के मसले को पिछली सरकार की देन बताती है। लेकिन इन सबके बीच जनता का धन तो खुलेआम लूटा जा रहा है, उस पर सरकार फिक्र क्यों नहीं करती? बीते कुछ समय में बैंकों की हालत सुधारने के लिए कई कदम उठाए गए और इसे आर्थिक वृद्धि, विकास से जोड़ दिया गया। लेकिन पीएनबी जैसे प्रकरण बता रहे हैं कि जनता दोनों ओर से लुट रही है। सरकार नियम बनाकर उससे धन ले रही है और धोखेबाज कारोबारी उसका धन बैंकों से लूट रहे हैं। क्या इसी तरह हमारी बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होगी?

(देशबन्धु का संपादकीय)

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