घटिया मनोरंजन का साधन बनती जा रही हैं समाचार वेबसाइटें

​​​​​​​ऐसी-ऐसी हेडिंग जिन्हें देखकर वाकई कोई हैरान रह जाए कि इस हद तक स्तर गिर गया पत्रकारिता का...

अतिथि लेखक

मनोज कुमार झा

हिंदी में वेब पत्रकारिता को शुरू हुए ज्यादा साल नहीं हुए हैं, पर प्राय: सभी बड़े-छोटे मीडिया समूहों ने अपनी वेबसाइटें शुरू कर दी हैं। इंटरनेट के प्रसार और इंटरनेट डाटा के लगातार सस्ता होते चले जाने के कारण वेबसाइटों की पहुंच भी लोगों तक लगातार बढ़ती जा रही है। स्मार्टफोन की सर्वसुलभता ने भी वेबसाइटों के लिए अच्छा माहौल तैयार कर दिया है। अब ज्यादातर वेबसाइटें स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों को ध्यान में रख कर सामग्री मुहैया कर रही हैं। इसके साथ ही वेबसाइटों की डिजाइनिंग भी कुछ इस तरह की जा रही है कि पाठक आसानी से मोबाइल पर ही समाचार और दूसरी सामग्री पढ़ सकें।

वेबसाइटों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इस पर पाठकों को तत्काल सामाचार मिल जाते हैं, जबकि अख़बारों से उन्हें दूसरे दिन ही समाचार मिल सकते हैं। कोई घटना कहीं हुई नहीं कि वेबसाइटें उसे तत्काल पाटकों तक पहुंचाती हैं और लगातार उनके अपडेट देती हैं। इस तरह, टीवी के बाद पाठकों को तत्काल जानकारी मुहैया कराने का ये सबसे बड़ा माध्यम बन कर उभरी हैं। यही वजह है कि वेबसाइटें पाठकों के बीच बहुत लोकप्रियता हासिल कर रही हैं और इन्हें देखने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। अब तो शायद ही कोई ऐसा अख़बार हो जिसकी वेबसाइट नहीं चल रही हो।

ये वेबसाइटें मीडिया समूहों की कमाई का बड़ा जरिया बन गई हैं। डिजिटल मार्केटिंग के इस युग में इन्हें विज्ञापन भी बड़े पैमाने पर मिलते हैं। ये अख़बारों के पारम्परिक प्रसार की सीमा से पूरी तरह मुक्त हैं। पर इन्हें मुनाफ़ा तभी संभव है जब बड़े पैमाने पर पाठकों तक इनकी पहुंच बन सके। जाहिर है, यह इनके द्वारा मुहैया की जाने वाली सामग्री पर निर्भर करता है।

हिंदी हो या अंग्रेजी, पाटकों का एक बड़ा वर्ग आज भी छपे हुए शब्दों को पढ़ने की आदत से बंधा है और बिना अख़बार पढ़े उसे चैन नहीं मिलता। कोई भी नया माध्यम पहले से चले आ रहे माध्यम का स्थान नहीं ले सकता। मीडिया में होने वाले बदलाव सिर्फ़ तकनीक आधारित ही नहीं होते, यह अलग बात है कि तकनीक का असर कम नहीं होता। पर यह उसकी प्रस्तुति पर ही असर डालता है, मुख्य चीज़ है उसकी सामग्री।

जहां तक सामग्री का सवाल है, तमाम मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि इसमें निरन्तर गिरावट आती गई हैं। हाल के दिनों में जिस तरह आधारहीन समाचारों का प्रकाशन हुआ है, तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता रहा है, उसे देखते हुए मीडिया की विश्वसनीयता में बहुत गिरावट आई है। टीवी माध्यम के प्रति लोगों में ऊब साफ दिखाई पड़ती है।

मीडिया की पक्षधरता जहां जनता के साथ, पाठकों के साथ थी, अब यह खुलकर सत्ता के साथ दिखाई पड़ती है। इससे बहुत से लोगों का मीडिया से ही मोहभंग होना शुरू हो गया है। दूसरी तरफ, सोशल मीडिया उभर कर सामने आता जा रहा है और समाचारों के साझाकरण में इसकी भूमिका बढ़ी है। पर इसकी भी अपनी सीमा है और इसे कभी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

बहरहाल, एक बहुत बड़े पाठक समूह तक पहुंच बनाने के साथ ही वेबसाइटों की भूमिका मुख्य रूप से एक मनोरंजनकर्ता के रूप में ही सामने आ रही है। पाठकों का मनोरंजन पत्रकारिता के लक्ष्यों में एक है। पर लगभग तीन दशक पहले मीडिया ने जैसा घटिया मनोरंजन परोसने की शुरुआत की थी, वह अब घटियापन की हर सीमा को पार करता जा रहा है। पहले यह घटियापन फिल्मों और ग्लैमर से जुड़ी ख़बरों और फीचर सामग्री में आता था, पर आज हिंदी की प्रमुख वेबसाइटों ने इसे हर जगह ठूंसना शुरू कर दिया है। बेवसाइटों में प्रमुख समाचारों का स्थान लगातार कम होता जा रहा है। आज चंद ही ऐसी वेबसाइटें हैं जिनका उद्देश्य पाठकों तक समाचार पहुंचाना है। अगर कहा जाए कि ऐसी वेबसाइटें अपवादस्वरूप हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ज्यादातर वेबसाइटों घटिया मनोरंजन का साधन मात्र बन कर रह गई हैं जिनमें जम कर नंगई, अश्लीलता और फूहड़ता परोसी जा रही है, साथ ही अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जा रहा है। उदाहरण के लिए एक हेडिंग देखें जो आज कई वेबसाइटों में चल रही है – ‘हनुमानजी के जीवित होने का मिला सबूत, वीडियो देक कर रह जाएंगे हैरान!’ जाहिर है, तर्कबुद्धि वाला कोई व्यक्ति यह पढ़कर अपना सिर पीट लेगा, पर ऐसी हेडिंगें जानबूझ कर बनाई जाती हैं और खूब चलती हैं। हो जाएंगे हैरान, रह जाएंगे दंग, कंडोम का ज्यादा यूज करती हैं लड़कियां, होस्टलों में ऐसे जीती हैं लड़कियां लाइफ, ट्रांसजेंडर, सनी लियोनी का फोटोशूट, सेक्सवर्कर्स की ऐसी है लाइफ, जनवरी के महीने में ऐसे करें सेक्स, देखें सोनागाछी में वेश्याओं की लाइफ, ये है नर्क जाने का सीधा रास्ता, ये सीढ़ियां जाती हैं स्वर्ग तक, यहीं उतरा था राम का पुष्पक विमान, विवाहित स्त्रियों को नहीं करने चाहिए ये पांच काम, इस किले में जो गया जिंदा बच कर नहीं आया, यहां रात में नंगी होकर नाचती हैं औरतें जानें क्यों, कुत्ता टांग उठाकर सू-सू क्यों करता है, अबूझमाड़ की अबूझ बातें: यहां औरतों की योनि से लटकता था कद्दू, और ऐसी-ऐसी हेडिंगें जिन्हें देखकर वाकई कोई हैरान रह जाए कि इस हद तक स्तर गिर गया पत्रकारिता का। जाहिर है, ऐसी घटिया सामग्री तथाकथित विद्वान संपादकों की स्वीकृति के बाद ही वेबसाइटों में प्रकाशित होती है और मीडिया मैनेजर व मालिक अपनी इस नीति की सफलता-असफलता को लगातार आंकते रहते हैं।

यह साफ है कि कोई भी समझदार पत्रकार इस तरह का घटिया काम करना स्वीकार नहीं कर सकता, इसलिए संपादक और मीडिया मैनेजर कॉलेजों से निकले नये लड़के-लड़कियों की स्टाफ में भर्ती करने पर ज्यादा जोर देते हैं, क्योंकि वे जो कहा जाएगा, वही मानेंगे, कोई सवाल खड़ा नहीं करेंगे और कम से कम वेतन पर काम करने को राजी रहेंगे। आज वेबसाइटों में इसी नीति को अंजाम दिया जा रहा है। ये खुल कर कहते हैं कि उनका पाठक युवा वर्ग है और उनके लिए गंभीर सामग्री कोई मायने नहीं रखती। लेकिन वे यहां यह भूल जाते हैं कि युवाओं का एक बड़ा वर्ग गंभीर सामग्री पढ़ने के साथ और देश-दुनिया के समाचारों की जानकारी हासिल करना चाहता है और जब हिंदी-अंग्रेजी की तथाकथित लोकप्रिय कही जाने वाली वेबसाइटों में ऐसी सामग्री उसे नहीं मिलती तो वह देश-विदेश की अच्छी साइटों पर चला जाता है, क्योंकि इंटरनेट की दुनिया उन्मुक्त और सीमाहीन है।   

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