अगर मैं पाप करता हूं, तो मैं धार्मिक तरीके से ही पाप करता हूं !!

वह तीस का दशक था जिसने ऐतिहासिक महाड सत्याग्रह को एक पृष्ठभूमि प्रदान की। सभी जानते हैं कि देश और दुनिया के पैमाने पर यह एक झंझावाती काल था...

हाइलाइट्स

महाड के वीरेश्वर थिएटर में हो रहे इस सम्मेलन में लगभग तीन हजार लोग एकत्रित थे जिनमें महिलाएं भी भारी संख्या में उपस्थित थीं। सवर्णों की इस उपस्थिति के दो निहितार्थ थे: एक पहलू यह था कि जातिभेद के उन्मूलन के लिए या समाजसुधार के लिए इनमें से एक छोटा तबका तत्पर था तथा उन्हें बाबासाहब के नेतृत्व पर भी यकीन था। दूसरे बाबासाहेब का अपना दृष्टिकोण सर्वसमावेशी था तथा वे ब्राहमणवाद की समाप्ति के लिए सभी तरह के लोगों को साथ लेकर चलने के लिए तैयार थे।

 

‘‘जब पानी में आग लगी थी’’ : महाड सत्याग्रह के नब्बे साल - 2

- सुभाष गाताडे

एक हिन्दू पुरूष या स्त्री, जो कुछ भी वह करते हैं, वह धर्म का पालन कर रहे होते हैं। एक हिन्दू धार्मिक तरीके से खाना खाता है, पानी पीता है, धार्मिक तरीके से नहाता है या कपड़े पहनता है, धार्मिक तरीके से ही पैदा होता है, शादी करता है और मृत्यु के बाद जला दिया जाता है। उसके सभी काम पवित्रा काम होते हैं। एक धर्मनिरपेक्ष नज़रिये से वह काम कितने भी गलत क्यों न लगें, उसके लिए वह पापी नहीं होते क्योंकि उन्हें धर्म के द्वारा स्वीकृति मिली होती है। अगर कोई हिन्दू पर पाप करने का आरोप लगाता है, उसका जवाब होता है, ‘ अगर मैं पाप करता हूं, तो मैं धार्मिक तरीके से ही पाप करता हूं।’

(‘द अनटचेबल्स एण्ड द पॅक्स ब्रिटानिका’ - डाक्टर भीमराव अम्बेडकर )

वह तीस का दशक था जिसने ऐतिहासिक महाड सत्याग्रह को एक पृष्ठभूमि प्रदान की। सभी जानते हैं कि देश और दुनिया के पैमाने पर यह एक झंझावाती काल था। महान सर्वहारा अक्तूबर क्रांति के पदचाप भारत में भी सुनाई दे रहे थे। नये आधार पर एक नयी कम्युनिस्ट पार्टी बनाने की योजनाएं आकार ग्रहण कर रही थीं। यही वह काल था जब गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने असहयोग आन्दोलन में जोरदार हिस्सा लिया था। जातिप्रथा की मुखालिफत करते हुए देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक सामाजिक हलचलें भी इन दिनों तेज हो रही थीं। पतुआखली, वैकोम आदि स्थानों पर होनेवाले सत्याग्रहों के जरिये ब्राहमणवाद तथा जातिप्रथा की जकड़न को चुनौती दी जा रही थी। यही वह दौर था जब असहयोग आन्दोलन की असमय समाप्ति के बाद देश में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने के मसले सामने आने लगे थे और हिन्दू तथा मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठनों की गतिविधियों में तेजी देखी गयी थी।

इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1923 में बम्बई विधान परिषद में रावसाहेब बोले की पहल पर यह प्रस्ताव पारित हुआ कि सार्वजनिक स्थानों पर दलितों के साथ होने वाले भेदभाव पर रोक लगायी जाय। बहुमत से पारित इस प्रस्ताव के बावजूद तीन साल तक यह प्रस्ताव कागज़ पर ही बना रहा। उसके न अमल होने की स्थिति में 1926 में जनाब बोले ने नया प्रस्ताव रखा कि सार्वजनिक स्थानों, संस्थानों द्वारा इस पर अमल न करने की स्थिति में उनको मिलने वाली सरकारी सहायता राशि में कटौती की जाय।

विलायत से अपनी पढ़ाई पूरी करके लौटे बाबासाहेब आम्बेडकर दलितों शोषितों के बीच जागृति तथा संगठन के काम में जुटे थे, उन्हीं दिनों महाड तथा आसपास के कोकण के इलाके के दलितों के बीच सक्रिय लोगों ने एक सम्मेलन की योजना बनायी तथा उसके लिए डा अंबेडकर को आमंत्रित किया। इस सम्मेलन के प्रमुख संगठनकर्ता थे रामचंद्र बाबाजी मोरे (1903-1972) जिन्होंने अपनी सामाजिक गतिविधियों से पहले से इलाके में अलग पहचान बनायी थी और उनकी अगुआई में कुछ माह पहले ही क्राफोर्ड तालाब सत्याग्रह का आयोजन हुआ था जिसमें सार्वजनिक जल स्रोतों पर दलितों के समान अधिकार का दावा रेखांकित किया गया था। बाद में रामचंद्र मोरे कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सक्रिय हुए और मुंबई की ऐतिहासिक गिरणी कामगार यूनियन के संस्थापक सदस्य बने।

इसे संयोग कहा जाना चाहिए कि महाड ही वह भूमि थी जहां पर बाबासाहेब के पूर्ववर्ती महात्मा फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज के दलित समाज के अग्रणी कार्यकर्ता गोपालबुवा वलंगकर ने अपने जनजागृति की शुरूआत की थी। महाड उसी कोकण का इलाका है जहां के एक गांव के स्कूल में बाबासाहब का बचपन बीता था। तीसरा अहम संयोग यह था कि बम्बई विधानपरिषद के प्रस्ताव के बाद महाड नगरपालिका ने अपने यहां एक प्रस्ताव पारित कर अपने यहां के तमाम सार्वजनिक स्थान दलितों के लिए खुले करने का निर्णय लिया था।

महाड के वीरेश्वर थिएटर में हो रहे इस सम्मेलन में लगभग तीन हजार लोग एकत्रित थे जिनमें महिलाएं भी भारी संख्या में उपस्थित थीं। गं.नी.सहस्त्राबुद्धे, अनंत चित्रो, शंकरभाई धारिया, तुलजाभाई,  सुरेन्द्रनाथ टिपणीस जैसे समाजसुधारों के लिए अनुकूल सवर्ण भी शामिल थे। ये वही सुरेन्द्रनाथ टिपणीस थे जिन्होंने महाड नगरपालिका द्वारा प्रस्ताव पारित कराने में पहल ली थी।

सवर्णों की इस उपस्थिति के दो निहितार्थ थे: एक पहलू यह था कि जातिभेद के उन्मूलन के लिए या समाजसुधार के लिए इनमें से एक छोटा तबका तत्पर था तथा उन्हें बाबासाहब के नेतृत्व पर भी यकीन था। दूसरे बाबासाहेब का अपना दृष्टिकोण सर्वसमावेशी था तथा वे ब्राहमणवाद की समाप्ति के लिए सभी तरह के लोगों को साथ लेकर चलने के लिए तैयार थे।

सम्मेलन के अपने धारदार भाषण में बाबासाहब ने सदियों से चली आ रही ब्राहमणवाद की गुलामी की मानसिकता से विद्रोह करने के लिए दलितों तथा अन्य शोषितों का आवाहन किया। महाड सत्याग्रह की चर्चित घोषणा में उन्होंने कहा कि ‘‘ तीन चीजों का तुम्हें परित्याग करना होगा। उन कथित गंदे पेशों को छोड़ना होगा जिनके कारण तुम पर लांछन लगाये जाते हैं। दूसरे, मरे हुए जानवरों का मांस खाने की परम्परा को भी छोड़ना होगा। और सबसे अहम है कि तुम उस मानसिकता से मुक्त हो जाओ कि तुम ‘अछूत’ हो।’’

उनका यह भी कहना था कि ‘‘क्या यहां हम इसलिये आये हैं कि हमें पीने के लिए पानी मयस्सर नहीं होता है ? क्या यहां हम इसलिये आये हैं कि यहां के जायकेदार कहलानेवाले पानी के हम प्यासे हैं ? नहीं, दरअसल इन्सान होने का हमारा हक जताने हम यहां आये हैं।’’

20 मार्च की सुबह सम्मेलन के लिए एकत्रित चुनिन्दा लोगों की एक बैठक स्थानीय आयोजक सुरबानाना टिपणिस के घर पर हुई, जिसमें डा अम्बेडकर के अलावा बापूसाहेब सहस्त्राबुद्धे, बापू टिपनिस, शिवतरकर और भाई चित्रो शामिल थे। उन्होंने बीते दिन में प्रस्तुत भाषणों पर विचार किया और यह तय किया कि सम्मेलन की औपचारिक समाप्ति के बाद वह सामूहिक तौर पर चवदार तालाब पर जाएंगे और महाड नगरपालिका द्वारा पारित प्रस्ताव पर अमल करेंगे। चूंकि चवदार तालाब पर जाने का मुददा मूल एजेण्डा में शामिल नहीं था, उसे कैसे अंजाम दिया जाएगा - कौन प्रस्तावित करेगा और कब प्रस्तावित किया जाएगा, किस रास्ते मार्च निकाला जाएगा - यह तमाम बातें तय नहीं हो सकीं। ( देखें, महाड: द मेकिंग आफ द फर्स्ट दलित रिवॉल्ट, पेज 124, आनंद तेलतुम्बडे, आकार, 2016)

बाद में सम्मेलन में जारी चर्चाओं में बहिष्कृत अर्थात दलित शोषित तबके की अन्य समस्याओं पर भी चर्चा हुई और प्रस्ताव पारित किये गये। जंगल की जमीन दलितों को खेती के लिये दी जाय, उन्हें सरकारी नौकरियां मिलें, सरकार न केवल शिक्षा को अनिवार्य करे बल्कि 20 साल के छोटे लड़कों तथा 15 साल से छोटी लड़कियों की शादी पर भी पाबन्दी लगाये आदि विभिन्न आर्थिक सामाजिक मसलों पर प्रस्ताव मंजूर हुए। सरकार से अपील की गयी वह शराबबन्दी लागू करे तथा मरे हुए जानवरों का मांस खाने पर पाबंदी लगा दे। यह प्रस्ताव भी पारित हुआ कि सार्वजनिक कुओं और तालाबों के बारे में जो प्रस्ताव विधानपरिषद में पारित हुआ है उस पर सरकार सख्ती से अमल करे तथा जरूरत पड़े तो उसके लिए क्रिमिनल प्रोसिजर कोड सेक्शन 144 का इस्तेमाल करे।

सम्मेलन की औपचारिक समाप्ति तथा धन्यवाद ज्ञापन के बाद - जिसे महाड के सामाजिक कार्यकर्ता अनंत चित्रो ने रखा, उन्होंने बाद में सम्मेलन को सम्बोधित किया और लोगों का आवाहन किया कि प्रस्तुत सम्मेलन को एक महत्वपूर्ण काम को अंजाम दिए बिना पूरा नहीं समझा जाना चाहिए। उनका कहना था कि समाज में जारी छूआछूत की प्रथा के चलते आज भी इलाके के दलितों को चवदार तालाब - जो सार्वजनिक तालाब है - उसमें से पानी लेने नही दिया जाता। महाड नगरपालिका द्वारा इस सम्बन्ध में प्रस्ताव पारित किए जाने के बावजूद वह कागज पर ही बना हुआ है। अगर यह सम्मेलन इस प्रथा की समाप्ति के लिए आगे आता है तो यह कहा जा सकेगा कि इसने एक महत्वपूर्ण कार्यभार पूरा किया। चित्रो के चंद शब्दों ने पूरे जनसमूह को आंदोलित किया और वह डा अंबेडकर की अगुआई में कतारबद्ध होने लगे। 20 मार्च की तपती दुपहरिया में लगभग चार हजार की तादाद में वहां जमा जनसमूह ने चवदार तालाब की ओर कूच किया। समूचे महाड नगर में उनका अनुशासित जुलूस आगे बढ़ा।

जुलूस में शामिल लोग नारे लगा रहे थे ‘महात्मा गांधी की जय’, ‘शिवाजी महाराज की जय’, ‘समानता की जय’। जुलूस तालाब पर जाकर रूका और फिर सबसे पहले अम्बेडकर ने अपनी अंजुरी भर पानी पिया और फिर जुलूस में शामिल हजारों लोगों ने पानी पीया।

गौरतलब है कि इस ऐतिहासिक सत्याग्रह में गैरब्राहमण आन्दोलन के शीर्षस्थ नेताओं के साथ साथ मेहनतकशों के आन्दोलन से जुड़े क्षेत्रीय कार्यकर्ता भी शामिल थे।

अछूतों द्वारा चवदार तालाब पर पानी पीने की घटना से बौखलाये सवर्णों ने यह अफवाह फैला दी कि चवदार तालाब को अपवित्रा करने के बाद ये ‘अछूत’ वीरेश्वर मन्दिर पर धावा बोलने वाले हैं। पहले से ही तैयार सवर्ण युवकों की अगुआई में सभास्थल पर लगे तम्बू कनात पर हमला करके कई लोगों को घायल किया गया।

दलितों के इस ऐतिहासिक विद्रोह के प्रति मीडिया की प्रतिक्रिया में भी उसके जातिवादी आग्रह साफ दिख रहे थे। कई सारे समाचारपत्रों ने डॉ आम्बेडकर के इस बाग़ी तेवर के खिलाफ आग उगलना शुरू किया। ‘भाला’ नामक अख़बार जो सनातनी हिन्दुओं का पक्षधर था उसने 28 मार्च को दलितों को सम्बोधित करते हुए लिखा:

‘‘.. आप लोग मन्दिरों और जलाशयों को छूने की कोशिशें तुरंत बन्द कीजिये। और अगर ऐसा नहीं किया गया तो हम तुम लोगों को सबक सीखा देंगे।..‘‘

इसके जवाब में बाबासाहब ने लिखा कि

‘‘ ..जो हमें सबक सिखाने की बात कर रहे हैं हम उनसे भी निपट लेंगे।..’’

बहरहाल जिस तरह का आलम था उसके इस बात की जरूरत महसूस की गयी कि अपनी बात जनमानस तक पहुंचाने के लिए एक स्वतंत्र अख़बार होना चाहिए। पहले निकाले जाते रहे अख़बार ‘मूकनायक‘ का प्रकाशन बन्द हो चुका था। इस जरूरत को पूरा करने के लिए सत्याग्रह की समाप्ति के बाद बम्बई लौटने पर चन्द दिनों के अन्दर ही ‘बहिष्कृत भारत’ नामक अख़बार का प्रकाशन शुरू किया गया। प्रवेशांक निकला था 3 अप्रैल 1927 को।

अपने इस अख़बार के जरिये न केवल नवोदित दलित आन्दोलन ने उसके खिलाफ शुरू हो रहे अनर्गल प्रचार का जवाब देने की कोशिश की बल्कि सकारात्मक ढंग से अपनी समूची परियोजना को भी लोगों के सामने रखने के काम की शुरूआत की।

22 अप्रैल के अंक में बाबासाहब ने लिखा

‘‘. महात्मा गांधी की तरह आज तक हम लोग भी यही मानते आये थे कि अस्पृश्यता यह हिन्दुधर्म के उपर लगा कलंक है। लेकिन अब हमारी आंखें खुली हैं और हम समझ रहे हैं कि यह हमारे शरीर पर लगा कलंक है। जब तक हम इसे हिन्दुधर्म पर लगा कलंक समझते थे तब तक इस काम को हमने आप लोगों पर सौंपा था लेकिन अब हमें इस बात का एहसास हुआ है कि यह हमारे शरीर पर लगा कलंक है तो इसे खतम करने के पवित्र काम को हमने खुद स्वीकारा है।..‘‘

..... जारी ...

‘‘जब पानी में आग लगी थी’’ : महाड सत्याग्रह के नब्बे साल"

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।