नोटबंदी का राजनीतिक फैसला आम जनता और देश के खिलाफ राष्ट्रद्रोह!

नोटों की छपाई में घपला, नोटबंदी लीक, पंद्रह लाख बेरोजगार, खेती कारोबार तबाह और रिजर्व बैंक के साथ भारत सरकार को घाटा यूपी की जीत की कीमत!...

 

पलाश विश्वास

कालाधन निकालने के बहाने नोटबंदी लागू करने के पहले दिन से लगातार हम इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए घातक बता रहे थे।आप चाहे तो हस्तक्षेप पर संबंधित सारे आलेख देख सकते हैं। यह नोटबंदी विशुद्ध राजनीतिक एजंडे के तहत एक राजनीतिक कार्रवाई यूपी चुनाव जीतने के लिए थी। इसकी राजनीतिक कामयाबी में कोई शक नहीं है। लेकिन अब तक हुए सर्वे के नतीजे से हमारी आशंका सच हुई है कि इसके नतीजतन करीब पंद्रह लाख लोगों का रोजगार खत्म हो गया है और शेयर बाजार के उछाल के विपरीत कारोबार में मंदी आयी है। इससे छोटे और मंझोले व्यवसायी और रोजगार प्रदाता बाजार से बाहर हो गये हैं और एकाधिकार कारपोरेट वर्चस्व कायम करने में रिजर्वबैंक की स्वायत्ता खत्म होने के साथ साथ सरकारी बैंको को भारी घाटा हुआ है और बैंकिंग के निजीकरण की प्रक्रिया तेज हो गयी है।

यह नोटबंदी मुक्त बाजार के व्याकरण के खिलाफ जबरन डिजिटल इंडिया बनाने की आधार परियोजना है जिससे नागरिकों की जमा पूंजी, स्वतंत्रता, संप्रभुता, निजता, गोपनीयता और सुरक्षा खतरे में पड़ गयी है।

बेहिसाब खर्च के बावजूद कालाधन का कोई हिसाब नहीं निकला और नये नोट छापने में भी घपला हुआ है और नोटबंदी का फैसला लीक होने से सत्तावर्ग के एक तबके को भारी आर्थिक और राजनीतिक मुनाफा हुआ है और इसके साथ अभूतपूर्व रोजगार संकट पैदा हो गया है। इसके साथ ही पहले से संकट में फंसी कृषि व्यवस्था चौपट हो गयी है और खेती बाड़ी कारोबार से जुड़े बहुसंख्य आम जनता, नागरिकों और करदाताओं को भारी नुकसान हुआ है। जिसके नतीजतन मंदी, रोजगार संकट के साथ आगे भुखमरी का अंदेशा है।

इस रपट से पुष्टि होती है कि राजनीतिक कारपोरेट वित्तीय प्रबंधन से भारत सरकार और रिजर्व बैंक को भारी घाटा हुआ है और वित्तीय प्रबंधन का यह आर्थिक घोटाला किसी राष्ट्रद्रोह या आतंकवादी हमले की तरह आम जनता और देश दोनों के खिलाफ है।

खबरों के मुताबिक भारतीय रिजर्व बैंक अपने अधिशेष में से वित्त वर्ष के 2016-17 के लिए बतौर लाभांश केवल 30,659 करोड़ रुपये ही सरकार को देगा। आंकड़ा पिछले वर्ष के मुकाबले आधे से भी कम है क्योंकि उस बार केंद्रीय बैंक ने सरकार को बतौर लाभांश 65,876 करोड़ रुपये दिए थे। रिजर्व बैंक ने लाभांश में कमी की कोई वजह नहीं बताई है, लेकिन अर्थशास्त्री इसे नोटबंदी का नतीजा मान रहे हैं। उनका कहना है कि 500 रुपये के पुराने नोट और 1,000 रुपये के नोट बंद होने के बाद नए नोट छापने और पुराने नोट खत्म करने में केंद्रीय बैंक को भारी रकम खर्च करनी पड़ी है। इसी कारण इस बार लाभांश में इतनी अधिक कमी आई है।

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