अच्छे दिन : दौलत के हवाले शिक्षा और सेहत

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफापसंदों के हवाले कर दिया नीति निर्माताओं ने... सेवा के लिए नहीं मुनाफे के लिए कार्य करता है निजी क्षेत्र...

अच्छे दिन : दौलत के हवाले शिक्षा और सेहत

विजय विशाल

भारतीय संविधान अपने नागरिकों को जिस तरह शिक्षा का अधिकार देता है उसी तरह जीवन रक्षा का अधिकार भी देता है। राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों में जीवन स्तर को ऊंचा करने और लोक स्वास्थ्य में सुधार करने को लेकर राज्य के कर्त्तव्य की बात की गई है। लेकिन जमीनी हकीकत ठीक इसके विपरीत है। हमारे देश में सरकारी स्तर पर उपलब्ध करवाई जा रही शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं भयावह रूप से लचर है। सरकारों ने शिक्षा और लोक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी से लगातार अपने को दूर किया है। नवउदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद तो सरकारें शिक्षा और जन स्वास्थ्य के क्षेत्र को पूरी तरह से निजी हाथों में सौंपने के रास्ते पर चल पड़ी हैं।

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एक सुनियोजित योजना के तहत लोगों की सोच ऐसी बनायी जा रही है कि सरकारी क्षेत्र बेहतर सेवा नहीं दे सकता इसलिए निजीकरण आवश्यक है। हमें समझना होगा कि सरकारी तंत्र की नाकामी जिसका दोष मुख्यतः कर्मचारियों या अधिकारियों पर डाल दिया जाता है, दरअसल प्रबंधन की नाकामी है। क्योंकि सरकारी तंत्र में जहां सरकारें चाहती हैं बेहतर कार्य  हो, वहां होता है। जहां प्राथमिकता हल्की पड़ जाती है, वहां अव्यवस्था नजर आने लगती है। उदाहरण के लिए इसे इस तरह समझा जा सकता है- भारतीय फौज के तीनों अंग, विभिन्न अर्धसैनिक बलों, केन्द्र सरकार के संस्थानों जैसे एम्स, आईआईटी, आईआईएम, इसरो आदि के अतिरिक्त कई संस्थान अच्छा काम कर रहे हैं क्योंकि यह सरकारों की प्राथमिकता में हैं और उनकी ओर अपेक्षित ध्यान दिया जाता है तथा उन्हें अच्छे काम के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

सेवा के लिए नहीं मुनाफे के लिए कार्य करता है निजी क्षेत्र

Vijay Vishalहमें यह भी समझना होगा कि निजी क्षेत्र सेवा के लिए नहीं मुनाफे के लिए कार्य करता है। अगर वह अस्पताल और स्कूल खोलता है तो उसका ध्यान अपने निवेश को वसूलने तथा मुनाफा कमाने पर होता है। वह दक्ष लोगों को तो सम्मानजनक वेतन देता है लेकिन अन्य कार्मिकों को मामूली वेतन पर रखता है। इससे वह देश की एक बड़ी आबादी को अपने मुनाफे के लिए गरीब बनाए रखता है।

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इसमें कोई शक नहीं है कि निजी क्षेत्र में सेवाएं दुरूस्त होती हैं क्योंकि सेवाएं अच्छी नहीं होने पर उनकी साख खराब हो जाती है, जिसका बुरा असर उनके कारोबार पर पड़ता है। परन्तु अच्छी सेवाएं प्रदान करने के बदले वे भरपूर पैसा वसूलते हैं। अच्छी आमदनी व पैसे वालों को इससे कोेई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन छोटी आमदनी वालों के लिए यह बड़ा घातक होता है। उनकी जीवन भर की पूंजी अस्पताल या स्कूल के भेंट चढ़ जाती है और बड़ी संख्या में लोग या तो कंगाल हो जाते हैं या सुविधा के अभाव में जीवन से पलायन कर जाते हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफापसंदों के हवाले कर दिया नीति निर्माताओं ने

भारत में नीति निर्माताओं ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफापसंदों के हवाले कर दिया है। आज भारत उन अग्रणी मुल्कों में शामिल है जहां शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का तेजी से निजीकरण हुआ है। पिछले कुछ समय से भारत सरकार द्वारा गठित नीति आयोग  से शिक्षा के निजीकरण को तेज करने के स्वर सुनाई दे रहे हैं। इधर नीति आयोग ने तीन साल के लिए तय किये गये अपने एजेंडे में सिफारिश की है कि पढ़ाई-लिखाई के लिहाज से खराब स्तर वाले सरकारी स्कूलों को निजी हाथों को सौंप देना चाहिए। उसका मानना है कि ऐसे स्कूलों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत निजी कंपनियों को दे दिया जाना चाहिए। हालांकि देश में विद्यालयी शिक्षा का काफी हद तक पहले ही निजीकरण हो चुका है।

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नीति आयोग सरकारी शिक्षा के, निजी शिक्षा से पिछड़ने के लिए जो दलीलें दे रहा है, न सिर्फ उस पर बात करने की जरूरत है बल्कि शिक्षा के निजीकरण के अर्थ को समझने तथा उसके प्रभावों पर बात करना भी आवश्यक हो जाता है। पहली बात तो यह कि सरकरी स्कूल अपने शिक्षकों की अक्षमता की वजह से संकट में नहीं हैं। संकट उन नीतियों के कारण है, जिसके तहत पांच कक्षाओं को पढ़ाने के लिए सिर्फ दो शिक्षक दिये जाते हैं और उन्हें भी गैरशिक्षण कार्यों तथा प्रशिक्षण आदि के नाम से प्रायः स्कूल से दूर कर दिया जाता है। संकट शिक्षकों के रिक्त पदों, संसाधनों की कमी तथा हिन्दी मीडियम व इंगलिश मीडियम वाली दो तरह की शिक्षा प्रणाली से है।

एक समान कर प्रणाली तो एक समान शिक्षा प्रणालीक्यों नहीं

अगर हम एक देश में ’एक समान कर प्रणाली’ की बात जोर-शोर से कर सकते हैं तो ’एक समान शिक्षा प्रणाली’ की बात क्यों नहीं कर सकते ? अपने देश में बड़ी चालाकी से सरकारी शिक्षा व्यवस्था के पिछड़ने का सारा दोष शिक्षकों के ऊपर डालकर समस्या के मूल करणों या जटिलताओं से मुंह फेर लिया जाता है। ऐसे लोगों को यूनेस्को की वर्ष 2017-2018 को जारी न्यू ग्लोबल एजुकेशनल मॉनीटरिंग रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा की खराब गुणवत्ता को लेकर कई ऐसे पहलू हैं, जिसमें शिक्षकों की कोई भूमिका नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार इसके लिए सरकार, स्कूल, अभिभावक और समाज भी उतना ही जवाबदेह है।

सरकारी स्कूलों को पीपीपी मोड में देना चाहता है नीति आयोग

नीति आयोग सरकारी स्कूलों को पीपीपी मोड में देना चाहता है। वह चाहता है कि निजी क्षेत्र सरकारी स्कूलों का दायित्व अपने ऊपर ले ले। इस प्रकार वह सरकार पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को कम करना चाहता है। हमारे पास अस्पतालों को पीपीपी मोड पर देने के अनुभव मौजूद हैं। इन्होंने अस्पतालों की स्थिति सुधारने के बजाय और भी बदतर बनाया है। जिन निजी अस्पतालों को सरकारी अस्पतालों को चलाने का जिम्मा दिया गया वे लोगों को राहत देने के बजाय उनकी जेबों से पैसा निकालने की जुगत में लग गए। स्कूलों के निजीकरण का कोई स्पष्ट रोड मैप अभी सामने नहीं आया है।

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स्कूली शिक्षा की दशा सुधारने के लिए कुछ नीति नियंता सरकारी स्कूलों को इंगलिश माध्यम बना देने का सुझाव देते हैं। यह गरीब-भूखे लोगों का ब्रेड खरीद कर खा लेने का जैसा सुझाव है। अगर ऐसा किया गया तो बच्चे और भी तेजी से स्कूलों से दूर होने लगेंगे। जो बच्चे अपने परिवेश की भाषा में पढ़ने के बावजूद शिक्षा से जुड़ नहीं पा रहे हैं क्या वे एक अपरिचित भाषा में शिक्षा से जुड़ पायेंगे ?

निजी अस्पतालों की संवेदनहीनता

दूसरी तरफ आजादी के बाद हमारे देश में निजी अस्पतालों की संख्या 8 फीसद से बढ़कर 93 फीसद हो गई है। आज देश में स्वास्थ्य सेवाओं के कुल निवेश में निजी क्षेत्र का निवेश 75 फीसद तक पहुंच गया है। निजी क्षेत्र का प्रमुख लक्ष्य मुनाफा बटोरना है। इसमें दवा कम्पनियां भी शामिल हैं। इनके लालच और दबाव में डॉक्टरों द्वारा महंगी और गैर जरूरी दवाईयां और जांच लिखना बहुत आम हो गया है। निजी अस्पतालों की संवेदनहीनता की कहानियां हर रोज सुर्खियां बनती हैं। हालांकि जन स्वास्थ्य लोगों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा है। भारत की बड़ी आबादी गरीबी और सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़ेपन का शिकार है। ऊपर से स्वास्थ्य सुविधाओं के लगातार निजी हाथों की तरफ खिसकते जाने से उनकी पहले से खराब हालत और खराब होती जा रही है।

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कई अध्ययन बताते हैं कि इलाज में होने वाले खर्चों के चलते भारत में हर साल लगभग चार करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे चले जाते हैं। रिसर्च एजंेसी अर्नस्ट एंड यंग द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 80 फीसद शहरी और 90 फीसद ग्रामीण आबादी अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर करने को मजबूर है। इस वजह से हर साल चार फीसद आबादी गरीबी रेखा से नीचे आ जाती है।

निजीकरण के खतरे

निश्चित ही सन् 1991 में नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद भारत के आम जन ने बहुत कुछ खो दिया और बहुत कुछ दांव पर लगा दिया है। कांग्रेस ने यह सिलसिला शुरू किया था और भाजपा ने उसे सख्ती से लागू कर रही है। आज मोदी जी जो कर रहे हैं वह मनमोहन सिंह-मांेटेक सिंह आहलूवालिया और नरसिम्हा राव के बनाये रोड मैप पर ही कर रहे हैं। आर्थिक सुधार लागू करने से पहले पुराने समाजवादी मॉडल को नाकारा बताना जरूरी था, सो मीडिया और दलाल बुद्धिजीवियों के माध्यम से सार्वजनिक संस्थानों और कल्याणकारी योजनाओं पर निशाना साधा गया। कहना चाहिए भ्रष्टाचार का जिन्न भी उसी समय का आविष्कार है। कभी हिसाब लगाया जा सकता है ग्रामीण विकास में दिखाया गया विशाल भ्रष्टाचार, बोफोर्स, राफेल की खरीद या निजी कंपनियों के एनपीए से कितना कम है, लेकिन उसे इतना बढ़ा दिखाया कि लोग गुस्से से उबल पड़ें और उनके मुंह से निकले सरकारी योजनाएं हैं ही बेकार। और ऐसा हुआ भी।

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कुछ समय पूर्व गढ़ा गया एक सदविचार सबको याद होगा। ’’भाई साहब नहीं लगेगा’’ माने बीएसएनएल। आपने, हम सबने कितने मजे से इस सार्वजनिक संस्था की बखिया उधेड़ी। क्या आज आईडिया, एयरटेल और जीओ बीएसएनएल से बेहतर हैं ? जितने डाटा का वादा करते हैं वो क्या देते हैं ? इस तरह एक समझी बूझी चाल के तहत जनता को ही जनता के संस्थानों (सार्वजनिक संस्थानों) के कुप्रचार में लगा दिया गया। और भी बहुत सारे उदाहरण आस-पास ही मिल जाएंगे। उस समय भी कुछ लोग निजीकरण के खतरे गिना रहे थे, लेकिन कुप्रचार के लती हुए लोगों को कुछ सुनना ही नहीं था। यह भी किसी ने नहीं कहा कि हमारी कोई चीज खराब हो गयी तो उसे ठीक कर देते हैं। सरकारी स्कूलों और शिक्षकों के खिलाफ पिछले 15 साल से सुनियोजित दुष्प्रचार शुरू हुआ था। कहां से शुरू हुआ था, शोध करेंगे तो सब पता चाल जाएगा। आज निजी स्कूलों का विशाल मकड़जाल है और वे खुद भी अपने बच्चों को लेकर उसके भीतर उलझ गये हैं। जन स्वास्थ्य क्षेत्र की कहानी भी शिक्षा की कहानी से अलग नहीं है। वहां भी वह सब वैसे ही घट रहा है जैसा शिक्षा में घटा है।

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परिणामस्वरूप आज भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्र हद दर्जे तक उपेक्षित हैं। जहां से इन्हें बाहर निकलने के लिए बहुत ही बुनियादी नीतिगत बदलावों की जरूरत है। इन क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश में जबर्दस्त बढ़ोतरी, शिक्षा में निजीकरण पर रोक और निजी अस्पतालों पर लगाम लगाने के लिए कठोर कानून बनाने जैसे क्रांतिकारी कदम उठाने की आवश्यकता है। तभी महान लोकतांत्रिक देश की अवधारणा को साकार किया जा सकेगा। लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है। इसके लिए जन दबाव की जरूरत पड़ेगी। वर्ना इन क्षेत्रों के निजीकरण से देश की एक बड़ी आबादी को काफी मुसीबतें झेलनी पड़ेगी।

विजय विशाल

 (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं साहित्यकार है।)

 

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