मीलॉर्ड, अयोध्या मामले में मध्यस्थता आदेश भारतीय संवैधानिक राज्य व्यवस्था पर कुठाराघात है

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के नाम प्रो. शम्सुल इस्लाम का खुला पत्र An Open Letter of Pro. Shamsul Islam to Honorable Justice Ranjan Gogoi (CJI)...

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के नाम प्रो. शम्सुल इस्लाम का खुला पत्र

मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय, माननीय न्यायमूर्ति रंजन गोगोई

अयोध्या मामले में मध्यस्थता आदेश भारतीय संवैधानिक राज्य व्यवस्था पर कुठाराघात है, जिसकी हिफाजत करना सर्वोच्च न्यायालय का अनिवार्य कर्तव्य है!
माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश महोदय,

     दुनिया आपको भारतीय संवैधानिक राज्य व्यवस्था में नस्ल, पंथ, धर्म, भाषा, संस्कृति और लिंग आदि तमाम भेदभाव किए बिना सभी नागरिकों के प्रति समान व्यवहार के मुख्य रक्षक के रूप में जानती हैं। लेकिन, आपकी अध्यक्षता में गठित खंडपीठ (जस्टिसगण एस ए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस. अब्दुल नज़ीर) ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में यह विचार व्यक्त किया गया है कि इस मामले में मुख्य विषय अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल को लेकर विवादित 2.77 एकड़ भूमि नहीं है बल्कि "धार्मिक भावनाओं" (religious sentiments) और "संबंधों में सुधार की संभावना"i (possibility of healing relationshipsi) की तलाश है। पक्षकारों के धर्मों का हवाला जरूर यहां नहीं है, फिर भी, जाहिर है कि यहां सर्वोच्च न्यायालय की पीठ का आशय हिंदू और मुसलमानों के बीच संबंधों को ठीक करना रहा है। इस तरह का नज़रिया, विधि के शासन या उचित कानूनी प्रक्रिया के सम्मुख गंभीर खतरा है, जबकि ये भारतीय संविधान की बुनियाद हैं।

     श्रीमान, मामले में "धार्मिक भावनाएं" सम्मिलित हैं, इस प्रकार की दलील भारत को धर्मतांत्रिक शासन व्यवस्था (Theocracy) की ओर ले जाएगी। सौभाग्य से, पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं के पक्ष में ऐतिहासिक फैसले करते समय या फिर1984 तथा 2002 के जनसंहारों में अपराधियों को दंडित करते वक्त, कभी भी धार्मिक भावनाओं जैसा मुद्दा नहीं उठाया गया। जब पीड़ित माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख अपना पक्ष रखते हैं, वे बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक की हैसियत से आपके समक्ष नहीं आते बल्कि एक ऐसे भारतीय नागरिक के रूप में उपस्थित होते हैं, जिसके साथ अन्याय हुआ है। वर्तमान मामले के बारे में, मैं निम्नलिखित तथ्यों पर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहूंगा :

(1) अयोध्या विवाद हिंदुओं और मुसलमानों के बीच का विवाद नहीं हैं
     माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह विवाद संपत्ति के स्वामित्व के विवाद (Title dispute) के तौर पर पेश हुआ है क्योंकि 6 दिसंबर, 1992 बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया था। इस काम को अंजाम दिया था अयोध्या में हिेंदुत्व कट्टर पंथियों के विधि विरूद्ध जमावड़े ने। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके बिरादराना संगठनों द्वारा लंबे समय तक मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिंसक ध्रुवीकरण अभियान के जरिए इस जमघट को एकत्र किया गया था। यह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद का मुद्दा नहीं है। टकराव कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी संगठनों और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारतीय राजनीति के बीच है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद मस्जिद को ध्वस्त किया गया। भारतीय संसद को आरएसएस/भाजपा नेताओं तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव द्वारा दिए गए आश्वासन के बावजूद, मस्जिद को ध्वस्त किया गया था। राव ने संसद में और लाल किले से 15 अगस्त, 1993 को दाेनों बार, भारतीय राष्ट्र से वायदा किया था कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस की गलती को सुधारा जाएगा। ध्वस्त मस्जिद को मूल स्थल पर फिर से बनवाया जाएगा।

(2) हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा बाबरी मस्जिद के विध्वंस का समर्थन भारत के आम हिंदुओं ने कभी नहीं किया
     श्रीमान, मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित कराना चाहता हूं कि इस मामले को हिंदुओं और मुसलमानों के बीच का संघर्ष मानकर, भारत की सर्वोच्च अदालत भारतीय हिंदुओं के विशाल बहुमत का अपमान कर रही है, जिन्होंने राजनीति के इस हिंदुत्व ब्रांड को कभी स्वीकार नहीं किया और न ही वे बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड में सहभागी थे। अयोध्या में मस्जिद के विध्वंस के बाद आरएसएस/भाजपा का मानना था कि उनका चुनावी भविष्य सुरक्षित हो गया है। हालांकि, प्रबुद्ध और धर्मनिरपेक्ष हिंदू मतदाताओं ने केवल मध्य प्रदेश, राजस्थान में ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में (जहाँ बाबरी मस्जिद के विध्वंस के कुछ ही महीनों बाद चुनाव हुए थे) और इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा को परास्त करके हिंदुत्ववादी नफरत की राजनीति को ठुकरा दिया था ।

(3) मध्यस्थ के रूप में श्रीश्रीरवी शंकर का चयन बेहद प्रतिगामी है

     श्रीमान, आपकी अध्यक्षता में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच समझौता करने के लिए तीन मध्यस्थ नियुक्त किए हैं। इस कमेटी में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) फकीर मोहम्मद अब्राहिम कलीफुल्ला (खासतौर से एक फैसले के लिए जाने जाते हैं, जिसमें उन्होंने बतौर सर्वोच्च न्यायालय के न्याशधीश एक आदेश जारी कर भारतीय विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिक अध्ययन पाठ्यक्रम के अंतर्गत वैदिक ज्योतिष को सम्मिलित किए जाने का निर्देश दिया था) दूसरे सदस्य श्री श्री रवि शंकर (अरब शासकों के मध्य लोकप्रिय आध्यात्मिक गुरु) हैं, समिति के तीसरे सदस्य कानूनी मामलों में मध्यस्थता विशेषज्ञ, एडवोकेट श्रीराम पांचू (भारतीय मध्यस्थता संघ के अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संस्थान के निदेशक) हैं। इस चयन का मापदंड क्या है, सुप्रीम कोर्ट की पीठ की ओंर से इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। ऐसा लगता है कि यह मान कर इन्हें चुना गया है कि ये मध्यस्थ धार्मिक समुदायों का प्रतिनिधि नहीं बल्कि तटस्थ व्यक्ति हैं। इनसे उम्मीद की गर्इ है कि वे उद्देश्य के अनुरूप ईमानदारी के साथ ऐसा कोर्इ रास्ता निकालेंगे, जिससे समधान संभव हो सकेगा।
     आदरणीय श्रीमान, कृपया मुझे इस आध्यात्मिक गुरु, श्रीश्री रवीशंकर (जो अपने नाम में 'श्री' लगाना ज़रूरी मानते हैं) के बारे में ध्यान आकर्षित कराने की इजाजत दीजिए। इनका अतीत और वतर्मान दोनों ही अनके सवालों से घिरा हुआ है। बाबरी मस्जिद या राम जन्मभूमि मंदिर विवाद में बतौर मध्यस्थ इस शख्स का चयन चकित करता है।
     महोदय, यह बाबा कदापि कोर्इ तटस्थ 'मध्यस्थ' नहीं है। 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में मस्जिद के विध्वंस के लिए जिम्मेदार आरएसएस नामक संगठन के साथ इनका पुराना याराना है। यह शख्स आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के सभी प्रमुख कार्यक्रमों में भाग लेता रहा है। श्री श्री की कार्यपद्धति, हथकंडे और आरएसएस के साथ घनिष्ठ संबंधों के बारे में एक प्रसिद्ध पत्रकार और विशेषज्ञ एडवर्ड लूस (Edward Luce) ने भारत में इस प्रकार के बाबाअों के उदय के बारे में अपनी पुस्तक 'इन स्पाइट ऑफ द गॉड्स: द स्ट्रेंज राइज ऑफ मॉडर्न इंडिया' (In Spite of the Gods: The Strange Rise of Modern India) में विस्तार से बताया है। उनके अनुसार :

 "श्री श्री रविशंकर की छवि बतौर एक रहस्यमय आध्यत्मिक और उदार व्यक्ति की है। कम लोग जानते हैं कि यह गुरुजी आरएसएस के अत्यंत करीबी है। विश्व हिंदू परिषद के साथ वे अनेक बार मंच सांझा करते रहे हैं। मैंने उनसे पूछा कि क्या अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए। 'मान लीजिए,' उन्होंने कहा, 'यह यीशु या मोहम्मद का जन्मस्थान होता। आप होते तो क्या करते? क्या आप उस स्थान पर कोर्इ दूसरी संरचना बर्दाश्त करते? हमें वहां राम का मंदिर बनाने दीजिए और मुसलमान इस कार्य में सद्भावना का संकेत दें, और फिर मंदिर भी तो अल्लाह और सभी मुसलमानों के लिए होगा। '' ii

     आदरणीय महोदय, यह गुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पैरोकार है। यह एडवर्ड लूस द्वारा साझा किए कथानक से स्पष्ट है। उनके अनुसार बैंगलुरू में इस गुरु के आलीशान आश्रम में उनसे मिलने के बाद उनकी लिखित एक रिपोर्ट ‘फाइनेंशयल टाइम्स’ में प्रकाशित हुर्इ तो:

“कुछ सप्ताह बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता राम माधव का टेलीफोन आया। माधव ने कहा, ‘मैं श्री श्री रविशंकर के बारे में बात कर रहा हूं।‘ ...मैं दूसरे दिन उनसे (श्रीश्री के पास) गया था। ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ में आपके लेख से वे निराश थे। आपने केवल राजनीति और शंकराचार्य के बारे में ही उनके विचारों को उद्धृत किया। श्री श्री को उम्मीद थी कि आप सहिष्णुता और आध्यात्मिकता पर उनके विचारों को उद्धृत करेंगे।" यह सच है कि मेरे लेख का जो आकार था उसमें अन्य मामलों पर गुरुजी के विचारों को उद्धृत करने के लिए स्थान का अभाव था। लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि गुरुजी को अपनी शिकायत करने के लिए सभी संगठनों में से आरएसएस को ही चुना। '' iii

     माननीय मुख्य न्यायाधीश, यह 2007 की बात है जब यह महान गुरु श्री श्री उस जगह राम मंदिर बनाने की वकालत कर बाबरी मस्जिद थी। समय बीतने के साथ उनका यह पक्ष और अधिक सख्त हो गया। मार्च 2018 में एक प्रमुख भारतीय पत्रिका में उन्होंने एक साक्षात्कार में यह मांग की कि मुसलमानों को अयोध्या में अपने दावे को "छोड़ देना" चाहिए और चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो भारत में सीरिया के गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। यह खुली धमकी थी। सीरिया में इस्लामिक स्टेट जो भूमिका अदा करता है, भारत में धर्म रक्षक के रूप में उस भूमिका का निर्वाह कौन करने वाला है, यह समझना मुश्किल नहीं है। ये वही श्री श्री हैं जो बातचीत के जरिए विवाद के समाधान पर विश्वास की बात कहते हैं इसके बावजूद, अदालतों को यह चेतावनी देना भी नहीं भूलते, "क्या कोई सरकार रामलला को वहां से हटा सकती है जहां वे इस समय विराजमान हैं, भले ही सर्वोच्च न्यायालय ही ऐसा कहे?" Iv

     माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, मैं आपसे विनती करूंगा कि कृपया देश के सर्वोच्च न्यायालय को हिंदुत्व गिरोह के सांप्रदायिक आख्यानों से दूर ही रखें। 1992 में अयोध्या में एक मस्जिद के विध्वंस के बारे यह गिरोह जिस किस्म की कहानियां गढ़ रहा है उसमें कानून और विधि व्यवस्था को नहीं उलझाएं। हिंदू धर्म के साथ इस सबका कोर्इ लेना-देना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक मुद्दा है, जिसे भारत के सत्तारूढ़ दल चुनावी लाभ के लिए लटकाए रखना चाहते हैं। यह विषय संबंधित अदालतों और सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख आपराधिक और नागरिक विधि के अंतर्गत राहत के लिए है। न्यायपालिका को केवल भारत के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष संविधान और उसमें निहित सिद्धांतों की रोशनी में इस विषय को तय करना चाहिए। किसी भी समुदाय विशेष को संतुष्ट या प्रसन्न करने के लिए जहमत, उसका काम नहीं है।

     महोदय, मुझे उम्मीद है कि अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद, मेरे इस अनुरोध पर ध्यान दिया जाएगा।

सादर,
शम्सुल इस्लाम
दिल्ली विश्वविद्यालय (सेवानिवृत्त प्राध्यापक}
11 मार्च 2019
अनुवाद : कमल सिंह

संदर्भ :

i https://indianexpress.com/article/india/ayodhya-mediation-supreme-court-verdict-live-updates-5616762/  

ii. Luce, Edward, In Spite of the Gods: The Strange Rise of Modern India, Doubleday, New York, 2007, pp. 177-178.

iii. उपरोक्त., p. 178.

iv https://www.indiatoday.in/india/story/if-not-resolved-amicably-janmaboomi-dispute-can-turn-india-into-syria-sri-sri-1182073-2018-03-05

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