मुमकिन तो यह भी है कि किसी सुबह चार गुंडे वंदेमातरम चिल्लाते हुए कफ़ील अहमद को मार डालें

वे बच्चे इसलिए मरे क्योंकि ये देश उन्हें डिज़र्व नहीं करता। जैसे हम ये देश डिज़र्व नहीं करते - नहीं हैं हम इसके काबिल। और सच कहूं तो जैसे हम हैं - हम दुनिया की किसी भी मिट्टी के काबिल नहीं हैं।...

 

बच्चे अभिशप्त हैं क्योंकि मुमकिन तो यह भी है कि किसी सुबह चार गुंडे वंदेमातरम चिल्लाते हुए कफ़ील अहमद को मार डालें

राजीव मित्तल

वे 60 बच्चे ऑक्सीजन की कमी से नहीं मरे। मेरी और तुम्हारी कमी से मरे।

क्योंकि हमें ठीक से गुस्सा नहीं आता, क्योंकि कफ़ील अहमद नाम के जिस डॉक्टर ने ऐन वक़्त पर अपना पैसा लगाकर ऑक्सीजन मँगाने की कोशिश की और पागलों की तरह उन बच्चों की साँसें बचाने में लगा रहा, वो हमारा हीरो नहीं है - कम से कम दो दिन से ज़्यादा के लिए तो नहीं - और मुमकिन तो यह भी है कि किसी सुबह चार गुंडे वंदेमातरम चिल्लाते हुए उसे मार डालें और मुझे और तुम्हें फ़र्क़ भी ना पड़े।

वे बच्चे इसलिए भी मरे क्योंकि जब वे दो-दो चार-चार करके मर रहे थे, तब हममें से किसी ने उनके बारे में बात नहीं की। जश्न-ए-आजादी में व्यस्त देश की राजधानी का मीडिया यह जानना नहीं चाहता था कि ऐसा क्यों हो रहा है

वे बच्चे इसलिए मरे क्योंकि हम तुम तो क्या, उनके माँ-बाप भी वोट डालने के वक़्त उनकी मौतों को भूल जाया करते हैं - और भूल जाया करते हैं हर ज़लालत और नाइंसाफ़ी को.. कई बार तो बस बारह सौ रुपए और ज़रा सी शराब के लिए...और एक जनाना मर्दाना धोती के लिए..

वे बच्चे इसलिए मरे क्योंकि ये देश उन्हें डिज़र्व नहीं करता। जैसे हम ये देश डिज़र्व नहीं करते - नहीं हैं हम इसके काबिल। और सच कहूं तो जैसे हम हैं - हम दुनिया की किसी भी मिट्टी के काबिल नहीं हैं।

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