स्वास्थ्य और चिकित्सा, रोजगार और आजीविका, बुनियादी जरुरतें और सेवाएं हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में किसी जिन्ना की तस्वीर को लेकर जितना घमासान है,उसके मुकाबले थोड़ा सा ध्यान प्रकृति और पर्यावरण, खेती और किसानों, मजदूरों की हालत पर दिया जाता तो शायद बेहतर होता...

पलाश विश्वास

उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत उत्तर भारत में तेज आंधी और बरसात से हुई तबाही की खबरें विस्तार से कोलकाता में नहीं मिल पा रही हैं। आनंद बाजार के मुताबिक हल्द्वानी और नैनीताल मे बिजली पानी बंद है तो बाकी आगरा का थोड़ा ब्यौरा अखबारों में है। सहारनपुर, बरेली और बिजनौर में मौतों की गिनती है। बाकी उत्तराखंड के पहाड़ और तराई में क्या हाल है, मालूम नहीं चला है। चिंता हो रही है।

बेमौसम बरसात से गेंहू की फसल को नुकसान पहुंचा है। खड़ी फसल पर दोबारा मार पड़ने पर किसानों को पूरे भारत में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। आपदा प्रबंधन के बारे में कुछ भी कहना गैरजरूरी है तो मीडिया को राजनीतिक समीकरणों, अपराधों के वृत्तांत और बाजार की गतिविधियों से फुरसत नहीं है।

घर में फोन करने की कल और आज लगातार कोशिश कर रहा हूं। पद्दो अपने साथ मोबाइल लेकर नहीं चलता। बहू गायत्री घरेलू कामकाज में बिजी रहने के कारण मोबाइल साथ में नहीं रखती। भतीजों पावेल और अंकुर से संपर्क हो नहीं पा रहा है।

इसी महीने शिफ्टिंग की तैयारी है लेकिन मौसम का हालचाल देखते हुए यह बेहद मुश्किल काम लग रहा है।

उम्मीद है कि पहाड़ और तराई में लोग सकुशल होंगे। बाकी आम जनता तो अपने-अपने राजनीतिक आकाओं की कृपा और अपनी नकदी के भरोसे हैं। जिनके न आका हैं और न नकदी हैं, ऐसे लोगों के लिए चिंता हो रही है।

बंगाल में भी इस बार आंधी पानी से बार-बार जान माल की हानि हो रही है। लेकिन प्राकृतिक आपदा किसी के लिए सरदर्द नहीं है। सुंदरवन के सफाये के बाद समुद्री तूफान कोलकाता को अपने शिकंजे में लेता दीख रहा है। सौ-सौ किमी की गति से आंधियां चल रही हैं। दर्जनों मारे जा रहे हैं। इस पर चर्चा के बजाये नेताओं के बयानों में से बाल की खाल निकालना मीडिया का कारोबार है। उत्तर भारत में मौसम का मिजाज जिस तेजी से बिगड़ रहा है, केदार आपदा की पुनरावृत्तियां पहाड़ों तक सीमित रहेंगी इसकी कोई गारंटी नहीं है।

हम इस बार तराई में आग से खेतों पर खड़ी फसल के रोज-रोज जल जाने की वारदात से हैरत में पड़ते रहे हैं। आंधी पानी या मानसून की मूसलाधार वर्षा मौसम के मुताबिक पहाड़ और तराई में हमारे बचपन में हमने खूब देखे हैं, लेकिन तबाही का यह आलम नहीं देखा।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में किसी जिन्ना की तस्वीर को लेकर जितना घमासान है,उसके मुकाबले थोड़ा सा ध्यान प्रकृति और पर्यावरण, खेती और किसानों, मजदूरों की हालत पर दिया जाता तो शायद बेहतर होता।

लेकिन जैसे स्वास्थ्य और चिकित्सा, रोजगार और आजीविका, बुनियादी जरुरतें और सेवाएं हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं हैं, जैसे अस्पतालों में चिकित्सा व्यवस्था न होना हमें हैरान नहीं करता, एक के बाद एक सरकारी स्कूल बंद होने से हम परेशान नहीं होते, अतिक्रमण हटाओ के नाम पर शहरी इलाकों से कमजोर और गरीब तबकों की बेदखली के हम पर कोई असर नहीं होता, शहरीकरण और औद्योगीकरण के बहाने भारी पैमाने पर किसानों के खेतों की लूट हमारी आत्मा को नहीं कचोटती, जैसे कीटनाशकों का नाश्ता बाजन हमारी दिनचर्या है,  हम हादसों के अभ्यस्त होते जा रहे हैं।

दूसरे मरते रहें, हम जब तक संभव है, बाजार के कार्निवाल में सट्टेबाजी की जिंदगी के नशे में मदहोश रहें।

ज़रा हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।