दलितवादी पहचान की राजनीति और मायावती का संकट

यह कटु सत्य है कि दलित बसपा के सम्पर्क में आने के बाद ज्यादा कम्युनल हुए हैं। भाजपा ने इस साम्प्रदायिकता को बस इस्तेमाल किया।...

अतिथि लेखक
दलितवादी पहचान की राजनीति और मायावती का संकट

हरे राम मिश्र

दलितों की पहचान और अस्मितावादी राजनीति का यह सबसे बड़ा संकट रहा है कि उसने हिंदुत्ववादी पॉलिटिक्स को कभी भी अपने लिए खतरा नहीं समझा। दूसरे शब्दों में उसे मजबूत किया।

आज मायावती जिस संकट से दो चार हो रही हैं वह पूरी बसपा की वैचारिकी का संकट है।

मेरी समझ में भाजपा के खिलाफ बसपा के पास वर्तमान में कोई ठोस योजना नहीं है। मायावती अभी 'क्या करें'?- की अनिश्चयवादी स्थिति में फंसी हैं।

मैं यहां एक उदाहरण दूंगा।

यूपी में भाजपाराज में दलितों का सबसे ज्यादा पुलिस एनकाउंटर हुआ जो कि कानून की निगाह में संदिग्ध है।

इसके अलावा मुसलमानों पर हमले, महिलाओं की अस्मिता पर हमले, कानून व्यवस्था का संकट समेत कई सवाल हैं। लेकिन इस पर मायावती ने एक भी गंभीर बयान अब तक जारी नहीं किया, क्योंकि वह खुद पुलिस राज्य की घोर समर्थक रही हैं।

दरअसल बसपा और कांशीराम हिंदुत्व को दलित राजनीति के लिए कोई खतरा नहीं मानते थे।

जिस राजनीतिक रास्ते पर बसपा पली बढ़ी और आगे बढ़ी उससे RSS को कोई खतरा नहीं था।

मायावती ने जो पोलिटिकल पैटर्न अपनाया वह अपने मूल में दलित विरोधी, सामन्ती और ब्राम्हणवादी था।

कांशीराम भी अपने मूल विचार में मुसलमानों को सिर्फ वोट पाने की एक अछूत चीज समझते थे।

यह सब आरएसएस के लिए बहुत अनुकूल माहौल था।

यह कटु सत्य है कि दलित बसपा के सम्पर्क में आने के बाद ज्यादा कम्युनल हुए हैं। भाजपा ने इस साम्प्रदायिकता को बस इस्तेमाल किया।

यही वजह है कि आज दलितों के दिमाग में यह बात बैठ गई है कि BJP ही मुसलमानों को ठीक कर सकती है। मोदी ही हिन्दू गौरव को सुरक्षित रख सकते हैं। वे मानते हैं कि भले ही हमारा पेट नहीं भरा है लेकिन देश पर मुसलमानों की वजह से जो आसन्न खतरा आया है उसके लिए BJP को मजबूत करना जरूरी है।

मेरा यह आकलन है कि यूपी में दलितों का बड़ा वर्ग आगामी चुनाव में भाजपा के साथ चला जाएगा और ऐसा मायावती भी चाहती हैं ताकि कांग्रेस मजबूत नहीं होने पाये।

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