अपनी मनमर्जी चलाने की कोशिश में मोदी सरकार ने न्यायपालिका को गहरे संकट में धकेल दिया है

उत्तराखंड में दलबदल के जरिए सरकार हथियाने की BJP की कोशिशों पर पानी फेरने वाला हाईकोर्ट का असाधारण फैसला था। मोदी सरकार को ऐसे निर्भीक फैसले के लिए जिम्मेदार जोजफ का सुप्रीम कोर्ट पहुँचना मंजूर नहीं...

मोदी सरकार और न्यायपालिका का संकट

राजेंद्र शर्मा

पिछले एक हफ्ते की तीन घटनाओं ने देश की शीर्ष न्यायपालिका के गहरे संकट में होने की सचाई को ही नहीं इस संकट के असली कारणों को भी गाढ़े रंग से रेखांकित कर दिया है। इनमें एक प्रमुख घटना तो, मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ सात विपक्षी पार्टियों के सांसदों द्वारा पेश किए गए महाभियोग के प्रस्ताव के, राज्यसभा के सभापित वैंकेया नायडू द्वारा खारिज कर दिए जाने की ही है। बेशक, नायडू के उक्त निर्णय पर महाअभियोग का प्रस्ताव करने वाली पार्टियों ने आपत्ति जताई है। उनका मुख्य तर्क यह है कि राज्यसभा के सभापति को प्रस्ताव विचार के लिए स्वीकार करने से पहले, आरोपों की वैधता के संबंध में अपने संतुष्ट किए जाने की मांग करने का अधिकार ही नहीं है। याद रहे कि यह पहला ही मौका है जब सभापति ने महाभियोग के प्रस्ताव को जांच की प्रक्रिया शुरू करने से पहले ही ठुकरा दिया है। संबंधित सांसदों ने विडंबनापूर्ण तरीके से राज्यसभा के सभापति के उक्त निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का ही दरवाजा खटखटाने की बात कही है। इससे ऐसा लगता है कि महाभियोग का यह मामला भी अभी खत्म नहीं हो गया है।

बहरहाल, जहां इस प्रकरण में सत्ता प्रतिष्ठान तथा सरकार प्रकटत: मुख्य न्यायाधीश के बचाव में खड़े नजर आने का प्रयास कर रहे थे और कानून मंत्री से लेकर सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ताओं तक ने, विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को उच्च न्यायपालिका पर हमले के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, वहीं इसके फौरन बाद सामने आए घटनाक्रम ने शीर्ष न्यायपालिका और मोदी सरकार के बीच लंबे समय से जारी टकराव की हकीकत को एक बार फिर सामने ला दिया।

बाद वाले घटनाक्रम का संबंध उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों के उसी मुद्दे से है, जो मौजूदा सरकार और शीर्ष न्यायपालिका के बीच टकराव का मुख्य मुद्दा बना रहा है। इस बार सुप्रीम कोर्ट के कोलीजियम द्वारा जनवरी के आरंभ में भेजी गयी सर्वोच्च न्यायालय में दो न्यायाधीशों की नियुक्ति की संस्तुति को दो हिस्सों में बांटकर, वरिष्ठ एडवोकेट इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति को तो केंद्र सरकार ने क्लीअर कर दिया है, लेकिन उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, के एम जोज़फ की नियुक्ति के प्रस्ताव को उसने कोलीजियम को वापस लौटा दिया है। बेशक, वर्तमान कानूनी स्थिति यह है कि कोलीजियम, अपनी वही संस्तुति सरकार के सामने दोहरा सकता है और उसके बाद सरकार इस संस्तुति को मानने के लिए बाध्य होगी। लेकिन, इसमें सरकार कितना समय ले सकती है, इसकी कोई पाबंदी नहीं है और इस तरह सरकार नियुक्ति को लंबे समय तक लटकाए रखने के जरिए, कोलीजियम के फैसले को निष्प्रभावी भी बना सकती है।

के एम जोजफ की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति में नरेंद्र मोदी सरकार के रोड़ा अटकाने के कारणों का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल नहीं है।

बेशक, सरकार की ओर से यह कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में राज्यों के हाई कोर्टों के प्रतिनिधियों के अनुपात और न्यायाधीशों की अखिल भारतीय वरिष्ठता सूची की चिंता की वजह से ही उसने न्यायमूर्ति जोज़फ की नियुक्ति की फाइल कोलीजियम को लौटाई है। लेकिन, आमतौर पर ऐसा समझा जा रहा है कि ये सब तो बहाने हैं। असली कारण तो उत्तराखंड में दलबदल के जरिए सरकार हथियाने की भाजपा की कोशिशों पर पानी फेरने वाला, हाई कोर्ट का असाधारण फैसला था। अचरज नहीं कि नरेंद्र मोदी की सरकार को, ऐसे निर्भीक फैसले के लिए जिम्मेदार जोजफ का सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के पद पर पहुंचना मंजूर नहीं है।

यह हमें सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा संकट के असली कारण पर ले आता है। इसी सिलसिले में इसी सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर, शीर्ष अदालत के सामने आ रही समस्याओं पर फुल कोर्ट में विचार कराने की मांग की थी। ये दोनों न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के उन चार न्यायाधीशों में शामिल थे, जिन्होंने इसी जनवरी में एक प्रेस कान्फ्रेंस करके पूरे देश का ध्यान शीर्ष न्यायपालिका के संकट की ओर खींचने का अभूतपूर्व कदम उठाया था। सुप्रीम कोर्ट के इन चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने न सिर्फ यह स्पष्ट कर दिया था कि न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है बल्कि इसकी चेतावनी भी दी थी कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और इसलिए जनतांत्रिक व्यवस्था ही खतरे में है।

प्रकटत: ये वरिष्ठतम न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर और विशेष रूप से वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र द्वारा शीर्ष अदालत के काम-काज के संचालन पर सवाल उठा रहे थे। इसमें मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रकरणों के आवंटन तथा बैंचों के गठन आदि में पारदर्शिता न बरते जाने तथा मनमानी के मुद्दे खास थे। फिर भी यह किसी से छुपा हुआ नहीं था कि शीर्ष अदालत में पैदा हुए इस विभाजन का सीधा संबंध, वर्तमान सरकार द्वारा न्यायपालिका पर बढ़ते पैमाने पर दबाव डाले जाने से था। न्यायिक नियुक्ति संबंधी आयोग के माध्यम से उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों में बढ़ता दखल हासिल करने की अपनी कोशिश के विफल हो जाने के बाद, मोदी सरकार ने न्यायपालिका पर अंकुश लगाने की अपनी कोशिशें कोई छोड़ नहीं दी हैं। हां! इस कोशिशों के लिए उसने कोलीजियम व्यवस्था को चुनौती देेना छोड़कर एक नया मोर्चा खोल दिया है। यह मोर्चा है उच्च न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को अनुशासित करने वाले मैमोरेंडम ऑफ प्रोसेस का, जिस पर सहमति को वर्तमान सरकार ने अटकाए रखा है और यह सहमति न हो पाने को बहाना बनाकर, कोलीजियम की उच्च न्यायिक नियुक्ति की संस्तुतियों को अटकाए रखा है, जिस पर जब-तब न्यायपालिका तथा मोदी सरकार के बीच मुठभेड़ें भी होती रही हैं।

यह संयोग ही नहीं है कि मैमोरेंडम आफ प्रोसेस पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सहमति न बन पाने की असली वजह, कार्यपालिका की इसकी कोशिश है कि राष्ट्रीय सुरक्षा आदि कारणों से कोलीजियम की संस्तुतियों की वैटिंग के नाम पर, उच्च न्यायिक नियुक्तियों में वीटो का अधिकार हासिल कर लिया जाए। शीर्ष न्यायपालिका अब तक आम तौर पर ऐसी कोशिशों का प्रतिरोध करती आयी है। लेकिन, इस मामले में शीर्ष अदालत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश की भूमिका, खुद शीर्ष अदालत के अनेक न्यायाधीशों की नजर में निर्विवाद नहीं रही है। उनसे अपेक्षा तो कार्यपालिका की न्यायपालिका को दबाव में लेने की इन कोशिशों का मुकाबला करने का नेतृत्व करने की थी, लेकिन वह अनेक मामलों में कार्यपालिका के  दबाव के सामने झुकते नजर आए हैं। मुख्य न्यायाधीश मिश्र के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीशों की नाराजगी से लेकर, विपक्ष के महाभियोग के प्रयास तक के पीछे, यही मुख्य वजह रही है।

दुर्भाग्य से यह स्थिति, महाभियोग प्रस्ताव के राज्यसभा के सभापति द्वारा ठुकराए जाने के बावजूद, जल्दी से बदलती नजर नहीं आ रही है। जहां न्यायमूर्ति जोज़फ की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को अटकाने के अपने फैसले से नरेंद्र मोदी की सरकार ने न्यायपालिका के साथ टकराव का एक नया चक्र शुरू कर दिया है, वहीं सरकार के इस फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की पहली प्रतिक्रिया ने, खुद न्यायपालिका के संकट को उजागर कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश ने दो में से एक नियुक्ति की संस्तुति कोलीजियम को वापस भेजने को कार्यपालिका का 'अधिकार' बताया है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के ही कम से कम चार पूर्व-मुख्य न्यायाधीशों तथा अनेक पूर्व-न्यायाधीशों ने न सिर्फ सरकार के इस फैसले को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बताया है बल्कि यह भी मांग की है कि कोलीजियम जल्द से जल्द उक्त संस्तुति दोबारा सरकार को भेजे। उनका दो-टूक मत है कि मुख्य न्यायाधीश भी इस मामले को अनिश्चित काल तक दबाकर बैठा नहीं रह सकता है। साफ है कि अपनी मनमर्जी चलाने की कोशिश में मोदी सरकार ने न्यायपालिका को गहरे संकट में धकेल दिया है।

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