पीएम का बोलना, पीएम की चुप

‘प्रधानमंत्री बोले तो हैं, लेकिन इन हत्याओं को कौन रोकेगा?’ बेशक, बोलना जरूरी है, लेकिन प्रधानमंत्री का भी सिर्फ बोलना ही काफी नहीं है। ...

0 राजेंद्र शर्मा

आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी भीड़ की हिंसा के खिलाफ बोले। यह उपयुक्त ही था कि गांधी के साबरमती आश्रम से उन्होंने कथित गोरक्षकों की हिंसा के खिलाफ दो-टूक संदेश दिया। ‘गोभक्ति के नाम पर लोगों की जान लेना स्वीकार्य नहीं है।’ प्रधानमंत्री ने इसके साथ यह भी जोड़ा कि, ‘इस चीज को महत्मा गांधी कभी मंजूर नहीं करते। यह विनोबा भावे के जीवन का संदेश नहीं है।’

प्रधानमंत्री ने ‘देश के मौजूदा हालात’ पर अपने ‘विक्षोभ तथा पीड़ा’ को बलपूर्वक प्रकट किया और इसके लिए ‘हम कर क्या रहे हैं’ और ‘हमें हो क्या गया है’ जैसे जुम्लों का प्रयोग किया! उनकी बात स्पष्ट थी और शब्द प्रभावशाली।

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यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि प्रधानमंत्री का यह बयान, पंद्रह वर्षीय ज़ुनैद की सांप्रदायिक घृणा-हत्या की पृष्ठभूमि में, देश भर में उठी विरोध की मुख्यत: स्वत:स्फूर्त लहर की पृष्ठभूमि में आया था। देश की राजधानी की ऐन बगल में एक स्थानीय ट्रेन में पंद्रह वर्षीय ज़ुनैद को भीड़ ने सिर्फ इसलिए पीट-पीटकर मार दिया और उसके दो भाइयों को चाकुओं से गंभीर रूप से घायल कर दिया कि वे, दाढ़ी-टोपी-पोशाक से मुसलमान दिखाई देते थे। इससे मुश्किल से दो महीने पहले, राजधानी के ही निकट अलवर में कथित गोरक्षकों ने गोतस्करी के संदेह के नाम पर, मेवाती मवेशीपालक पहलू खान की राष्ठ्रीय राजमार्ग पर पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

यहां यह याद दिला देना गैरजरूरी नहीं होगा कि पिछले दो साल में यह दूसरा मौका है, जब प्रधानमंत्री कथित गोरक्षकों की गुंडागर्दी के खिलाफ बोले हैं। इससे पहले पिछले अगस्त में प्रधानमंत्री ने स्वयंभू गोरक्षकों के खिलाफ वास्तव में इससे भी कड़े शब्दों का प्रयोग किया था और उनमें से प्रचंड बहुमत को ऐसे ‘समाज विरोधी’ तत्व करार दिया था, जो गोरक्षा के नाम पर ‘दूकानें चला रहे हैं।’ बेशक, प्रधानमंत्री का उक्त बयान भी राजधानी के निकट दादरी में, गोमांस रखने की अफवाह के जरिए उकसाई गयी भीड़ द्वारा पचास वर्षीय अखलाक की घर में घुसकर पीट-पीटकर हत्या किए जाने और गुजरात में उना में मृत मवेशियों का चमड़ा उतारने वाले चार दलितों की कथित गोरक्षकों द्वारा ही सार्वजनिक रूप से हंटरों से चमड़ी उधेड़े जाने की पृष्ठभूमि में आया था।

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इसलिए, यह भी कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने साल भर पहले कथित गोरक्षकों की जो आलोचना की थी, अब साबरमती आश्रम की शताब्दी के मौके पर साल भर बाद उसी को दोहराया है। यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है और पूछा जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री को साल भर बाद अपनी बात को दोहराने की जरूरत क्यों पड़ी? जाहिर है कि इस एक साल में गोरक्षा के नाम पर, खुद प्रधानमंत्री के ही चरित्रांकन के हिसाब से ‘समाजविरोधी’ गतिविधियों में कोई कमी नहीं आयी है। उल्टे यह समस्या और उग्र ही हुई है, जिसका एक सबूत यह भी है कि इस बार प्रधानमंत्री को यह रक्षात्मक तर्क देना पड़ा है कि गोरक्षा के नाम पर लोगों ‘जान लेना’ मंजूर नहीं किया जा सकता है। नौबत जान लेने से रोकने न रोकने तक पहुंच गयी है। इसके लिए अगर अब भी वाकई किसी साक्ष्य की जरूरत हो तो सिर्फ इतना याद दिला देना काफी होगा कि जिस समय प्रधानमंत्री साबरमती में कथित गोरक्षकों की हरकतों से भिन्न वास्तविक गोसेवा का मर्म समझा रहे थे, ठीक उसी समय झारखंड में रामगढ़ जिले के गिद्दी इलाके में गोमांस का ही शोर मचाकर, मांस के व्यापारी अलीमुद्दीन अंसारी की पीट-पीटकर हत्या की जा रही थी और उनकी गाड़ी को जलाया जा रहा था। और प्रधानमंत्री के उक्त बयान के अगले ही दिन, असम में गोरक्षा के नाम पर ही मवेशी ले जा रहे लोगों पर भीड़ का हमला हुआ।

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साफ है कि प्रधानमंत्री का साल भर पहले बोलना इन समाजविरोधी तत्वों पर अंकुश लगाने में नाकाम रहा है। लेकिन क्यों?

राजधानी के ऐन दरवाजे पर हत्यारे सांप्रदायिक घृणा हमले के शिकार ज़ुनैद के पिता की अति-संक्षिप्त टिप्पणी परोक्ष रूप से इस क्यों के जवाब की ओर इशारा कर देती है। ‘प्रधानमंत्री बोले तो हैं, लेकिन इन हत्याओं को कौन रोकेगा?’ बेशक, बोलना जरूरी है, लेकिन प्रधानमंत्री का भी सिर्फ बोलना ही काफी नहीं है। अगर बोलने वाला प्रधानमंत्री है तो जो बोला गया है, उसका राज्य की पूरी ताकत के साथ लागू कराया जाना भी जरूरी है। लेकिन, पिछला अनुभव तो इससे उल्टी ही कहानी कहता है।

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प्रधानमंत्री के दो-टूक शब्दों में कथित गोरक्षकों को समाजविरोधी तत्व करार देने के बावजूद, शासन की ओर से उनकी गतिविधियों के खिलाफ ‘सख्ती’ का रत्तीभर संकेत नहीं दिया गया। उल्टे इन दस महीनों में खासतौर पर भाजपा-शासित राज्यों में इन समाजविरोधी तत्वों के हौसले और बढ़े ही हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले में और वास्तव में ऐसी हिंसा के सभी मामलों में, करनी के सिरे से नदारद होने की वजह से ही अन्यथा ‘मजबूत’ प्रधानमंत्री भी, इन ताकतों के सामने एकदम लाचार नजर आ रहे हैं!

प्रधानमंत्री की इस लाचारी की वजह समझना जरा भी मुश्किल नहीं है। ये समाज विरोधी तत्व और कोई नहीं उसी संघ परिवार के हिस्से हैं, जिसका हिस्सा खुद प्रधानमंत्री हैं। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय दबावों के चलते सार्वजनिक मंच से बोलना, चिंता व दु:ख आदि जताना एक बात है। पर जमीनी स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी अपने परिवार-बंधुओं के खिलाफ कोई वास्तविक प्रहार कर ही कैसे सकते हैं!

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इस प्रसंग में यह याद दिलाना अनुपयुक्त नहीं होगा कि पिछले साल जब प्रधानमंत्री ने अधिकांश गोरक्षकों को ‘समाज विरोधी’ कहा था, इसके फौरन बाद आरएसएस प्रमुख, भागवत ने खुद कथित गोरक्षकों के इस चरित्रांकन का खंडन किया था और प्रधानमंत्री की बात को दुरुस्त करते हुए कहा था कि उनमें ज्यादातर समाज के लिए उपयोगी काम कर रहे हैं! अचरज की बात नहीं है कि इसके बाद, इस मुद्दे पर दोबारा अपना मुंह खोलने में प्रधानमंत्री को करीब साल भर लग गया, जबकि इस दौरान ‘देश के हालात’ लगातार बिगड़ते गए हैं। अचरज नहीं कि प्रधानमंत्री के इस बार बोलने के बाद भी, उनके शासन द्वारा हालात को और बिगड़ने से रोकने के लिए वास्तव में कुछ भी किए जाने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

इसके कारण भी, प्रधानमंत्री ने जो बोला एक तरह से उसी में छुपे हुए हैं। साबरमती में प्रधानमंत्री ने गोभक्तों या गोसेवकों और गोरक्षकों के अंतर को जोर देकर रेखांकित किया। इस रेखांकन में यह अंतर्निहित है कि गोभक्त या गोसेवक के ध्यान के केंद्र में गाय होती है, जबकि गोरक्षक के ध्यान के केंद्र में, कथित गोघातक होते हैं। गोभक्त गाय के प्रति सेवाभाव से खुद को परिभाषित करता है, जबकि कथित गोरक्षक, उसके हिसाब से जो गोविरोधी हैं, उनके विरोध से।

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गोभक्त जैसा खुद प्रधानमंत्री ने विनोबा भावे के प्रसंग से बताया ‘गाय के लिए मर जा’ की भावना से जीता है, जबकि गोरक्षक वास्तव में ‘गाय के लिए मार आ’ की भावना से जीता है। लेकिन, क्या यह बात प्रधानमंत्री के उस वैचारिक परिवार के बारे में भी सच नहीं है, जिसका ठीक इसीलए ये कथित गोरक्षक हिस्सा हैं। प्रधानमंत्री का अपना संघ परिवार भी तो, जाहिर है कि खुद प्रधानमंत्री समेत, खुद को हिंदू सेवक नहीं बल्कि हिंदू-रक्षक ही मानता है। वह भी तो ‘हिंदू के लिए मर जा’ के विपरीत ‘हिदू के नाम पर मार आ’ की भावना से ही जीता है। प्रधानमंत्री इस मूल भावना के खिलाफ कैसे खड़े हो सकते हैं?

इसीलिए, प्रधानमंत्री ने गोसेवा से छलांग लगाकर ‘देश की मौजूदा स्थिति’ की अपनी चिंता को, हिंसा-अहिंसा की अमूर्त चिंता में बदल दिया और आम तौर पर भीड़ की हिंसा पर लाकर बात खत्म कर दी। यहां आकर अस्पताल में मरीज की मृत्यु पर या वाहन दुर्घटना होने पर भडक़ने वाली हिंसा और ज़ुनैद की या पहलू खान की या आखलाक की हत्या, एक ही चीज हो गयी। इन हत्याओं के कारण, इनके लिए जिम्मेदार ताकतों की पहचान, संक्षेप में इन हत्याओं की ठोस वास्तविकता को ही पूरी तरह से छिपा दिया गया। यहां से आगे अहिंसा के पक्ष में तथा भीड़ की हिंसा के खिलाफ प्रवचन की ही उम्मीद की जा सकती है न कि सांप्रदायिक घृणा हमलों व हत्याओं पर अंकुश लगाने के लिए बहुआयामी कदमों की।

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आखिरकार, ऐसे कदमों के लिए तो प्रधानमंत्री को खुद अपने ‘वैचारिक परिवार’ के ही हिस्सों पर हाथ डालना होगा, जिसकी इजाजत प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी, गठबंधन तथा यहां तक कि सरकार के भी राजनीतिक हितों के लिए इन ताकतों की उपयोगिता नहीं देगी। इसीलिए, साबरमती आश्रम में इस मामले में प्रधानमंत्री का बोलना भी, उनकी चुप्पी से बहुत भिन्न नहीं लगता है।  0

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