मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद तेल की लूट

यह व्यावहारिक मानों में आम जनता की जेब पर डाका ही है। कच्चे तेल के मामले में मोदी सरकार की खुशनसीबी को, जनता की बदनसीबी क्यों बनाया जा रहा है?                     ...

हाइलाइट्स

जाहिर है कि मोदी सरकार तेल की इस लूट को जारी रखना चाहती है। इसीलिए, तेल मंत्री ने तेल के दाम को ‘तेल कंपनियां का रोजमर्रा का काम’ बताकर, असली मुद्दे से बच निकलने की कोशिश की है। उन्होंने हरीकेन हार्वी की वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम में आए फौरी उछाल को ही दोषी ठहराने की कोशिश की है। लेकिन, असली मुद्दा इस तात्कालिक बढ़ोतरी के असर का नहीं, जो वैसे भी तीन साल में हुई कच्चे तेल के दामों में कमी के मुकाबले काफी मामूली ही है। असली मुद्दा उत्पाद शुल्क के नाम पर सरकार द्वारा की जा रही लूट का है,

राजेंद्र शर्मा

तेल के दाम तीन साल के अपने शिखर पर पहुंच गए हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, 2014 की 13 सितंबर को दिल्ली में पैट्रोल का दाम 68 रु0 51 पैसा प्रति लीटर था, जो इसके ठीक तीन साल बाद, इस 13 सितंबर को बढक़र 70 रु0 38 पैसा प्रति लीटर के स्तर पर पहुंच गया है। वास्तव में देश के विभिन्न शहरों में पैट्रोल का दाम इस समय 70 से 79 रु0 तक चल रहा है यानी औसतन 74 रु0 प्रति लीटर है। डीजल का दाम भी 61-62 रु0 प्रति लीटर के स्तर पर चल रहा है।

बहरहाल, मुद्दा सिर्फ तेल के दाम के तीन साल के शीर्ष पर पहुंच जाने का ही नहीं है। यह भी गौरतलब है कि पिछले कुछ अर्से से तेल के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। जब से देश में हर रोज तेल का दाम तय करने की नयी व्यवस्था शुरू हुई है, 1 जुलाई से अब तक पैट्रोल के दाम में पूरे 6 रु0 17 पैसा प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो चुकी है। इसी दौरान डीजल के दाम में 5 रु0 36 पैसे की बढ़ोतरी हुई है।

लेकिन, असली मुद्दा सिर्फ तेल के दाम बढ़ोतरी पर होने का भी नहीं है। असली मुद्दा यह है कि यह बढ़ोतरी तब हो रही है, जब हर लिहाज से तेल के दाम में कमी होनी चाहिए थी और वह भी छोटी-मोटी नहीं, उल्लेखनीय कमी।

सभी जानते हैं कि भारत अपनी तेल की अपनी जरूरतों के लिए मुख्यत: तेल के आयात पर निर्भर है। वह अपनी जरूरत का करीब 85 फीसद कच्चा तेल आयात से ही हासिल करता है। और यह भी एक जाना-माना तथ्य है कि हमारे देश में शोधित तेल बाजार में आने तक की कुल लागत में, 80 फीसद से ज्यादा हिस्सा कच्चे तेल को हासिल करने का ही होता है। ऐसी स्थिति में यह समझने के लिए अर्थशास्त्र के किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं होगी कि हमारे देश में तेल की वास्तविक लागत और सामान्य स्थिति में कीमत भी, सबसे ज्यादा आयातित कच्चे तेल के दाम से यानी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में उतार-चढ़ाव से ही प्रभावित होनी चाहिए।

लेकिन, मध्यम अवधि में ऐसा नहीं हो रहा है बल्कि वास्तव में इससे उल्टा हो रहा है। यही है तेल की लूट। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद के तीन साल में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम न सिर्फ लगातार गिरावट पर रहे हैं बल्कि उनमें भारी गिरावट हुई है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, 2014 की जुलाई में भारत की कच्चे तेल के आयात की बास्केट के दाम 112 डालर प्रति बैरल के स्तर पर थे। इसके ढाई-तीन महीने में ही, 13 सितंबर तक कच्चे तेल का भाव गिरकर 106 डालर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया था। इसके बाद भी कच्चे तेल का दाम आम तौर पर गिरावट पर ही रहा है और घटते-घटते इस समय 54 डालर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया है।

बहरहाल, जैसाकि तार्किक  था, मोदी सरकार के पहले साल में कच्चे तेल के दाम में इस गिरावट का असर, पैट्रोल-डीजल के दाम में कुछ न कुछ गिरावट के रूप में दिखाई भी दे रहा था। 2014 के जुलाई और सितंबर के बीच, कच्चे तेल के दाम में 6 डालर प्रति बैरल की जो कमी हुई थी, उससे दिल्ली में पैट्रोल का दाम भी 73 रु0 60 पैसा प्रति लीटर से घटकर 68 रु0 51 पैसा रह गया था। कच्चे तेल के दाम में कमी के साथ, घरेलू बाजार में पैट्रोल व डीजल के दाम में कमी का यह सिलसिला कुछ आगे भी चला। यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री ने तेल के दाम में इस कमी का श्रेय लेने की यह कहकर कोशिश भी की थी कि उनकी खुशकिस्मती से ही सही, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम गिरने से, देश के गरीबों की जेब में चार पैसे फालतू जा तो रहे हैं!

लेकिन, जल्द ही सरकार की नीयत बदल गयी और उसने कच्चे तेल के दाम में गिरावट के अतिरिक्त लाभ में सिर्फ दांत नहीं गढ़ाए, बाकायदा लूट शुरू कर दी। इसी का नतीजा इस बेतुकी सचाई के रूप में सामने आया है कि जहां 2014 के सितंबर में जब कच्चे तेल का भाव 106 डालर के स्तर पर था, दिल्ली में पैट्रोल का दाम 68 रु0 51 पैसा था और आज जब कच्चे तेल का भाव 54 डालर प्रति बैरल के स्तर पर है, दिल्ली में ही पैट्रोल का भाव बढक़र 70 रु0 38 पैसा प्रति लीटर हो गया है। और यह हुआ कैसे है?

यह हुआ है कि सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क में और अन्य करों में भी बढ़ोतरी के जरिए और तेल कंपनियों व रिफाइनरियों द्वारा भी फालतू मुनाफे के जरिए, कच्चे तेल के दाम में गिरावट का सारा लाभ झपट लिए जाने के जरिए।

मोदी सरकार ने 2014 के नवंबर के बाद से पैट्रोल तथा डीजल पर उत्पाद शुल्क में पूरे ग्यारह बार बढ़ोतरी की है। यह पैट्रोल पर प्रति लीटर 12 रु0 और डीजल पर 13 रु0 प्रति लीटर की बढ़ोतरी बैठती है। इस तरह केंद्र सरकार ने बढ़े हुए उत्पाद शुल्क तथा वैट के जरिए, कच्चे तेल के दाम में कमी का सारा लाभ खुद हड़प लिया है। अचरज की बात नहीं है कि 2014-17 के दौरान सरकार का उत्पाद शुल्क संग्रह, 99,194 करोड़ रु0 से छलांग लगाकर 2,42,691 करोड़ रु0 पर पहुंच गया है। 2013-14 से 2016-17 के बीच वैट और बिक्री कर से राज्यों की कमाई भी 1,29,045 करोड़ रु0 से बढक़र 1,66,378 करोड़ रु0 हो गयी है। इसीलिए, आज उपभोक्ताओं से एक लीटर पैट्रोल के लिए जो 70 रु0 38 पैसे वसूल किए जा रहे हैं, उसमें से सिर्फ 30 रु0 70 पैसे सरकारी तेल कंपनियां डीलर से वसूल करती हैं, जबकि करीब 40 रु0 में से डीलर डिस्काउंट निकालकर बाकी सब सरकार बटोर लेती है।

जाहिर है कि मोदी सरकार तेल की इस लूट को जारी रखना चाहती है। इसीलिए, तेल मंत्री ने तेल के दाम को ‘तेल कंपनियां का रोजमर्रा का काम’ बताकर, असली मुद्दे से बच निकलने की कोशिश की है। उन्होंने हरीकेन हार्वी की वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम में आए फौरी उछाल को ही दोषी ठहराने की कोशिश की है। लेकिन, असली मुद्दा इस तात्कालिक बढ़ोतरी के असर का नहीं, जो वैसे भी तीन साल में हुई कच्चे तेल के दामों में कमी के मुकाबले काफी मामूली ही है। असली मुद्दा उत्पाद शुल्क के नाम पर सरकार द्वारा की जा रही लूट का है, जिसकी वजह से आज जनता को डीजल-पैट्रोल का जितना दाम देना पड़ रहा है, उतना दाम तो उस समय भी नहीं देना पड़ रहा था जब, कच्चे तेल के दाम आज के फौरी तौर पर बढ़े हुए दाम से दोगुने से भी ज्यादा थे। सरकार को जनता पर यह अनाप-शनाप अप्रत्यक्ष कर थोपने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। उत्पाद शुल्क में की गयी अंधाधुंध बढ़ोतरियों को फौरन वापस लिया जाना चाहिए।

याद रहे कि पैट्रोल और डीजल के बेतुके तरीके से बढ़े हुए दाम की मार सिर्फ इनके प्रत्यक्ष खरीददारों पर ही नहीं पड़ती है बल्कि विभिन्न स्तरों पर परिवहन से लेकर खेती की पैदावार तक के उपभोक्ताओं के रूप में भी आम जनता पर पड़ती है। यह व्यावहारिक मानों में आम जनता की जेब पर डाका ही है। कच्चे तेल के मामले में मोदी सरकार की खुशनसीबी को, जनता की बदनसीबी क्यों बनाया जा रहा है?                                                                                                              0

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