आप को लगता है आप संघ का दिल बदल देंगे, प्रणव दा, आपको गलतफहमियां काफी हैं

जो बात संसद के जरिए नहीं समझा सके, राष्ट्रपति बनकर नहीं समझा सके, वह बात क्या आरएसएस के लोग अपने मुख्यालय में आसन देकर, माला पहनाकर समझेंगे, तो आप मुगालते में हैं प्रणव दा

जगदीश्वर चतुर्वेदी
Updated on : 2018-06-08 17:27:23

आप को लगता है आप संघ का दिल बदल देंगे, प्रणव दा, आपको गलतफहमियां काफी हैं

जगदीश्वर चतुर्वेदी

जो बात संसद के जरिए नहीं समझा सके, राष्ट्रपति बनकर नहीं समझा सके, वह बात क्या आरएसएस के लोग अपने मुख्यालय में आसन देकर, माला पहनाकर समझेंगे, तो आप मुगालते में हैं प्रणव दा ।

मैं पहले भी कह चुका हूँ, सामाजिकता निभाने में संघी लोग उस्ताद हैं, लेकिन अपनी विचारधारा और उसके अनुरूप कट्टर आचरण करने के मामले में वे बेजोड़ हैं, संघी अंततः संघी होता है। यह साधारण सी बात प्रणव दा आप भूल गए। साम्प्रदायिकता से समझौताहीन संघर्ष किए बिना आप उसे पछाड़ नहीं सकते। वे सेमीनार, भाषण आदि से मान जाते तो संसद में हजारों भाषण उनके ऊपर हुए हैं उन्होंने एक नहीं मानी। प्रणवदा कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं होती। संघ को साफ-सुथरा बनाकर वे और भी खतरनाक रास्ते पर ले जा रहे हैं। लेकिन आप को लगता है आप संघ का दिल बदल देंगे, प्रणव दा, आपको गलतफहमियां काफी हैं, श्यामाप्रसाद मुखर्जी को मंत्री पद देकर पंडितजी यह न कर पाए, मदनमोहन मालवीय को कांग्रेस का अध्यक्ष पद देकर हिन्दू महासभा से अलग न कर सके तो आज वे जब उन्मत्त और आक्रामक भाव में हैं तो उदार बनेंगे, यह आपका भ्रम है।

मोहन भागवत से आपकी मित्रता अपनी जगह है, लेकिन इससे आरएसएस बदलने वाला नहीं है।

विगत चार साल में संवैधानिक मान-मर्यादाओं पर उन्होंने जितने हमले किए हैं, आप उन सबसे वाकिफ हैं, कई बार आपके भाषणों में उनका प्रतिवाद भी झलका है, लेकिन आरएसएस को परास्त करने के लिए जिस राजनीतिक गंभीरता की जरूरत है वह आपके भी आरएसएस विरोधी भाषणों से नदारत रही है। इसका ही यह परिणाम है कि आज आप आरएसएस के मुख्यालय में मुख्य वक्ता हैं, अतिथि हैं।

राजनीति में गंभीरता सबसे बड़ी ताकत होती है। हमें लगता है आरएसएस के खतरों के प्रति आपका गंभीर नहीं तदर्थभाव रहा है। यह अधिंकाँश कांग्रेसियों की बीमारी है। आप ही सोचें आरएसएस के प्रति प्रेम-घृणा की नाव में सवार होकर क्या आरएसएस को परास्त किया जा सकता है।

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