न्यायपालिका : ये खंभा भी गया तो समझिये संविधान बस एक 450 ग्राम के कागजों का पुलिंदा भर रह जायेगा

इतनी क्या हड़बड़ी थी कि सीजेआई दीपक मिश्रा को उन्होंने अदालत में ही अपने प्रति वफादारी की सौगंध उठाने वाले सरकारी वकील और "सरकारी" वकील जुटा रखे थे ।...

अतिथि लेखक

बादल सरोज

समय निकालकर इसे सुनिये ।

यह असाधारण संकट की पदचाप है । अब तक, थोड़ी बहुत विश्वसनीय बची, न्यायपालिका के पराभव की भूमिका है ।

● एक चीफ जस्टिस अपने ही जज के एक आदेश कि "मामला बहुत गम्भीर है । इस की सुनवाई के लिए 5 वरिष्ठ जजों की संविधानपीठ गठित की जानी चाहिये ।" से इतना क्यों घबरा जाता है कि आननफानन में 4 जूनियर जजों के साथ खण्डपीठ में बैठकर अपने ही जज के आदेश को रद्द कर देता है । कहता है कि हम ही सुनूँगा ।

● जबकि मसला खुद उन्हीं दीपक मिश्रा को दिये जाने के नाम पर इकट्ठा किये गये 2 करोड़ रूपये पुलिस द्वारा जब्त किये जाने और एक रिटायर्ड हाइकोर्ट जज सहित दो दलालों की गिरफ्तारी से जुड़ा था ।

● इतनी क्या हड़बड़ी थी कि सीजेआई दीपक मिश्रा को उन्होंने अदालत में ही अपने प्रति वफादारी की सौगंध उठाने वाले सरकारी वकील और "सरकारी" वकील जुटा रखे थे ।

● ये खंभा भी गया तो समझिये संविधान बस एक 450 ग्राम के कागजों का पुलिंदा भर रह जायेगा ।

इसे सुनिये, सुनाइये और आवाज उठाइये ।

बादल सरोज की एफबी टाइमलाइन से साभार

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