संविधान नहीं नवउदारवाद का अभिरक्षक राष्ट्रपति

राष्ट्रपति का चुनाव भी उसी अंधी दौड़ की भेंट चढ़ चुका है। राष्ट्रपति संविधान का अभिरक्षक कहलाता है, लेकिन पूरी चर्चा में वह नवउदारवाद के अभिरक्षक के रूप में सामने आ रहा है।...

हाइलाइट्स

'युवा संवाद' में प्रकाशित यह लेख जून 2012 का है और डॉ. प्रेम सिंह की पुस्तक 'भ्रष्टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ' (वाणी प्रकाशन) में संकलित है.

प्रेम सिंह

 एक बार फिर नवउदारवाद 

      पिछली बार की तरह इस बार भी राष्ट्रपति चुनाव लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधनिक प्रमुख के चुनाव के अवसर पर चर्चा होना अच्छी बात है। इस अवसर पर चर्चा के कई बिंदु हो सकते है। मसलन, चर्चा में पिछले राष्ट्रपतियों के चुनाव, समझदारी और विशेष कार्यों का आलोचनात्मक स्मरण किया जाए।

यहां हम याद दिलाना चाहेंगे कि देश के दो बार राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद की डॉ. लोहिया ने इस बात के लिए कड़ी आलोचना की थी कि उन्होंने राष्ट्रपति रहते बनारस के पंडितों के पैर पखारे थे। संविधान निर्माण के समय की राष्ट्रपति संबंधी बहसों का स्मरण भी किया जा सकता है। संसदीय प्रणाली की जगह राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की जो बात अक्सर होती है - अक्सर यह मान कर कि अमेरिका की तरह भारत में भी राष्ट्रपति प्रणाली अपना ली जाए तो सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी - उस पर गंभीर बहस चलाई जाए।

राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल महानुभावों से देश और दुनिया के सामने दरपेश समस्याओं पर गंभीर वार्तालाप आयोजित किया जाए। उनसे संविधन के बारे में भी बात की जाए और वे संविधन को कितना समझते और महत्व देते हैं, यह जाना जाए। सीधे राजनीति से इतर जीवन के विभिन्न आयामों पर उनसे उनका अध्ययन और राय पूछी जाए। राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के पीछे उनकी प्रेरणा और जीतने के बाद रुटीन भूमिका के अलावा करने के लिए सोचे गए कामों की जानकारी ली जाए।

चर्चा के और भी विषय और मुद्दे हो सकते हैं। हालांकि पूरी चर्चा का मुख्य बिंदु यही हो कि मौजूदा दौर में राष्ट्रपति से भारतीय राष्ट्र यानी देश के समस्त नागरिकों की क्या अपेक्षाएं हो सकती हैं और उम्मीदवार उन्हें कितना समझते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि संविधान का अभिरक्षक (कस्टोडियन) होने के नाते राष्ट्रपति के व्यक्तित्व, पद और भूमिका को लेकर पूरी चर्चा भारत के संविधान की संगति में हो, न कि उससे स्वतंत्र। इस तरह राष्ट्रपति चुनाव का अवसर हमारे संवैधानिक नागरिक बोध को पुष्ट करने में सहायक हो सकता है।

लेकिन जो चर्चा चल रही है उससे लगता है कि हमारे लिए राष्ट्रपति चुनाव कोई महत्व का अवसर नहीं है। मीडिया और राजनीतिक पार्टियां दोनों का संदेश यही है कि महत्व की बात केवल यह है कि कौन राजनीतिक पार्टी या नेता अपना आदमी राष्ट्रपति बना कर राष्ट्रपति भवन पर कब्जा करता है। (आगे देखेंगे कि यह जरूरी नहीं कि राजनीति से बाहर का सर्वसम्मति से चुना गया व्यक्ति राजनेता के मुकाबले संविधान की कसौटी और अन्य अपेक्षाओं पर ज्यादा खरा उतरता हो।)

इस बार के चुनाव में राजनीतिक पार्टियां और नेता दांव-पेच में कुछ ज्यादा ही उलझे हैं। किसी ने गुगली फेंकी है तो कोई पांसा फेंक रहा है!

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाने का सुझाव फेंका गया तो यह पूरा प्रकरण एक एब्सर्ड ड्रामा जैसा लगने लगा। जो दांव-पेच हुए और आगे होने की संभावना है, उनका पूरा ब्यौरा देने लगें तो कॉलम उसी में सर्फ हो जाएगा।

एक वाक्य में कहें तो यह पूरा प्रकरण भारतीय राजनीति की दिशाहीनता दर्शाता है। कई बार दिशाहीनता का संकट सही दिशा के संधान में सहायक हो सकता है। बशर्ते उसके पीछे एक वाजिब दिशा की तलाश की प्रेरणा निहित हो। लेकिन मुख्यधारा भारतीय राजनीति की दिशाहीनता की एक ही दिशा है - नवउदारवाद की तरफ अंधी दौड़।

राष्ट्रपति का चुनाव भी उसी अंधी दौड़ की भेंट चढ़ चुका है। राष्ट्रपति संविधान का अभिरक्षक कहलाता है, लेकिन पूरी चर्चा में - चाहे वह विद्वानों की ओर से हो, नेताओं या उम्मीदवारों की ओर से - वह नवउदारवाद के अभिरक्षक के रूप में सामने आ रहा है।

किसी कोने से यह चर्चा नहीं आई है कि राष्ट्रपति को पिछले 25 सालों में ज्यादातर अध्यादेशों के जरिए नवउदारवाद के हक में बदल डाले गए संविधान की खबरदारी और निष्ठा के साथ निगरानी करनी है; कि ऐसा राष्ट्रपति होना चाहिए जो संविधान को पहुंचाई गई चौतरफा क्षति को समझ कर उसे दुरुस्त करने की प्रेरणा से परिचालित हो; और जो संविधान के समाजवादी लक्ष्य से बंधा हो।

जाहिर है, नवउदारवाद को अपना चुकी कांग्रेस और भाजपा की तरफ से ऐसा उम्मीदवार नहीं आएगा। क्षेत्रीय पार्टियां भी कांग्रेस-भाजपा के साथ नवउदारवादी नीतियों पर चलती हैं। उनमें कई अपने को समाजवादी भी कहती हैं। उनमें एक जनता दल (यू) है जिसके प्रवक्ता ने कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के समर्थन में कहा है कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियां अटल हैं। उनके मुताबिक भाजपा के प्रवक्ता रविप्रसाद वित्तमंत्री बन जाएं तो वे भी वही करेंगे जो प्रणव मुखर्जी ने किया है।

सीधे समाजवादी नाम वाली समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह की भूमिका को देख कर लगता नहीं कि जिस लोहिया को वे मायावती के अंबेडकर की काट में इस्तेमाल करते हैं, उस महान समाजवादी चिंतक की एक पंक्ति भी उन्होंने पढ़ी है।

बीजू जनता दल और अन्ना द्रमुक पीए संगमा की उम्मीदवारी के प्राथमिक प्रस्तावक हैं। संगमा ने प्रणब मुखर्जी को बहस की चुनौती दी है। इसलिए नहीं कि बतौर वित्तमंत्री उन्होंने नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करके संविधान विरोधी कार्य किया है; बल्कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियां तेजी से लागू करने में उनकी विफलता उद्घाटित करने के लिए वे प्रणव मुखर्जी से ‘शास्त्रार्थ’ करना चाहते हैं। वे अपने को नवउदारवादी नीतियों का प्रणव मुखर्जी से बड़ा विशेषज्ञ और समर्थक मानते हैं।

प्रणब मुखर्जी के समर्थन पर जिस तरह से राजग में विभाजन हुआ है, उसी तरह वाम मोर्चा भी विभाजित है। हालांकि वाम मोर्चा का विभाजन ज्यादा महत्व रखता है, क्योंकि वह समाजवाद के लक्ष्य से परिचालित एक विचारधारात्मक मोर्चा है जो पिछले करीब चार दशकों से कायम चला आ रहा है। वाम मोर्चा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया है, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का मतदान में हिस्सा नहीं लेने का फैसला है। माकपा के साथ फारवर्ड ब्लॉक है और सीपीआई के साथ आरएसपी। माकपा ने पिछली बार भी प्रतिभा पाटिल की जगह प्रणब मुखर्जी का नाम कांग्रेस अध्यक्ष के सामने रखा था। तब वाम मोर्चा की ताकत ज्यादा थी और पश्चिम बंगाल में माकपा नीत वाम मोर्चा की सरकार थी।

समर्थन का माकपा का तर्क अजीब और खुद की पार्टी की लाइन के विपरीत है। जैसा कि प्रकाश  करात ने कहा है, राष्ट्रपति का चुनाव विचारधारा के बाहर कैसे हो गया? अगर मार्क्सवादी विचारधारा के बाहर मान भी लें, तो क्या वह संविधान की विचारधारा के भी बाहर माना जाएगा? राष्ट्रपति संविधान का अभिरक्षक होता है, फिर इसके क्या मायने रह जाते हैं? भारत में मार्क्सवादी विमर्श और पार्टी अथवा संगठन तंत्र की अपनी दुनिया है। उसका अपना शास्त्र एवं शब्दावली और उसके आधार पर आपसी सहयोग और टकराहटें हैं। माकपा के इस फैसले पर कम्युनिस्ट सर्किल में बहस चल रही है और उसे सही नहीं माना जा रहा है।

खुद माकपा के शोध प्रकोष्ठ के एक युवा नेता ने फैसले को सिरे से गलत और पार्टी लाइन के विपरीत बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया है। माकपा ने उसे पार्टी से ही बाहर कर दिया है। माकपा का कहना है कि प्रणव मुखर्जी की व्यापक स्वीकृति है और माकपा की ताकत विरोध करने की नहीं है।

सवाल है कि क्या व्यापक स्वीकृति नवउदारवाद की नहीं है? तो क्या उसका विरोध न करके उसके साथ हो जाना चाहिए? स्पष्ट है कि माकपा का फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति से संबद्ध है। अपनी प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी द्वारा प्रणब मुखर्जी के विरोध के चलते माकपा ‘बंगाली मानुष’ को रिझाने के लिए मुखर्जी का समर्थन कर रही है।

 लेकिन इसमें विचारधारात्मक उलझन भी शामिल है। संकट में घिरी माकपा भारतीय समाजवाद की बात करने के बावजूद पूंजीवाद के बगैर समाजवाद की परिकल्पना नहीं कर पाती है। उसके सामने दो ही रास्ते हैं - या तो वह पूंजीवाद का मोह छोड़े या एकबारगी पूंजीवाद के पक्ष में खुल कर मैदान में आए।

एक दूसरी उलझन भी है। मार्क्सवादियों के लिए भारत का संविधान (और उसके तहत चलने वाला संसदीय लोकतंत्र) समाजवादी क्रांति में बाधा है। उन्होंने मजबूरी में उसे स्वीकार किया हुआ है। इसलिए संविधान के प्रति सच्ची प्रेरणा उनकी नहीं बन पाती। तीसरी उलझन यह है कि आज भी वे राजनीति की ताकत के पहले पार्टी की ताकत पर भरोसा करते हैं। संगठन से बाहर - चाहे वह पार्टी का हो, लेखकों का, या सरकार का - मार्क्सवादी असहज और असुरक्षित महसूस करते हैं। लिहाजा, बाहर की दुनिया उनके लिए ज्यादातर सिद्धांत बन कर रह जाती है। इसके चलते राजनीतिक ताकत का विस्तार नहीं हो पाता।

 अच्छा यह होता कि वाम मोर्चा अपना उम्मीदवार खड़ा करता। चुनावी गणित में वह कमजोर होता, लेकिन जब तक जनता तक यह संदेश नहीं जाएगा कि उसकी पक्षधर राजनीति कमजोर है, तब तक वह उसे ताकत कैसे देगी? अभी तो यह हो रहा है कि खुद जनता की पक्षधर राजनीति के दावेदार यह कह कर मुख्यधारा के साथ हो जा रहे हैं कि उनकी चुनाव लड़ने की ताकत नहीं है। अकेली आवाज, अगर सच्ची है, तो उसे अपना दावा पेश करना चाहिए। नवउदारवादी साम्राज्यवाद के इस दौर में समाजवादी राजनैतिक चेतना के निर्माण का यही एक रास्ता है जो संविधान ने दिखाया है।

जरूरी नहीं है कि नवउदारवाद की पैरोकार राजनीतिक पार्टियों के सभी नेता और कार्यकर्ता नवउदारवाद के समर्थक हों। वे भी उठ खड़े हो सकते हैं और अपनी पार्टियों में बहस चला सकते हैं। कहने का आशय यह है कि नवउदारवाद समर्थक प्रणब मुखर्जी और पीए संगमा के मुकाबले में वाम मोर्चा की तरफ से एक संविधान समर्थक उम्मीदवार दिया जाना चाहिए था।

वह उम्मीदवार राजनीतिक पार्टियों के बाहर से भी हो सकता था। जैसे कि जस्टिस राजेंद्र सच्चर का नाम सामने आया था। लेकिन उस दिशा में आगे कुछ नहीं हो पाया। जबकि नागरिक समाज संविधान के प्रति निष्ठावान किसी एक व्यक्ति को चुन कर नवउदारवादी हमले के खिलाफ एक अच्छी बहस इस बहाने चला सकता था। ऐसे व्यक्ति का नामांकन नहीं भी होता, तब भी उद्देश्य पूरा हो जाता। लेकिन भारत के नागरिक समाज की समस्या वही है जो मुख्यधारा राजनीति में बनी हुई है। वहां समाजवादी आस्था वाले लोग बहुत कम हैं। ज्यादातर आर्थिक सुधारों की तेज रफ्तार के सवार हैं। यही कारण है कि जस्टिस सच्चर अथवा किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में नागरिक समाज की ओर से मजबूत प्रयास नहीं हो पाया।

 कह सकते हैं कि राष्ट्रपति का यह चुनाव संकट के समाधन की दिशा में कोई रोशनी नहीं दिखाता। बल्कि संकट को और गहरा करता है। प्रणब मुखर्जी की राष्ट्रपति के रूप में जीत को मनमोहन सिंह और मंटोक सिंह आहलुवालिया आर्थिक सुधारों को तेज करने का अवसर बनाएंगे। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति चुनाव जीतते ही सबसे पहले संभवतः खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश के स्थगित फैसले को लागू कर दिया जाएगा।

यह भी कह सकते हैं कि इस संकट से जूझा जा सकता था, बशर्ते नागरिक समाज संविधान की टेक पर टिका होता। हम नक्सलवादियों को बुरा बताते हैं और उन पर देशद्रोह का अपराध जड़ते हैं, क्योंकि वे भारत के संविधान को स्वीकार नहीं करते। लेकिन नक्सलवादियों को देशद्रोही बताने वाले राजनेताओं और नागरिक समाज एक्टिविस्टों की संविधान के प्रति अपनी निष्ठा सच्ची नहीं हैं - पिछले 25 सालों में यह उत्तरोत्तर सिद्ध होता गया है। इस चुनाव से भी यही सबक मिलता है। 

टीम अन्ना ने प्रधानमंत्री समेत उनकी केबिनेट के जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं उनमें प्रणव मुखर्जी भी हैं। वे राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि टीम अन्ना की लड़ाई भ्रष्टाचार से उतनी नहीं, जितनी कांग्रेस से ठन गई है

प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना कांग्रेस की जीत है।

भाजपा कांग्रेसी उम्मीदवार को रोकने की, या कम से कम उसे मजबूत टक्कर देने की रणनीति नहीं बना पाई। उसके वरिष्ठतम नेता अडवाणी दयनीयता से कह रहे हैं कि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के नाम पर सर्वसम्मति बनाने के लिए भाजपा से बात नहीं की। ममता बनर्जी अभी यूपीए से निकली नहीं हैं और मुलायम सिंह झोली में गिरने को तैयार बैठे हैं। भाई रामगोपाल यादव को उपराष्ट्रपति का पद मिल जाए, दूसरे भाई शिवपाल यादव और बहू डिंपल केंद्र में मंत्री बन जाएं तो परिवार के मुखिया का कर्तव्य संपूर्ण हो जाएगा!

आरएसएस हालांकि मोदी पर अड़ेगा नहीं, लेकिन ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ हो जाए तो राजग के घटक दल ही नहीं, देर-सबेर भाजपा में भी विग्रह तेज होगा। ऐसी स्थिति में 2014 में कांग्रेस की पक्की हार मानने वाले टीम अन्ना के कुछ सदस्य अभी से अलग लाइन पकड़ सकते हैं।

वैसे भी राजनीति से दूर रहने की बात केवल कहने की है। केजरीवाल और प्रशांत भूषण चुनाव लड़ने की संभावनाएं तलाशते घूम रहे हैं। रामदेव गडकरी से लेकर बर्धन तक नेता-मिलाप करते घूम रहे हैं। ये सब एक ही टीम है - नवउदारवाद की पक्षधर और पोषक। इनके पास सारा धन इसी भ्रष्ट व्यवस्था से आता है। अपने नाम और नामे के फिक्रमंद ये सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट भला किसी सही व्यक्ति के नाम पर अड़ कर अपनी ऊर्जा क्यों बरबाद करते

 बहरहाल, कई नाम चर्चा में आने के बाद दो उम्मीदवार तय हो गए हैं। यूपीए की तरफ से प्रणब मुखर्जी और एनडीए की तरफ से पीए संगमा। कांग्रेस में राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस प्रत्याशी का चुनाव सोनिया गांधी ने किया। पार्टी के नेताओं ने इसके लिए बाकायदा उनसे गुहार लगाई। जैसे संसद में सब कुछ तय करने का अधिकार सोनिया गांधी का है और विधानसभा में एमएलए प्रत्याशी से लेकर मुख्यमंत्री तक तय करने का अधिकार है, उसी तरह राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार भी वे स्वयं ही तय करती हैं। पिछली बार भी उन्होंने यही किया था। इससे कांग्रेस पर तो क्या फर्क पड़ना है, राष्ट्रपति पद की गरिमा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

जैसा कि कहा जा रहा है, प्रणब मुखर्जी बहुत हद तक सर्वस्वीकार्य हैं। लेकिन सोनिया गांधी ने उस वजह से उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया है। सोनिया गांधी के प्रति व्यक्तिगत और नवउदारवाद के प्रति विचारधारागत समर्पण की लंबी तपस्या के बाद उन्हें रायसीना हिल पर आराम फरमाने का पुरस्कार दिया गया है। हालांकि तपस्यारत प्रणब मुखर्जी को, कहते हैं, प्रधनमंत्री पद की आशा थी। लेकिन सोनिया गांधी किसी राजनीतिक व्यक्ति को इस पद के आस-पास नहीं फटकने दे सकतीं। नवउदारवादी प्रतिष्ठान सोनिया गांधी को स्वाभाविक तौर पर अपना मानता है। सोनिया गांधी की ताकत का स्रोत केवल कांग्रेसियों द्वारा की जाने वाली उनकी भक्ति नहीं है। केवल उतना होता तो अब तक तंबू गिर चुका होता। वैश्विक पूंजीवादी ताकतें उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बनाए हुए हैं। जिस दिन चाहेंगी, हटा

जाहिर है, सर्वस्वीकार्य, अनुभवी और योग्यतम प्रणब मुखर्जी किसी गंभीर दायित्व-बोध के तहत राष्ट्रपति के चुनाव में नहीं हैं। बल्कि यह चुनाव उनका अपना है ही नहीं। वे चुनाव जीतेंगे और संविधान की एक बार फिर हार होगी। पार्टी और सरकार से विदाई के बिल्कुल पहले तक आर्थिक सुधारों की रफ्तार तेज करने की जरूरत बताने वाले प्रणब मुखर्जी की डोर राष्ट्रपति भवन में भी सुधारों के साथ बंधी रहेगी।

 दूसरे उम्मीदवार संगमा भी किसी गंभीर दायित्व-बोध के तहत चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। बल्कि अपने अब तक के राजनैतिक कैरियर का उत्कर्ष हासिल करने के लिए मैदान में हैं। वे सत्ता के सुख में मगन रहने वाले नेता हैं जो 1977 से अब तक आठ बार लोकसभा के सदस्य चुने गए हैं। वे केंद्र में मंत्री रहे हैं, मेघालय के मुख्यमंत्री रहे हैं और सर्वसम्मति से लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी बेटी केंद्र में मंत्री है और बेटा मेघालय में। कांग्रेस से राकांपा, राकांपा से तृणमूल कांग्रेस, फिर राकांपा और अपनी उम्मीदवारी न छोड़ने के चलते अब राकांपा से बाहर हैं। इस पद पर उनकी पहले से नजर थी। कोई आदिवासी अभी तक राष्ट्रपति नहीं बना है, यह तर्क उन्होंने अपने पक्ष में निकाला और पांच-छह लोगों का ट्राइबल फॉरम ऑफ इंडिया बना कर खुद को उस फॉरम का उम्मीदवार घोषित कर दिया। यह कहते हुए कि वे देश के करोड़ों आदिवासियों के प्रतिनिधि हैं।

 संयोग से हमें एक टीवी चैनल पर संगमा का इंटरव्यू सुनने को मिल गया। तब तक भाजपा ने उन्हें अपना उम्मीदवार स्वीकार नहीं किया था।

इंटरव्यू के अंत का भाग ही हम सुन पाए। उनके जवाब कहीं से भी राष्ट्रपति के पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थे। जिस सर्वोच्च पद के लिए वे खड़े हैं, अपने को उसके के लिए उन्होंने कतई तैयार नहीं किया है। वे राजनीति का मतलब अपने और अपने बच्चों के लिए बड़े-बड़े पदों की प्राप्ति मानते हैं। यह सब उन्हें मिला है, इसके लिए उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। लेकिन राजनीतिक सत्ता की उनकी भूख किंचित भी कम नहीं हुई है। वे अपनी और अपने बच्चों की और बढ़ती देखना चाहते हैं।

जब एंकर ने पूछा कि अभी तो वे काफी स्वस्थ हैं और आगे की बढ़ती देख पाएंगे तो उन्होंने कहा कि राजेश पायलट कहां देख पाए अपने बेटे को मंत्री बने? यानी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं कब दगा दे जाए, इसलिए जो पाना है जल्दी से जल्दी पाना चाहिए।

उन्होंने अंत में यह संकेत भी छोड़ा कि इस बार न सही, अगली बार उन्हें राष्ट्रपति बनाया जाए।

उपनिवेशवादी दौर रहा हो, आजादी के बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था का दौर रहा हो या पिछला 25 सालों का नवउदारवादी दौर - विकास के पूंजीवादी मॉडल की सबसे ज्यादा तबाही आदिवासियों ने झेली है।

संगमा उत्तर-पूर्व से हैं। वहां के आदिवासियों और शेष भारत के आदिवासियों की स्थितियों में ऐतिहासिक, भौगोलिक व सांस्कृतिक कारकों के चलते फर्क रहा है। पूंजीवाद का कहर बाकी भारत के आदिवासियों पर ज्यादा टूटा है। संगमा आदिवासियों की तबाही करने वाली राजनीति और विकास के 1977 से अग्रणी नेता रहे हैं। उन्होंने कभी आदिवासियों के लिए आवाज नहीं उठाई। आदिवासियों को उजाड़ने वाली राजनीति के सफल नेता रहे संगमा अब उनके नाम पर राष्ट्रपति बनना चाहते हैं। सत्ता की उनकी भूख इतनी ‘सहज’ है कि वे किसी भी समझौते के तहत मैदान से हट कर उपराष्ट्रपति बनने को तैयार हो सकते हैं। ताकि आगे चल कर राष्ट्रपति बन सकें।

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