गौ आतंकियों को सरकार का संरक्षण : “राष्ट्रीय शर्म” से राजनैतिक फायदा उठाने की सरकार की शर्मनाक कोशिश

सबसे शर्मनाक और अफसोसनाक रवैया हमारे समाज का हो गया है। जहां समाज इतना क्रूर निर्दयी निर्लज्ज और कायर हो गया हो वहां हम किस मानवता और किस कानून की उम्मीद कर सकते हैं ?...

गौ आतंकियों को सरकार का संरक्षण और अवाम की बेहिसी

राष्ट्रीय शर्मसे राजनैतिक फायदा उठाने की सरकार की शर्मनाक कोशिश

उबैद उल्लाह नासिर 

लोक सभा में अविश्वास पर हो रही बहस में अपना पक्ष रखते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने जिस प्रकार भीड़ की हिंसा की तुलना 1984 के सिख विरोधी दंगों से की है वह न केवल एक “राष्ट्रीय शर्म” से राजनैतिक फायदा उठाने की शर्मनाक कोशिश है बल्कि एक प्रकार से इस भीड़तन्त्र और हिंसा को उचित ठहराने की कोशिश भी है। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मजाक उड़ाना भी है जिस ने इस अमानवीय कृत्य पर सख्त नाराजगी ज़ाहिर करते हुए इसकी रोकथाम का ठोस उपाय करने का राज्यों और केंद्र सरकार को आदेश दिया है। लेकिन जिस प्रकार कोई केन्द्रीय मंत्री ट्रायल कोर्ट से आजीवन कारावास की सज़ा पाए इन गुंडों को हाई कोर्ट से केवल जमानत मिलने पर ही उनका माला पहना कर स्वागत करता है, जिस प्रकार एक आरोपी की बीमारी के कारण अस्पताल में मौत हो जाने पर उसके शव को तिरंगे में लपेट कर उसका अंतिम संस्कार करवाता है और राज्य सरकार को मजबूर करता है कि वह इस आरोपी के परिवार वालों को भी मक्तूल के परिवार वालों के ही बराबर मुआवजा दिया जाय, जिस प्रकार संघ परिवार की एक महिला नेता आरोपी को शहीद आज़म भगत सिंह के समतुल्य ठहराती हैं, जिस प्रकार कठुआ में रेप और हत्या के आरोपियों की हिमायत में तिरंगा यात्रा निकली जाती है और उन्मादी धार्मिक नारे लगाए जाते हैं, इन सब से साफ़ ज़ाहिर है कि इन लम्पटों को सरकार का संरक्षण प्राप्त है। ऐसे में साफ़ ज़ाहिर है कि इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का वैसे ही पालन होगा जैसे बाबरी मस्जिद का ढांचा बचाने के लिए या अवैध धार्मिक स्थलों को गिराने के लिये हो रहा है।

जब सत्ता का मतलब जिसकी लाठी उसकी भैंस हो तो नियम कानून अदालत सब धरी की धरी रह जाती हैI प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की शपथ ग्रहण के दूसरे या तीसरे ही दिन पुणे में मोहसिन शेख नामी एक नवजवान इंजीनियर की चार पांच लम्पटों के एक झुण्ड ने उस समय पीट-पीट कर ह्त्या कर दी थी, जब वह रात को नमाज़ पढ़ कर मस्जिद से अपने घर जा रहा था। अदालत ने भी माना है कि इन लम्पटों का मोहसिन से कोई बैर नहीं था, उसका धर्म ही उस की मौत का कारण बना।

उत्तर प्रदेश के दादरी में अखलाक नामी एक व्यक्ति को इस लिए पीट-पीट कर मार डाला गया कि उसके फ्रिज में कथित तौर से बीफ रखा था, हालांकि बाद में फॉरेंसिक जांच में वह मटन निकला तब से लेकर अब तक गौ रक्षा के नाम पर दर्जनों मुसलमानों को पीट-पीट कर मौत के घाट उतारा जा चुका है। भाजपा शासित राजस्थान और झारखंड इस सम्बन्ध में सब से आगे हैं।

इन कातिल लम्पटों को भाजपा नेताओं का ही नहीं बल्कि मंत्रियों तक का संरक्ष्ण प्राप्त है, यहाँ तक कि मोदी मंत्रीमंडल में सब से सुशिक्षित और गंभीर समझे जाने वाले जयंत सिन्हा ने जेल से जमानत पर छूट कर आये इन लम्पटों का माला पहना कर स्वागत किया। गिरिराज किशोर उन से मिलने जेल जाते हैं। राजस्थान के गृह मंत्री मुस्लिम गौ पालकों और किसानों को गौ तस्कर बताते हैं, हालांकि उनके पास से सरकारी बाज़ार से कानूनी तौर से खरीदी गयी गायों की रसीद (रवन्ना ) होता है, लेकिन कोई कुछ सुनने देखने मानने को तैयार नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पोते श्री तुषार गांधी और कांग्रेस के प्रवक्ता तहसीन पूना वाला की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस अमानवीय कृत्य पर न केवल रोष प्रकट किया है बल्कि उसकी रोक थाम के लिए केंद्र व सभी राज्य सरकारों को गाइड लाइन भी जारी की है और सबसे चार हफ्तों में हलफ नामा तलब किया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद ही दो घटनाएँ हो गयीं, गृह मंत्री ने इसे सिख दंगों से जोड़ दिया और एक अन्य केंद्रीय मंत्री मेघवाल ने उसे मोदी की लोक प्रियता से जोड़ते हुए कहा कि जैसे-जैसे मोदी लोकप्रिय होते जायेंगे, वैसे-वैसे यह घटनाएँ भी बढ़ेंगीं।

दुःख और शर्म की बात यह है कि इन मामलों में स्थानीय पुलिस और जिला अदालतों का रवैया भी ठीक नहीं होता। पुलिस मकतूल पर ही जानवरों पर क्रूरता आदि के मुकदमे लिख कर क्रॉस केस बना के उसे कमज़ोर कर देती है। अभी अलवर में जो काण्ड हुआ उस में तो यही निकल कर आ रहा है कि अकबर की मौत गौ गुंडों की पिटाई से नहीं, बल्कि पुलिस की पिटाई से हुई। पुलिस जब मौके वारदात पर पहुंची तो अकबर ज़ख़्मी परन्तु ज़िंदा था। पुलिस टीम को अकबर की जान बचाने से ज्यादा गायों को सुरक्षित स्थान पर भिजवाने की ज्यादा चिंता थी। इसी कारण ज़ख़्मी अकबर को केवल सात किलोमीटर दूर PHC पहुंचाने में चार घंटे लग गए, इस बीच उसकी मौत हो चुकी थीI

यह भी मालूम हुआ है कि जीप में पड़े ज़ख़्मी अकबर को एक पुलिस वाला लातों से मार रहा थाI

झारखंड के अलीमुद्दीन काण्ड को छोड़ कर ऐसा कोई भी केस कहीं भी फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं भेजा गयाI

सबसे शर्मनाक और अफसोसनाक रवैया हमारे समाज का हो गया है। लम्पटों का गिरोह एक निरीह व्यक्ति को पीट-पीट कर मार रहा है, सैकड़ों की भीड़ यह मंज़र देख रही है और उसकी विडियो फिल्म बना रही होती है, लेकिन कोई उसे बचाने नहीं आता। जुनेद नाम के एक सोलह साल के लड़के को ट्रेन के अन्दर पीट-पीट कर मार डाला जाता है और ओवर पैक डिब्बे में एक भी मर्द उस बच्चे को बचाने नहीं आता। हाँ, जब उस की लाश को खींच कर डब्बे से बाहर फेंकने के लिए ले जाया जाता है तो लोग किनारे हो कर रास्ता दे देते हैं। जहां समाज इतना क्रूर निर्दयी निर्लज्ज और कायर हो गया हो वहां हम किस मानवता और किस कानून की उम्मीद कर सकते हैं ?

मशहूर कानूनविद और राज्य सभा सांसद केटीएस तुलसी ने एक प्राइवेट मेम्बर बिल लाने का एलान किया है, जिसमें भीड़ के इस आतंक को रोकने के लिए कानूनी प्रावधान बताये जायेंगे। उन्होंने बताया कि इसके लिए सम्बंधित थाने के इन्चार्ज को भी ज़िम्मेदार बनाने का बिल में प्रावधान है। बेहतर हो वहां मौजूद लोगों को भी इस बिल के दायरे में लाया जाए और उन पर मुजरिमाना साज़िश 120 B का केस बनाया जाना चाहिए, क्योंकि अगर मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद कुछ लोग भी हिम्मत कर लें तो इन वारदातों को रोका जा सकता है। वैसे हमारा ज़मीर मर चुका है हमें यह स्वीकार कर लेने में संकोच नहीं करना चाहिएI

उबैद उल्लाह नासिर, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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