काश पं. जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गाँधी की वह बात भी मान ली होती

स्मार्ट सिटी : अंधाधुंध शहरीकरण के चक्कर में कहीं हम अपने देश के गाँवों को तबाह न कर दें...

काश पं. जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गाँधी की वह बात भी मान ली होती

स्मार्ट सिटी : अंधाधुंध शहरीकरण के चक्कर में कहीं हम अपने देश के गाँवों को तबाह न कर दें

स्मार्ट सिटी और महात्मा गाँधी के विकास का दर्शन

शेष नारायण सिंह

दो अक्टूबर महात्मा गाँधी का जन्मदिन तो है ही, लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन भी है। महात्मा गाँधी ने कहा था कि भारत के आज़ाद होने के बाद यहाँ ग्राम स्वराज आएगा। देश को विकसित करने के लिए गांव को विकास की इकाई बनाया जाएगा और गाँवों की सम्पन्नता ही देश की सम्पन्नता की यूनिट बनेगी।

पं। जवाहरलाल नेहरू, गाँधी जी की हर बात को मानते थे लेकिन पता नहीं क्यों उन्होंने गाँधी के विकास के दर्शन की इस बुनियाद बात को लागू नहीं किया। उन्होंने सोवियत रूस में प्रचलित ब्लाक डेवेलपमेंट के मॉडल को अपनाया। और उसी को बुनियाद बनाकर ग्रामीण विकास के लिए साम्युदायिक विकास की बहुत बड़ी योजना को लागू कर दिया।

महात्मा गाँधी के जन्मदिन के अवसर पर 1952 में भारत में कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया गया। आज़ादी के बाद देश में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए शुरू किए गए कार्यक्रमों में यह बहुत ही महत्वपूर्ण कार्यक्रम था। लेकिन यह असफल रहा, अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका। इस कार्यक्रम के असफल होने के कारणों की पडताल शायद महात्मा जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी क्योंकि इस कार्यक्रम को शुरू करते वक़्त लगभग हर मंच से सरकार ने यह दावा किया था कि कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम के ज़रिये महात्मा गाँधी के सपनों के भारत को एक वाताविकता में बदला जा सकता है। मौजूदा सरकार भी महात्मा गाँधी के नाम पर कई कार्यक्रम चला रही है। उनके जन्म से डेढ़ सौ साल पूरे होने पर तरह तरह के कार्यक्रम होने जा रहे हैं। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत के गाँवों को खुशहाल देखने के महात्मा गाँधी के सपने को क्या इनका कोई कार्यक्रम लागू कर पाएगा।

सामुदायिक विकास वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया है जिस से एक समुदाय के विकास के लिए लोग अपने आपको औपचारिक या अनौपचारिक रूप से संगठित करते हैं। यह विकास की एक सतत् प्रक्रिया है। इसकी पहली शर्त ही यही थी कि अपने यहाँ स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करके समुदाय का विकास किया जाना था जहां ज़रूरी होता वहां बाहरी संसाधनों के प्रबंध का प्रावधान भी था।

क्या है सामुदायिक विकास

कम्युनिटी डेवलपमेंट की परिभाषा में ही यह लिखा है कि सामुदायिक विकास वह तरीका है जिसके ज़रिये गांव के लोग अपनी आर्थिक और सामाजिक दशा में सुधार लाने के लिए संगठित होते हैं। बाद में यही संगठन राष्ट्र के विकास में भी प्रभावी योगदान करते हैं।

सामुदायिक विकास की बुनियादी धारणा ही यह है कि अगर लोगों को अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने के अवसर मुहैया कराए जाएँ तो वे किसी भी कार्यक्रम को सफलतापूर्वक चला सकते हैं।

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भारत में 2 अक्टूबर 1952 के दिन जब कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम की शुरुआत की गई तो सोचा गया था कि इसके रास्ते ही ग्रामीण भारत का समग्र विकास किया जाएगा। इस योजना में खेती, पशुपालन, लघु सिंचाई, सहकारिता, शिक्षा, ग्रामीण उद्योग अदि शामिल था, जिसमें सुधार के बाद भारत में ग्रामीण जीवन की हालात में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता था। कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम को लागू करने के लिए बाकायदा एक अमलातंत्र बनाया गया। जिला और ब्लाक स्तर पर सरकारी अधिकारी तैनात किए गए, लेकिन कार्यक्रम से वह नहीं हासिल हो सका जो तय किया गया था। इस तरह महात्मा गाँधी के सपनों के भारत के निर्माण के लिए सरकारी तौर पर जो पहली कोशिश की गई थी वह भी बेकार साबित हुई। ठीक उसी तरह जिस तरह गाँधीवादी दर्शन की हर कड़ी को अन्धाधुन्ध औद्योगीकरण और पूँजी के केंद्रीकरण के सहारे तबाह किया गया।

गाँधीवाद को इस देश में राजकाज का दर्शनशास्त्र नहीं बनने दिया कांग्रेस ने

कांग्रेस ने कभी भी गाँधीवाद को इस देश में राजकाज का दर्शनशास्त्र नहीं बनने दिया। ग्रामीण भारत में नगरीकरण के तरह तरह के प्रयोग हुए और आज भारत तबाह गाँवों का एक देश है। देश के कई हिस्सों में तो ऐसे हांव हैं जहाँ जिउ नहीं रहता। उत्तराखंड में इस तरह के गाँव सबसे ज़्यादा हैं।

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यह देखना दिलचस्प होगा कि इतनी बड़ी और महत्वाकाँक्षी परियोजना को इस देश के हर दौर के हुक्मरानों ने कैसे बर्बाद किया।

यहाँ यह ध्यान में रखना होगा कि उस योजना को तबाह करने वालों में पं. जवाहरलाल नेहरू भी एक थे। उनके दिमाग में भी यह बात समा गई थी कि भारत का ऐसा विकास होना चाहिये जिसके बाद भारत के गाँव भी शहर जैसे दिखने लगें। वे गाँवों में शहरों जैसी सुविधाओं को उपलब्ध कराने के चक्कर में थे। उन्होंने उसके लिए सोवियत रूस में चुने गए मॉडल को विकास का पैमाना बनाया और हम एक राष्ट्र के रूप में बड़े शहरों, मलिन बस्तियों और उजड़े गाँवों का देश बन गए।

क्या था कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम का उद्देश्य

कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम को शुरू करने वालों ने सोचा था कि इस कार्यक्रम के लागू होने के बाद खेतों, घरों और सामूहिक रूप से गाँव में बदलाव आएगा। कृषि उत्पादन और रहन सहन के सत्र में बदलाव् आएगा। गाँव में रहने वाले पुरुष, स्त्री और नौजवानों की सोच में बदलाव लाना भी कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम का एक उद्देश्य था लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ।

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सरकारी स्तर पर ग्रामीण विकास के लिए जो लोग तैनात किए गए उनके मन में सरकारी नौकरी का भाव ज्यादा था, इलाके या गांव के विकास को उन्होंने कभी प्राथमिकता नहीं दिया। ब्रिटिश ज़माने की नज़राने और रिश्वत की परम्परा को इन सरकारी कर्मचारियों ने खूब विकसित किया। पंचायत स्तर पर कोई भी ग्रामीण लीडरशिप डेवलप नहीं हो पाई। अगर विकास हुआ तो सिर्फ ऐसे लोगों का जो इन सरकारी कर्मचारियों के दलाल के रूप में काम करते रहे।

इसी बुनियादी गलती के कारण ही आज जो भी स्कीमें ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के अंतर्गत गाँवों में भेजी जाती हैं उनका लगभग सारा पैसा इन्हीं दलालों के रास्ते सरकारी अफसरों और नेताओं के पास पंहुच जाता है।

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2 अक्टूबर 1952 को शुरू किया गया यह कार्यक्रम आज पूरी तरह से नाकाम साबित हो चुका है। इसके कारण बहुत से हैं। सामुदायिक विकास कार्यक्रम के नाम पर पूरे देश में नौकरशाही का एक बहुत बड़ा वर्ग तैयार हो गया है लेकिन उस नौकरशाही ने सरकारी नौकरी को ही विकास का सबसे बड़ा साधन मान लिया। शायद ऐसा इसलिए हुआ कि विकास के काम में लगे हुए लोग रिज़ल्ट दिखाने के चक्कर में ज्यादा रहने लगे।

सच्चाई यह है कि ग्रामीण विकास का काम ऐसा है जिसमें नतीजे हासिल करने के लिए किया जाने वाला प्रयास ही सबसे अहम प्रक्रिया है। सरकारी बाबुओं ने उस प्रक्रिया को मार दिया। उसी प्रक्रिया के दौरान तो गाँव के स्तर पर सही अर्थों में लीडरशिप का विकास होता लेकिन सरकारी कर्मचारियों ने ग्रामीण लीडरशिप को मुखबिर या दलाल से ज्यादा रुतबा कभी नहीं हासिल करने दिया।

क्या हैं सामुदायिक विकास के बुनियादी सिद्धांत

सामुदायिक विकास के बुनियादी सिद्धांत में ही लिखा है कि समुदाय के लोग अपने विकास के लिए खुद ही प्रयास करेंगें। उस काम में लगे हुए सरकारी कर्मचारियों का रोल केवल ग्रामीण विकास के लिए माहौल बनाना भर था, लेकिन वास्तव में ऐसा कहीं नहीं हुआ। कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम के बुनियादी कार्यक्रम के लिए बनाई गई सुविधाओं और नौकरशाही के जिम्मे अब लगभग सभी विकास कार्यक्रम लाद दिए गए गए हैं, लेकिन विकास नज़र नहीं आता। सबसे ताज़ा उदाहरण महात्मा गाँधी के नाम पर शुरू किए गए मनरेगा कार्यक्रम की कहानी है। बड़े ऊंचे उद्देश्य के साथ शुरू किया गया यह कार्यक्रम आज ग्राम प्रधान से लेकर कलेक्टर तक को रिश्वत की एक गिज़ा उपलब्ध कराने से ज्यादा कुछ नहीं बन पाया है। इसलिए महात्मा गाँधी के जन्म दिवस डेढ़ सौवें साल के अवसर पर उनके सपनों का भारत बनाने के लिए शुरू किए गए जवाहर लाल नेहरू के प्रिय कार्यक्रम की दुर्दशा का ज़िक्र कर लेना उचित जान पड़ता है और मौजूदा हुक्मरानों को आगाह कर देने की भी ज़रूरत है कि अंधाधुंध शहरीकरण के चक्कर में कहीं हम अपने देश के गाँवों को तबाह न कर दें

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