2019 की जंग शुरू : मातृभूमि की रक्षा के लिये, तय करो किस ओर हो तुम !

मातृभूमि की रक्षा के लिये सब तोपची मिल, दागो अपनी तोप ! हर संघी होता है हिटलर का समर्थक

अरुण माहेश्वरी
Updated on : 2018-07-23 18:44:49

2019 की जंग शुरू : मातृभूमि की रक्षा के लिये, तय करो किस ओर हो तुम !

कौन कहां खड़ा होगा, तय करो !

मातृभूमि की रक्षा के लिये सब तोपची मिल, दागो अपनी तोप !

-अरुण माहेश्वरी

कांग्रेस ने अंतत: अपनी कार्य समिति की बैठक में आज की भारतीय जनता पार्टी की बिल्कुल सही शिनाख्त कर ली है - यह मोदी पार्टी है; अर्थात् हिटलर की नाजी पार्टी। यह कोई जनतांत्रिक राजनीतिक दल नहीं, भारत में जघन्य सांप्रदायिक नफरत के आधार पर एक व्यक्ति की हत्यारी पार्टी है। मॉब लिंचिंग, गुप्त हत्या, हत्याओं की श्रृंखला और जन-संहार इसकी राजनीति के, सर्वग्रासी सत्ता और पूर्ण वर्चस्व के इसके लक्ष्य के क्रियात्मक रूप है।

अनिवार्य तौर पर हर संघी होता है हिटलर का समर्थक

इस बात को कोई भी व्यक्ति आरएसएस के लोगों के साथ अपने दैनंदिन निजी अनुभवों के आधार पर जांच सकता है कि हर संघी अनिवार्य तौर पर हिटलर का समर्थक होता है। हिटलर के प्रति श्रद्धा के अनुपात से उनके संघ के सिद्धांतों के प्रति निष्ठा की गहराई को मापा जा सकता है। हिटलर की तरह ही उनमें समाज के हर कमजोर आदमी के प्रति तीव्र नफरत होती है और वे ‘जो जीता वही सिकंदर’ की तरह के नादिरशाही के मंत्रों को बड़ी निर्लज्जता से रटा करता है।

अपनी इसी शिनाख्त के आधार पर कांग्रेस ने बिल्कुल सही और जरूरी निर्णय लिया है कि 2019 के चुनाव में उसे अपने किसी तथाकथित दूरगामी हितों की बिना परवाह किये देश के सभी स्तर के अलग-अलग मतावलंबी लोगों को भी एकजुट और लामबंद करके भारत के इस हिटलर को पराजित करना है। कांग्रेस ने इसे भारत का दूसरा स्वतंत्रता संघर्ष कहा है। हम इसे भारत में हिटलरशाही के खिलाफ जनतंत्र मात्र की रक्षा की लड़ाई कहना चाहेंगे क्योंकि जनतंत्र अगर रहेगा तो सत्ता पर राजनीति के सभी अलग-अलग प्रतिद्वंद्वी दावेदारों का भी अस्तित्व रहेगा। अन्यथा लिंचिंग, हत्याओं की श्रृंखला, जनसंहारों की हिटलरी राजनीति का प्रत्येक संवेदनशील नागरिक तक को शिकार होना होगा। राजेश जोशी की कविता है - ‘जो अपराधी नहीं होगा, मारा जायेगा।’

जनतंत्र की रक्षा की लड़ाई का एक अनुभव

भारत की जनता ने अपने आजादी के बाद के राजनीतिक जीवन में जनतंत्र मात्र की रक्षा की एक ऐसी, भले छोटी ही क्यों न हो, लड़ाई लड़ी है। इंदिरा गांधी के आंतरिक आपातकाल के खिलाफ लड़ाई - जब इंदिरा गांधी में सर्वग्रासी सत्ता का रुझान दिखाई दिया था। और उस समय इंदिरा गांधी को पराजित करके पटरी पर लाने की लड़ाई में किसी ने भी लड़ाई में उतरे लोगों की अपनी अपनी पहचानों की एक बार के लिये परवाह नहीं की थी।

चूंकि सन् ‘75 से ‘77 के उस अनुभव के साथ कांग्रेस दल का नाम जुड़ा हुआ है, संभवत: इसीलिये अभी कांग्रेस कार्यसमिति आने वाले दिनों की इस नई और बेहद चुनौती भरी, जनतंत्र की रक्षा की कठिन लड़ाई को ‘दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन’ बता रही है। लेकिन, सारत:, यहां कहना पड़ता है -‘नाम में क्या रखा है !’ मूल बात, जो कांग्रेस कार्यसमिति ने बिल्कुल सही कही है, वह यह है कि 2019 हरेक भारतवासी के लिये भारत मात्र की अवधारणा की रक्षा की लड़ाई है। इसमें शामिल होने वाले का अपना कोई रंग नहीं होगा, कोई जात, कोई पहचान और कोई विचारधारा नहीं हेगी - वह सिर्फ भारतीय, मातृभूमि की रक्षा का सिपाही, भारत में जनतंत्र का सेनानी होगा। इस प्रकार, कांग्रेस कार्य समिति ने हिटलरी शासन में निहित तमाम खतरों को, देश के अस्तित्व मात्र के लिये खतरे को सही पकड़ा है।

भारत की रक्षा का सवाल

आरएसएस के लोग हिटलर की प्रशंसा में अक्सर कहते पाये जायेंगे कि वह तो एक भूल कर बैठा, रूस के जाड़े में फंस गया, अन्यथा वह पूरी दुनिया का एकछत्र राजा ही होता। उन्हें हिटलर की हत्यारी और मानवता-विरोधी राजनीति से रत्ती भर भी परहेज नहीं है। वे हिटलर की तरह ही अपने मन से यह मानते हैं कि भारत में सभी कमजोर तबकों का सफाया कर दिया जाना चाहिए , अल्पसंख्यकों को गुलाम बनाओ और करोड़ों लोगों के भी कत्ले आम से गुरेज न करो, क्योंकि उससे ‘आबादी भी कम होगी और सबल सवर्णों का बहुमत कायम होगा।’ इसी प्रकार का विचार पड़ौस में तालिबानियों का रहा है। ये सभी मूलत: मानवता के दुश्मन, अपराधी विचार है। हिटलर का जो हश्र हुआ, तालिबानियों को जिस प्रकार पहाड़ी गुफाओं के बिलों से निकाल कर मारा गया, इसे हम जानते हैं। और, हिटलर-मुसोलिनी हो या आज तालिबानी, इन्होंने अपने वहशीपन में अपने-अपने देशों को किस प्रकार पूरी तरह से तबाह और खंडहर में तब्दील करके छोड़ा, इसे भी हम जानते हैं। इसीलिये, हिटलर के इन अनुयायियों के शासन के आगे और बने रहने में कांग्रेस कार्यसमिति ने बिल्कुल सही भारत मात्र के ( Idea of India) के अस्तित्व पर खतरे को पहचाना है।

राहुल का लोक सभा में भाषण

इसी 20 जुलाई को लोक सभा में मोदी पार्टी की सरकार के खिलाफ उसके कथित एनडीए के ही एक घटक तेलुगु देशम पार्टी के अविश्वास प्रस्ताव पर बहस में भी 2019 के सारे मुद्दे सामने आगये थे। बहस में राहुल गांधी ने अपने आवेगपूर्ण भाषण के प्रारंभ में ही यह सवाल उठाया कि क्या मोदी सरकार की किसी भी बात का कोई मूल्य रह गया है ? मोदी ने किनके इशारों पर नोटबंदी का पागलपन किया ? क्यों जीएसटी देश के सामान्य व्यापारियों के जी का जंजाल बन गया ?

राहुल ने साफ कहा कि भारत का हर आदमी जानता है, मोदी किनके हित में काम कर रहे हैं। सबने उन कंपनियों के विज्ञापन देखे हैं, जिन्होने नोटबंदी के बाद मोदी का स्वागत किया था। अंबानी के जियो के विज्ञापन में मोदी का गुणगान होता है। उन्होंने रफाल लड़ाकू विमान की खरीद में अनिल इंबानी को सीधे पैंतालीस हजार करोड़ का लाभ पहुंचाने का आरोप लगाते हुए रक्षा मंत्री निर्मला सीथारमण को सदन में और बाहर भी लगातार झूठ बोलने के लिये बींधा। फ्रांस के राष्ट्रपति ने उनसे कहा था कि इन विमानों की खरीद की कीमत को छिपा कर रखने का भारत से गोपनीयता का कोई समझौता नहीं हुआ है,फिर भी मोदी के दबाव में वे ‘गोपनीयता’ की झूठी बातें करती है।

राहुल गांधी ने अमित शाह के पुत्र का जब नाम लिया, तो सारे भाजपाई जिस प्रकार भड़के उससे तो लगा कि आगे संसद में माल्या, नीरव मोदी जैसों का भी नामोच्चार भी निषिद्ध हो जायेगा। राहुल ने कहा - प्रधानमंत्री चौकीदार नहीं है, भागीदार है। इन्होंने भारत के सबसे बड़े पूंजीपतियों का अढ़ाई लाख करोड़ रुपया माफ किया, लेकिन किसान का मामूली कर्ज भी माफ नहीं करेंगे। सारा भारत अब जानता है। आज इनके चेहरे पर घबड़ाहट है। ये मेरे से नजर से नजर नहीं मिला सकते हैं। राहुल ने पहले कहा था कि मेरे भाषण का वे पंद्रह मिनट भी सामना नहीं कर पायेंगे। 20 जुलाई को वास्तव में भी वही हुआ। स्पीकर सुमित्रा महाजन उनके भाषण और उसकी भाषा में काट-छांट की कोशिश की। वह चाहती थी कि राहुल अपने भाषण के प्रवाह को रोक कर बीच बीच में दूसरों को बोलने दें। पूरा शासक पक्ष आपे के बाहर हो गया था। एक बार तो उनके भाषण के बीच में ही सदन को स्थगित कर दिया गया।

राहुल ने ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका के हवाले से भारत में महिलाओं की दुर्दशा का सवाल उठाया और लिंचिंग की तरह के जघन्य कृत्यों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी को उनके प्रति मौन स्वीकृति कहा।

राहुल ने जो सबसे बड़ी बात कही वह यह थी कि भारत का प्रधानमंत्री और बीजेपी अध्यक्ष अमित साह हम सबसे दूसरी धातु के लोग हैं। ये सत्ता के बिना जी नहीं सकते। ये जानते है कि जिस दिन ये सत्ता खो देंगे, इनके खिलाफ ढेर सारी कार्रवाइयां शुरू हो जायेगी।

राहुल के जवाब में इस दिन मोदी खिसिसानी बिल्ली नजर आ रहे थे। राहुल अपने भाषण के अंत में मोदी की नफरत की राजनीति का एक प्रति-आख्यान रचते हुए मोदी से गले मिले थे। मोदी ने राहुल के उस आलींगन के प्रति खीझ उतारने में ही डेढ़ घंटा समय गंवा दिया। सारे अखबारों ने नोट किया कि मोदी क्या बोले, यह तो किसी को समझ में नहीं आया, वे राहुल की झप्पी के असर से मुक्ति में ही डूबे रह गये।

बहरहाल, 20 जुलाई के बाद से ही 2019 की लड़ाई का बिगुल बज गया है। कांग्रेस कार्य समिति ने सभी विपक्षी दलों के सामने इसकी दिशा बांध दी है। सीपीएम सहित बाकी दल भी जल्द ही 2019 के बरक्श अपनी रणनीति को तय करने के लिये जल्द ही बैठकें करेंगे। तेलुगु देशम, शिव सेना और टीएमसी जैसे दलों ने भी मोदी के खिलाफ जनता की गोलबंदी का आह्वान करना शुरू कर दिया है।

कौन कहां खड़ा होगा, तय करो !

अब क्रमश: सब यह समझने लगे हैं कि 2019 के चुनाव में मोदी-आरएसएस के फासीवाद को परास्त करने के परिप्रेक्ष्य को भूल कर कोई भी चुनावी रणनीति बेकार है। जो भी पार्टी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मोदी-आरएसएस की मदद करेगी, वह वास्तव में अपनी आत्म-हत्या का नोट लिखेगी। मोदी का सत्ता पर लौटना जनतंत्र का अंत और सत्ता में भागीदारी के अन्य सभी दावेदारों का भी अंत होगा। इसके अलावा 2019 के चुनाव में भारत का जो भी पत्रकार और मीडिया ऐंकर मोदी पार्टी का समर्थन करेगा, वह भारत के हिटलर के नाम अपनी ताउम्र ग़ुलामी का पट्टा लिख रहा होगा।

फासीवाद को परास्त करने से ही समाज में समानता, न्याय, स्वतंत्रता, भाईचारे और समाजवाद के लिये भी संघर्ष का रास्ता प्रशस्त होगा। इसीलिये हमने इस टिप्पणी के शीर्षक में सोवियत संघ की लाल सेना के प्रसिद्ध ‘The march of artillerymen’ (तोपचियों का कूच) गीत के शब्दों को उधार लिया है :

“Artillerymen, the fatherland calls us.

From the thousands of batteries,

for the tears of our mothers,

for our motherland — fire! Fire!”

संबंधित समाचार :