गांधीवाद की राह चलें राहुल : राजनीति की बेईमानी को केवल गांधीवाद के तरीकों से ही रोका जा सकता

येदियुरप्पा ने 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की भविष्यवाणी कर दी थी। यह तो पता नहीं कि बी एस येदियुरप्पा ज्योतिष शास्त्र के जानकार हैं या नहीं, लेकिन वे भाजपा की राजनीति को जानते हैं...

देशबन्धु

इवेंट मैनेजमेंट वाली शादी की जगह कोर्ट मैरिज जैसा नजारा

कर्नाटक में आखिरकार भाजपा की सरकार बन ही गई और अपने ऐलान के मुताबिक येदियुरप्पा ने 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ही ली। उन्होंने मतदान के वक्त ही इस बात की भविष्यवाणी कर दी थी। यह तो पता नहीं कि बी एस येदियुरप्पा ज्योतिष शास्त्र के जानकार हैं या नहीं, लेकिन वे भाजपा की राजनीति, रणनीति और विचारधारा को तो अच्छे से जानते हैं। उन्हें मालूम है कि गोवा, मणिपुर, बिहार, जम्मू-कश्मीर इन तमाम राज्यों में भाजपा ने कैसे सरकार बनाई है। इसलिए चुनावी नतीजे आने के पहले ही उन्होंने भाजपा की सरकार बनने और अपने मुख्यमंत्री होने का ऐलान कर दिया। हालांकि उनकी गणना में कहीं कोई चूक हुई होगी, इसलिए दिल्ली आकर प्रधानमंत्री से मिलने वाली उनकी बात सही साबित नहीं हुई।

येदियुरप्पा ने तीसरी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। अब तक भाजपा जहां भी सरकार बनाती आई, शपथग्रहण समारोह धूमधाम से होता रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह समेत, कई राज्यों के मुख्यमंत्री और कद्दावर नेता खर्चीले शपथग्रहण समारोहों में चार चांद लगाते रहे हैं। लेकिन कर्नाटक में ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ, उसके कारण स्पष्ट हैं। अगर भाजपा स्पष्ट बहुमत लाती तो येदियुरप्पा को ठाठ से मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाती। शक्ति और अहंकार का ऐसा प्रदर्शन किया जाता, कि लोग कम से कम 2019 तक उसे याद रखते। लेकिन गुरुवार सुबह तो इवेंट मैनेजमेंट वाली शादी की जगह कोर्ट मैरिज जैसा नजारा देखने मिला।

येदियुरप्पा ने ईश्वर और किसानों के नाम की शपथ ली। पद संभालते ही किसानों के लिए एक लाख रुपए तक की कर्ज माफी का ऐलान किया और लगे हाथ यह भी कह दिया कि वे 15 दिनों के पहले ही बहुमत साबित कर देंगे और कैबिनेट का विस्तार कार्यक्रम धूमधाम से कराया जाएगा। यानी पिक्चर अभी बाकी है।

अमित शाह जैसे रणनीतिकारों के कारण येदियुरप्पा का आत्मविश्वास

येदियुरप्पा का यह आत्मविश्वास अमित शाह जैसे रणनीतिकारों के कारण है, जिन्हें मालूम है कि सत्ता कैसे हासिल की जाती है और न मिले तो कैसे छीनी जाती है। कांग्रेस ने जदएस के साथ पहले गठबंधन न करने की सजा कम सीटें हासिल कर भुगत ली। लेकिन परिणाम घोषित होने से पहले ही जब कांग्रेस और जदएस एक-दूसरे के साथ आ गए, और उनकी सीटें बहुमत के आंकड़े से ज्यादा थीं, तो राज्यपाल वजुभाई वाला को उन्हें ही सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भाजपा बहुमत के बिना ही सरकार बनाने का दावा पेश कर चली और उसे मंजूर कर लिया गया।

भाजपा के मुंह से अच्छी नहीं लगतीं नैतिक-अनैतिक की ये बातें

अब येदियुप्पा कह रहे हैं कि कांग्रेस-जदएस का गठबंधन अनैतिक है। लेकिन नैतिक-अनैतिक की ये बातें कम से कम भाजपा के मुंह से अच्छी नहीं लगतीं। उसे शायद इससे कोई सरोकार भी नहीं है। और अब तो वह इसका दिखावा भी नहीं करती है। 8 विधायक कम ही सही, पर भाजपा सरकार बना लेती है और बहुमत जुटाने का दावा भी करती है। जाहिर है किसी विधायक का हृदय परिवर्तन तो रातों-रात होगा नहीं, लेकिन धन बल से उसे भी संभव कर लिया जाएगा। लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाते हुए जिस तरह पद और पैसे का लालच देकर विधायकों को खरीदा जाता है, वह शर्मनाक है। अगर सचमुच का राष्ट्रप्रेम होता, तो इस शर्मिंदगी को दूर करने की कोशिश होती। अगर सचमुच का फकीराना मिजाज़ होता तो बेईमानी से मिली सत्ता को ठुकराया जाता। अगर सचमुच संविधान के लिए सम्मान होता तो उसकी परंपराओं का पालन किया जाता। लेकिन ऐसी कोई मिसाल भाजपा के कर्णधारों ने पिछले चार साल में पेश नहीं की। उल्टे बेईमानी के नए रिकार्ड जरूर कायम कर लिए। कर्नाटक में ऐसा ही एक रिकार्ड बना है।

कांग्रेस इस बेईमानी का विरोध कर रही है। वह सुप्रीम कोर्ट तक भी गई। और दूसरी बार आधी रात को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए दरवाजे खोले। इससे पहले याकूब मेमन की फांसी मामले में ऐसे ही आधी रात को सुनवाई हुई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट जाने के बावजूद कांग्रेस भाजपा को सरकार गठन से नहीं रोक सकी। येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय मिला है, लेकिन शुक्रवार सुबह समर्थक विधायकों की सूची सर्वोच्च अदालत में देनी है।

सत्ता की बिसात पर भाजपा अब कौन सा दांव चलती है, यह बाद में पता चलेगा। फिलहाल राहुल गांधी के लिए यह निर्णायक वक्त है। उन्हें अगर लगता है कि भाजपा संविधान की हत्या कर रही है, तो वे केवल सोशल मीडिया पर इसका विरोध न करें, बल्कि गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन, अनशन जैसे तरीकों को अपनाएं। राजनीति की बेईमानी को केवल गांधीवाद के तरीकों से ही रोका जा सकता है।

देशबन्धु का संपादकीय

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