राहुल गांधी के वार से अभी तक उबर नहीं पाए हैं मोदी

राहुल गांधी की परिपक्वता और उसकी सीमाएं... विपक्ष की आलोचना में मोदी कागज ही देखते रहे

राजेंद्र शर्मा
Updated on : 2018-07-30 21:17:30

राहुल गांधी के वार से अभी तक उबर नहीं पाए हैं मोदी

राहुल गांधी की परिपक्वता और उसकी सीमाएं

0 राजेंद्र शर्मा

संसद के शीतकालीन सत्र की शुरूआत भले ही विपक्ष के लाए अविश्वास प्रस्ताव के गिर जाने से हुई हो, इसने आने वाले आम चुनाव की मुख्य कतारबंदियों को काफी हद तक साफ कर दिया है। इसके बाद अगर मोदी सरकार लोकसभा में अपना तगड़ा बहुमत साबित होने के आधार पर बढ़त का दावा कर सकती है, तो उसके विरोधी भी उसके सामने कड़ी चुनौती पेश करने का तो दावा कर ही सकते हैं। आखिरकार, लोकसभा की मौजूदा संख्याओं के लिहाज से अगर मोदी सरकार का करीब दो सौ के अंतर से अपना बहुमत साबित करना एक सच है, तो यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सच है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट डालने वाली पार्टियों का कुल वोट, उसके खिलाफ मतदान करने वाली पार्टियों के कुल वोट से पूरे 6 फीसद ज्यादा था। अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट डालने वाली पार्टियों को 2014 में कुल 37 फीसद वोट मिले थे, जबकि अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट डालने वाली पार्टियों को उसी चुनाव में 43 फीसद वोट मिले थे।

राहुल गांधी के भाषण की चर्चा, मोदी के भाषण से ज्यादा ही हुई

फिर भी अविश्वास प्रस्ताव का एक यही हासिल नहीं है। अविश्वास प्रस्ताव का शायद इससे भी बड़ा हासिल यह है कि उसने यह दिखाया है कि विपक्ष, मोदी के नेतृत्व वाले सत्ता पक्ष का डटकर मुकाबला कर सकता है। और कांग्रेस अध्यक्ष, राहुल गांधी का एक असरदार तथा डटकर लड़ने में समर्थ विपक्षी नेता के रूप में खुद को स्थापित करना, इसका एक बड़ा हिस्सा है। यह कोई संयोग ही नहीं है कि अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के संबंध में, मीडिया में राहुल गांधी के भाषण की चर्चा, प्रधानमंत्री मोदी के भाषण से ज्यादा ही हुई है, कम नहीं। बेशक, अपने भाषण के आखिर में राहुल गांधी ने जिस तरह मुकाबला गुस्से तथा घृणा की राजनीति बनाम प्यार की राजनीति होने की अपनी प्रस्तुति के प्रत्यक्ष प्रमाण के तौर पर, मौजूदा की सरकार की तीखी आलोचना करने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी को गले से लगाया था, सबसे ज्यादा चर्चा उसी की हुई है। इसमें कुछ योगदान, संघ/ भाजपा के अपना पूरा जोर लगाकर, इस जैश्चर के अर्थ को झुठलाने की कोशिश करने का भी रहा है, जो एक तरीके से राहुल गांधी की नफरत बनाम प्रेम की राजनीति की प्रस्तुति से उनके डर को ही दिखाता है।

विपक्ष की आलोचना में मोदी कागज ही देखते रहे

लेकिन, इस बहस में राहुल गांधी के भाषण में सिर्फ इस ‘झप्पी’ ने ही प्रधानमंत्री को परेशान नहीं किया था। इसी प्रकार, इस बहस में राहुल गांधी ने सिर्फ यही साबित नहीं किया था कि वह बिना कागजों की मदद के, एक लंबा तथा प्रभावशाली भाषण दे सकते हैं, जबकि भाषण-विख्यात प्रधानमंत्री ही विपक्ष की आलोचनाओं के अपने जवाब में ज्यादा समय कागजों का ही सहारा लेते नजर आए थे। इस सबसे बढ़कर, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के शीर्ष नेता की हैसियत से राहुल गांधी ने जिस तरह अल्पसंख्यकों तथा अन्य कमजोर तबकों के बढ़ते उत्पीडऩ व बेरोजगारी से लेकर किसानों की दुर्दशा तक, जनता के विभिन्न तबकों के मुद्दों पर और काला धन वापस लाने से लेकर, भ्रष्टाचार मिटाने तक के वादे पूरे करने में मोदी सरकार की घोर विफलता पर तीखी प्रहार किए थे, वह एक लड़ने की इच्छा रखने वाले तथा लड़ने में समर्थ नेता के रूप में, राहुल गांधी के परिपक्व होने को भी दिखा रहा था। खासतौर पर राफाल लड़ाकू विमान सौदा घोटाले पर राहुल के लड़ाकू तेवर, उनके विपक्ष का स्वाभाविक नेता बनने का सबूत दे रहे थे। अविश्वास प्रस्ताव के बाद भी इस मुद्दे पर मोदी सरकार पर दबाव बनाए रखकर राहुल गांधी, संख्या से बढक़र, नैतिक रूप से विपक्ष का नेतृत्व हासिल करने में कामयाब होते लगते हैं। यह इससे पूरे राजनीतिक वातावरण में आते बदलाव का ही सबूत है कि मीडिया के कम से कम एक हिस्से ने राफाल प्रकरण को मोदी सरकार का ‘बोफोर्स क्षण’ भी कहना शुरू कर दिया है।

बेशक, एक विपक्षी नेता के रूप में राहुल गांधी में यह अनोखा धारदार लड़ाकूपन अचानक कोई अविश्वास प्रस्ताव भाषण में ही नहीं आ गया है। वास्तव में इसकी शुरूआत गुजरात के विधानसभाई चुनाव से ही हो गयी थी, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी की भाजपा का सीधे और डटकर मुकाबला करते नजर आए थे। इसका असर गुजरात में चुनाव के नतीजों में भी दिखाई दिया था, जहां भाजपा को जैसे-तैसे जिताने में भी नरेंद्र मोदी के पसीने निकल गए थे। उसके बाद, कर्नाटक के चुनाव अभियान से होते हुए, यह लड़ाकूपन अपनी मौजूदा मंजिल पर पहुंचा है। कहने की जरूरत नहीं है कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता के ऐसे लड़ाकूपन की आमतौर पर विपक्ष को तो जरूरत थी ही, कांग्रेस पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं के लिए तो यह जैसे प्राण वायु है। ऐसा लगता है कि इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं के इस विश्वास को बहुत बल मिला है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के चंद महीनों में होने जा रहे चुनाव में, जहां भाजपा सत्ता में है और उसके मुकाबले में मुख्य विपक्षी ताकत कांग्रेस ही है, भाजपा को हराया जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर लोकसभा के चुनाव ही पहले नहीं करा दिए गए तो, इन तीन राज्यों के विधानसभाई चुनाव के नतीजों का, आम चुनाव के वातावरण पर काफी असर पड़ने जा रहा है।

अविश्वास प्रस्ताव के फौरन बाद, राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की कार्य-समिति ने खासतौर पर आने वाले आम चुनाव की कार्य नीति के संबंध में जो संकेत दिए हैं, उनके निहितार्थ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। ऐसा लगता है कि कांग्रेस अध्यक्ष के आक्रामक तेवरों के साथ विशेष रूप से अपने कार्यकर्ताओं के बीच चुनाव में वास्तविक मुकाबले का भरोसा जगाने से आगे, कांग्रेस भाजपा-विरोधी पार्टियों का भरोसा जीतने के लिए भी सचेत रूप से प्रयास कर रही है। इसका एक स्पष्ट संकेत तो अगले कुछ ही महीनों में होने जा रहे तीन भाजपा-शासित राज्यों के विधानसभाई चुनाव के लिए बसपा समेत कुछ अन्य विपक्षी पार्टियों के साथ कांग्रेस का तालेमल के लिए गंभीरता से बात कर रहा होना ही है। लेकिन, यह प्रयास इन तीन राज्यों तक ही सीमित नहीं है। वास्तव में इसी बीच कांग्रेस के नेतृत्व ने, खासतौर पर वैकल्पिक सरकार के नेतृत्व के संदर्भ में, आगामी चुनाव में विपक्षी कतारबंदी के नेतृत्व के मुद्दे पर अपने पहले के इस रुख से आगे बढ़ते हुए कि अगर कांग्रेस अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आती है, तो राहुल गांधी सरकार का नेतृत्व करेंगे, यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस गठबंधन सरकार में किसी और पार्टी का प्रधानमंत्रित्व भी स्वीकार कर सकती है। इसने भाजपाविरोधी विपक्षी चुनावी कतारबंदी के लिए नयी संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं या कह सकते हैं कि कुछ संभावनाओं के द्वारों को बंद होने से रोका है। यह रास्ता खोलना, जिसके पीछे कांग्रेस कार्यसमिति का यह यथार्थवादी आकलन है कि विपक्षी कतारों में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद, कांग्रेस अगले चुनाव में डेढ़ सौ से बहुत ऊपर सीटों की उम्मीद नहीं कर सकती है, राहुल गांधी के नेतृत्व के परिपक्व तथा यथार्थवादी होने का ही सबूत है।

फिर भी, अगले आम चुनाव में मोदी राज को गंभीर चुनौती मिलना सुनिश्चित करने के लिए, यह सब जरूरी तो है, पर काफी नहीं। इस सब के अलावा कांग्रेस को आम जनता, खासतौर पर किसानों, मजदूरों तथा अन्य मेहनतकशों के महत्वपूर्ण हितों की रक्षा करने वाली वैकल्पिक नीतियां भी पेश करनी होंगी। तभी मोदी निजाम से आम जनता की बढ़ती नाराजगी को वह सकारात्मक रूप से एक विकल्प के पक्ष में मोड़ पाएगी। इसके लिए, पिछली यूपीए सरकार की तरह, ‘सलाहकार परिषद’ जैसे किसी माध्यम से, अपनायी जा रही नीतियों की जनविरोधी अतियों पर कुछ अंकुश लगाने की कोशिश करना काफी नहीं होगा। इसके लिए तो यूपीए की नीतियों के भी विकल्प खोजने होंगे। यही मोदी राज की शिकस्त की गारंटी करेगा। दुर्भाग्य से राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अब तक तो इस पहलू से परिपक्वता के कोई संकेत नहीं दिए हैं। विपक्ष को उसकी यह कमजोरी अंतत: काफी महंगी भी पड़ सकती है। 0

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