सच तो कहा राहुल ने, अख्वानुल मुसलमीन और आरएसएस मे कोई अंतर नहीं

दोनों ही political religion पर विश्वास करती हैं वह "हुकूमत इलाहिया" कायम करना चाहती यह "हिन्दू राष्ट्र" बनाने की बात करतींI...

अतिथि लेखक

सच तो कहा राहुल ने, अख्वानुल मुसलमीन और आरएसएस मे कोई अंतर नहीं

उबैद उल्लाह नासिर

विचारधारा के हिसाब से देखा जाए तो अख्वानुल मुसलमीन और आरएसएस मे कोई अंतर नहीं दोनों धर्म को सत्ता से जोडती हैं। दोनों पुराने दौर में जीने (Revivalism) की बात करती हैं। दोनों ही political religion पर विश्वास करती हैं वह "हुकूमत इलाहिया" कायम करना चाहती यह "हिन्दू राष्ट्र" बनाने की बात करतींI

भारत में जमात इस्लामी उसी से प्रभावित संस्था रही है, इसी लिए इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में न केवल दोनों को ban किया था बल्कि दोनों के नेताओं को जेल भी भेजा था। जमात-ए-इस्लामी को लोकतंत्र पर विश्वास नहीं था उसके मेम्बर न केवल राजनीति में हिस्सा नहीं लेते थे बल्कि वोट भी नहीं देते थे। बहुत दिनों बाद जमात के सदस्यों को वोट देने की छूट मिली थीI

आरएसएस को भी भारत के लोकतंत्र और संविधान पर विश्वास नहीं, लेकिन उस ने दोहरा चरित्र अपनाया और लोकतंत्र की प्रक्रिया में शामिल हो कर सत्ता हथियाने और तब अपना मकसद पूरा करने की ट्रिक अपनाईI

Obaid Nasirमिस्र के तत्कालीन सेक्युलरवादी राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर ने अख्वान पर न केवल पाबंदी लगायी बल्कि उसके कई नेताओं को मरवा भी दिया और सैकड़ों को जेल भेजा। मिस्र समेत कई अरब देशों में वह आज भी एक प्रतिबंधित दल है।

भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की ह्त्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा था लेकिन पंडित नेहरु ने यह प्रतिबंध हटवाया। उनका कहना था कि प्रतिबंध लगाने से यह भूमिगत हो के अपना काम करेगी तब ज्यादा खतरनाक हो जायगी। जबकि सरदार पटेल प्रतिबंध हटाने के पक्ष में नहीं थे।

पंडित नेहरू कहते थे कि ऐसी विचारधारा से वैचारिक सतह पर लड़ कर उनकी विचारधारा को शिकस्त देनी चाहिए, ताकि अवाम उनकी असलियत समझ सके।

अपने जीवन में नेहरू अपने मिशन में कामयाब भी रहे। 1967 तक आरएसएस की जनता में कोई पैठ नहीं थे। इसके स्वयम् सेवक शर्मिंदा-शर्मिंदा, छुपे-छुपे गुपचुप तरीके से अपना काम करते रहते थे। जनता उन्हें मुंह नहीं लगाती थी। जमात और आरएसएस के लोगों को सरकारी नौकरी भी नहीं मिलती थी। यह लोग अपनी असलियत छुपाये रहते थेI

1967 में लोहिया की अंधी कांग्रेस दुश्मनी के कारण सभी विपक्षी दल एक प्लेटफोर्म पर आये। उस में जनसंघ, जो आरएसएस का पोलिटिकल विंग है, वह भी विपक्ष की इस एकता में शामिल हो गया। सब ने मिल कर संयुक्त विधायक दल (SVD) का गठन किया और हरियाणा उत्तर प्रदेश व बिहार में इसकी सरकार बनी और तो और बिना आगा पीछा सोचे डॉ अब्दुल जलील फरीदी की मुस्लिम मजलिस भी इसका हिस्सा बन गयी थीI

तो अगर राहुल गाँधी ने आरएसएस और अख्वानुल मुसलमीन, जिसका भारतीय संस्करण जमात-ए--इस्लामी है, को एक पल्ले में रखा तो क्या गलत किया? उन्होंने ऐतिहासिक सच्चाई जनता के सामने रखी हैI

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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