'बूसी बुसिया' को राहुल गांधी की चुनौती

राणा अयूब की किताब 'गुजरात फाइल्स' में नामज़द मोदी-शाह कंपनी के तमाम अपराधी और कुत्सित चेहरों का एक ठोस प्रत्युत्तर होगा राहुल गांधी का सौम्य, संयमित, संजीदा और भले आदमी का तार्किक चेहरा।...

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हाइलाइट्स

विकल्प ताल ठोंक कर मैदान में उतर गया है। राहुल अब सीधे मोदी के बरक्स एक चुनौती होंगे। उनकी कमज़ोरी या शक्ति पर कोई कितनी भी चर्चा क्यों न करें, कोई यह सवाल नहीं कर सकेगा कि सामने कौन है ? उल्टे, हमारी दृष्टि में तो मोदी की तमाम झूठी नौटंकियों का एक संजीदा जवाब साबित होंगे राहुल गांधी।

मोदी की तेज़ी से बिगड़ती सूरत की स्थिति में राहुल उज्जवल संभावनाओं से भरे भावी प्रधानमंत्री के रूप में उभरेंगे

राहुल गांधी के बर्कले की कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में दिये गये वक्तव्य का ऐतिहासिक तात्पर्य

-अरुण माहेश्वरी

राहुल गांधी का बर्कले में साफ शब्दों में यह कहना कि वे प्रधानमंत्री पद की ज़िम्मेदारी संभालने के लिये तैयार हैं। आज की राजनीति में एक ऐसा बयान है जो अब तक के सारे राजनीतिक समीकरणों को बदल देने वाली किसी घटना से कम हैसियत नहीं रखता है।

आज मोदी सरकार नोटबंदी, जीएसटी, किसानों के प्रति खुली दग़ाबाज़ी की वजह से जनता से पूरी तरह अलग-थलग हो चुकी है। फिर भी मोदी-शाह साँड़ की तरह सब विरोधियों को रौंदते हुए दिखाई देते हैं। आम लोग हताश भाव से इनकी सारी अनीतियों को देख रहे हैं, लेकिन अंदर ही अंदर सुलगने के बावजूद विकल्पहीनता की एक घुटन से ख़ामोश है। आरएसएस-भाजपा के लोग भी 'मोदी नहीं तो कौन' का बाजा बजाते थकते नहीं हैं।

राहुल गांधी के पूरी दृढ़ता के साथ दिये गये इस छोटे से बयान ने एक झटके में जैसे सारे दृष्यपट को बदल दिया है

जो अब तक प्रच्छन्न था, हवा में झूल रहा था, उसे इस बयान ने एक ठोस सूरत दे दी है ; राजनीति में जो शून्य दिखाई देता था, उसे एक प्रकार से फूँक मार कर हवा में उड़ा दिया है। अब देश के कोने-कोने में वर्तमान कुशासन, बदहाली और भाजपा के सभी स्तर के नेताओं के तमाम प्रकार के भ्रष्टाचार से बुरी तरह असंतुष्ट आम लोगों के बीच राहुल गांधी सिर्फ कांग्रेस दल के एक नेता के रूप में नहीं, देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखे जायेंगे।

अब कोई यह सवाल नहीं करेगा मोदी का विकल्प क्या है ?

विकल्प ताल ठोंक कर मैदान में उतर गया है। राहुल अब सीधे मोदी के बरक्स एक चुनौती होंगे। उनकी कमज़ोरी या शक्ति पर कोई कितनी भी चर्चा क्यों न करें, कोई यह सवाल नहीं कर सकेगा कि सामने कौन है ? उल्टे, हमारी दृष्टि में तो मोदी की तमाम झूठी नौटंकियों का एक संजीदा जवाब साबित होंगे राहुल गांधी।

राणा अयूब की किताब 'गुजरात फाइल्स' में नामज़द मोदी-शाह कंपनी के तमाम अपराधी और कुत्सित चेहरों का एक ठोस प्रत्युत्तर होगा राहुल गांधी का सौम्य, संयमित, संजीदा और भले आदमी का तार्किक चेहरा। दिन प्रति दिन, तमाम मोर्चों पर विफलताओं से, विपक्ष के खिलाफ सीबीआई के नग्न षड़यंत्रों की प्रतिहिंसक कार्रवाइयों से काला पड़ता नरेंद्र मोदी का चेहरा राहुल गांधी के युवा और ताज़ा चेहरे की तुलना में अब से और ज्यादा विकृत दिखाई देने लगेगा।

कहने का तात्पर्य यह है कि अब मोदी की सारी झूठी बातों और अर्थ-व्यवस्था के बारे में आँकड़ों तक को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की गौरी लंकेश की भाषा में 'बूसी बुसिया' वाली, हमेशा सिर्फ झूठ ही बोलने की सूरत को राहुल गांधी की चुनौती को एक बदनाम प्रधानमंत्री को भावी युवा प्रधानमंत्री की चुनौती माना जायेगा।

यही वजह है कि अब राहुल गांधी को हल्के में लेना, स्मृति इरानी की तरह की बड़बोली और अराजनीतिक नेता से उनका कोरा तिरस्कार करवाना, रविशंकर प्रसाद की तरह के अहंकारी नेता का उन पर फुफकारना  और अपने को अव्वल दर्जे का जोकर साबित कर चुके संबित पात्रा की तरह के ट्रौलनुमा प्रवक्ता से उन पर छींटाकशी करवाना भाजपा के लिये भारी पड़ने लगेगा, उसके राजनीतिक दिवालियेपन को ही सबके सामने बेपर्द करने का सबब बनेगा। ऐसी सारी पैंतरेबाजियां राहुल गांधी की इस नई राजनीतिक चुनौती का मुक़ाबला करने में भाजपा और भी अक्षम ही बनायेगी।

देश की राजनीतिक हवा वैसे भी मोदी-विरोधी हो चुकी है। मोदी इतनी जल्दी भारत की राजनीति की सारी बुराइयों के प्रतीक बन कर सामने आयेंगे, इसे बहुत कम लोगों ने ही पहले सोचा होगा। आज उनकी सरकार भारत के किसानों, मज़दूरों और छोटे दुकानदारों की दुश्मन नंबर एक सरकार का रूप ले चुकी है। ऐसे में आगे राहुल गांधी के एक दृढ़-प्रतिज्ञा नेता की तरह  इसके सींग को पकड़ कर हर रोज पटकनी देने वाले रोज नये दृश्य देखने को मिलेंगे; टेलिविजन के तमाम बिकाऊ चैनल सोशल मीडिया में सत्य को उजागर करने वाली रिपोर्टों और टिप्पणियों के सामने निरर्थक होते चले जायेंगे ; और हम यह साफ देख पा रहे हैं कि हवा से फुला कर तैयार किया गया मोदी का पुतला राहुल के सामने तेज़ी के साथ एक महाबली से सीकिया पहलवान में बदलता दिखाई देने लगेगा। भारतीय राजनीति की लंका के दशानन के अहंकार और उसकी मौत के दृश्य को देखने की भारत के लोगों के दिलों में पैदा हो चुकी अतिन्द्रिय आतुरता के क्रमश: उनके अंतर के गहरे विश्वास का रूप लेते हुए एक एंद्रिक ऐतिहासिक यथार्थ में बदलने के संयोग बिंदु को भी हम प्रत्यक्ष कर पा रहे हैं।

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में राहुल गांधी का यह एलान अभी के गोबर-गोमूत्र और लव-जिहाद की तरह के बेहूदा विषयों से गंधाते निराशाजनक राजनीति के काल में एक ताज़ी हवा के झोंके की तरह दिखाई देता है। हम इसके लक्षणों को जिस प्रकार तेज़ी के साथ एक ठोस सच्चाई का रूप लेते हुए देख पा रहे हैं, राजनीति के क्षेत्र के बहुतेरे चतुर सुजान इतनी स्पष्टता से इन बातों को अभी से कहना उचित नहीं मानेंगे। खास तौर पर राजनीतिक दलों के नेताओं के लिये तो उनके दलीय स्वार्थों का भी एक महत्वपूर्ण मसला होता है जो उनके स्वार्थ को विवेकशील और संतुलित आकलन के पर्याय के रूप में पेश करने की उनकी मजबूरी बनेगा। इसमें राजनीतिक सौदेबाज़ी के तत्व की प्रमुख भूमिका होती है। लेकिन ऐसे स्वार्थपूर्ण बंधनों से मुक्त कोई भी स्वतंत्र राजनीतिक टिप्पणीकार भारत की भावी राजनीति में राहुल गांधी के इस बर्कले भाषण के दूरगामी और संभावनापूर्ण राजनीतिक निहितार्थों को देखने से नहीं चूक सकता है।

यह भारत की राजनीति में विपक्ष के शून्य के अंत का प्रारंभ है।

मोदी के प्रवक्ताओं की दुत्कारों और मोदी-शाह की साजिशाना हरकतों से अब इसे खारिज नहीं किया जा सकेगा। मोदी अब भी, विपक्ष की 'सफ़ाये ' के षड़यंत्रकारी कार्यक्रमों को पूरी तरह से तज कर सकारात्मक जन-कल्याणकारी योजनाओं पर ठोस रूप में काम करते हुए, कोरी बातों का वीर की अपनी छवि से मुक्त नहीं होते हैं, तो मान कर चलिये, अब उन्हें महा-पतन की अतल खाई में गिरने से शायद ही कोई बचा पायेगा। पतन की इस खाई में गिर कर अब इनका सँभल कर खड़ा होना प्राय: असंभव होगा। राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिये उतरने की घोषणा का यह सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तात्पर्य है।

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