बता दो मोदीजी को विकल्प गर्भ में स्थापित हो चुका है, होगा एक-एक पाई का हिसाब

जो लोग संघियों के खुद को सांत्वना देने वाले इस प्रचार को अक्सर दोहराते रहते हैं कि 2019 में उनका कोई विकल्प कहां है, यह टिप्पणी उन मासूम जनों के लिये है :...

-अरुण माहेश्वरी

जो लोग संघियों के खुद को सांत्वना देने वाले इस प्रचार को अक्सर दोहराते रहते हैं कि 2019 में उनका कोई विकल्प कहां है, यह टिप्पणी उन मासूम जनों के लिये है :

1. कोई भी नई चीज तभी नजर आती है जब वह ठोस रूप में सामने आ चुकी होती है। उसके पहले तक हर चीज हवा में होती है — अदृश्य, गर्भ में रूप ग्रहण करती हुई। काल के निश्चित संयोग पर ही वह पूर्ण आकार ग्रहण करके सामने आती है। जब तक 2019 के चुनाव नहीं हो जाते, तब तक उन अधिकांश लोगों को, जो दृश्य की सीमा के परे देख पाने में असमर्थ हैं, वह नजर नहीं आयेगा।

2. गर्भ से निकल कर बाहर आने के पहले, प्रचार तंत्र की झूठी स्कैन रिपोर्टों के प्रभाव से मुक्त हो कर, स्वतंत्र रूप से इस अदृश्य को खुद देख पाने के लिये जरूरी है कि आपमें लक्षणों को पढ़ने की कूव्वत हो। इसके लिये इतिहास के बनते हुए ठोस क्रम पर नजर डालने की जरूरत है।

3. अब तक यह साफ है कि 2019 के चुनाव में मोदी के खिलाफ विपक्ष के दलों की अधिकतम एकता कायम होने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। विपक्ष की सभी राजनीतिक पार्टियों में, यहां तक कि शिव सेना और तेलुगु देशम की तरह की एनडीए के अंदर की पार्टियों में भी मोदी-विरोधी मोर्चे में शामिल होने की समझदारी कायम हो चुकी है। वामपंथी भी अब अपनी दुविधाओं से मुक्त हो गये हैं। और विपक्ष की एकता का अर्थ क्या है इसे यह अकेला तथ्य ही बता देने के लिये काफी है कि 2014 में भाजपा को सिर्फ 31 प्रतिशत मत मिले थे, और अन्य दलों को 69 प्रतिशत।

4. विपक्ष की एकता मात्र कितना बड़ा करिश्मा कर सकती है इसे पिछले दिनों यूपी के गोरखपुर और फूलपुर सहित अनेक उपचुनावों में देखा जा चुका है। जिस गुजरात विधान सभा में भाजपा को 2012 में राज्य की 182 सीटों में 115 सीटें मिली थी, वह 2017 में घट कर सिर्फ 99 रह गई, बहुमत से सिर्फ सात सीटें ज्यादा। इसके लिये उन्होंने पूरी केंद्र सरकार और अरबों-खरबों के संसाधनों को झोंक दिया था। अर्थात, मोदी के कार्यकाल में भाजपा के पास पूंजीपतियों से सबसे अधिक रुपये जरूर आए हैं, लेकिन जनता के बीच उनकी साख में लगातार गिरावट आई है। मोदी आज की राजनीति के सबसे बड़े उपहास के चरित्र हैं।

5. इसके अलावा राहुल गांधी को लगातार गालियां देते हुए उन्हें 'पप्पू' बताने के संघी प्रचार का भी एक असर है कि लोगों को विपक्ष के पास मोदी के स्तर के मूढ़ शासक का भी कोई विकल्प नहीं दिखाई देता है। हांलाकि गुजरात चुनाव के बाद से इस मामले में भी स्थिति थोड़ी बदली है। जो मोदी-शाह कांग्रेस-मुक्त भारत का शोर मचा रहे थे, उनके आका मोहन भागवत ने ही खुद को उस ढेंचूपन से अलग कर लिया है।

6. राहुल गांधी और कांग्रेस आने वाले दिनों में कैसे एक राष्ट्रीय विकल्प के केंद्रीय स्थान को ज्यादा से ज्यादा घेरते जायेंगे, इसे आगे आने वाले प्रमुख राजनीतिक घटना क्रमों से बड़ी आसानी से देखा जा सकता है। हम जब चुनावी विकल्प की बात कर रहे हैं तो राजनीतिक घटना-क्रम से हमारा तात्पर्य भी चुनावी घटना-क्रम ही होता है। अभी चंद रोज में कर्नाटक के चुनाव होने वाले हैं। उसके बाद 2019 के पहले मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ़ और राजस्थान के चुनाव होंगे। इन चारो चुनावों में मोदी को चुनौती देने वाली पार्टी अकेले कांग्रेस ही है। यदि इन सब में कांग्रेस विजयी होती है तो 2019 तक आते-आते वह स्थिति बन जायेगी, जब पूरी मोदी कंपनी को राहुल गांधी और कांग्रेस का भूत नींद में भी सताने लगेगा। और आज जो तमाम संघी 'विक्लपहीनता' की काल्पनिक छाया तले चैन से अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, तब उनके होश उड़ते देर नहीं लगेगी। लेकिन तब तक बाजी प्रायः उनके हाथ से निकल गई होगी !

7. इसीलिये, 'विकल्प नहीं है' की बातें संघियों के लिये चैन की जगहें भर हैं जिन्हें उनका दलाल मीडिया उनके लिये हर रोज तैयार किया करता है। मोदी कंपनी इस मौज में रहें और बचे हुए दिनों में कुछ और देशों की यात्रा कर आएं तो कोई हर्ज नहीं है। लेकिन इन पांच सालों में इन्होंने भारत के साधारण लोगों को जितना सताया है, उसका हिसाब लेने का समय बहुत दूर नहीं है। यह तय है कि उनके दिन लद गये हैं और समग्र परिस्थिति में उनके विकल्प का गर्भ पड़ चुका है, बस चुनाव के मुहुर्त पर उसे जन्म ले कर धरती पर उतरना बाकी है।

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