रवीन्द्रनाथ ने रामचंद्र गुहा की आंखें खोली फिर भी उनके लिये 'लेनिन' की फांस बनी रह गई

इतिहासकार महोदय को इतिहास के उन परिवर्तनकारी क्षणों को देखने-समझने की समझ हासिल करना बाकी है जब स्थापित व्यवस्थाओं के ताने-बाने को पूरी तीव्रता से चीर कर ही जीवन का नया सत्य अपने को स्थापित करता है...

रामचंद्र गुहा और लेनिन

-अरुण माहेश्वरी

'टेलिग्राफ' में रामचंद्र गुहा का एक लेख है — The price of Dogma (जड़सूत्र की कीमत) । इस लेख में त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति ढहाये जाने के संदर्भ में उन्होंने भारत के कम्युनिस्टों से पूछा है — लेनिन क्यों ? क्यों नहीं भगत सिंह या कोई अन्य भारतीय ? अपने इस सवाल को ही मथते हुए जब उन्होंने अपनी टिप्पणी का लगभग एक चौथाई हिस्सा खपा दिया, तब आखिर में रवीन्द्रनाथ ने उनकी आंखें खोली, और उनके जरिये वे जान पाये कि दुनिया के किसी भी कोने से ज्ञान की रोशनी क्यों न मिले, उसका आदर किया जाना चाहिए । (We should glory the illumination of lamp lit any where in the world.)

लेकिन फिर भी गुहा के लिये 'लेनिन' की फांस बनी रह गई । वह तो 'स्वेच्छचारी तानाशाह था, विरोधियों का दमन करता था, उनसे बिना किसी मुरव्वत के बहस करता था' आदि, आदि । उनका मूल अभियोग था कि लेनिन जनतांत्रिक नहीं थे, उनमें जनतंत्र के शील की कमी थी ।

हमें लगता है कि इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने शायद लेनिन के बारे में इनमें से एक भी बात नहीं कही होती यदि वे दुनिया में आज के कथित जनतंत्र और उसके शील की गंगोत्री मानी जाने वाली फ्रांसीसी क्रांति और उसके संदेश को सारी दुनिया में ले जाने वाले नेपोलियन बोनापार्ट के इतिहास को एक क्षण के लिये ही क्यों न हो, याद कर लिया होता ! अगर उन्होंने दया, परोपकार और संवेदनशीलता के प्रतीक माने जाने वाले ईसा मसीह के मत को दुनिया में फैलाने वाले सेंट पॉल्स और यूरोप के धर्म युद्धों के इतिहास पर, या अमन और सौहार्द्र के धर्म इस्लाम के साम्राज्य को कायम करने के मोहम्मद साहब के अभियानों, या भारत में शैवों और वैष्णवों तथा बौद्धों और ब्राह्मणों के बीच के संघर्षों की तीव्रताओं को याद रखा होता ! लेनिन ने दुनिया में मेहनतकशों के पहले राज्य की स्थापना की थी । लेनिन की भूमिका को समझने के पहले क्या जरूरी नहीं है इस क्रांति के महत्व को समझने की ?

इस पूरे मामले में हम सिर्फ यही कहेंगे कि हमारे इन इतिहासकार महोदय को अभी इतिहास के उन परिवर्तनकारी क्षणों को देखने-समझने की समझ हासिल करना बाकी है जब स्थापित व्यवस्थाओं के ताने-बाने को पूरी तीव्रता से चीर कर ही जीवन का नया सत्य अपने को स्थापित करता है । जनतंत्र हो या बाजार-आधारित अर्थ-व्यवस्था, या कोई और तंत्र — इनमें से कुछ भी पीपल के पेड़ के नीचे रात के अंधेरे की गहन शांति में जमीन से उग आये महादेव नहीं हैं, सुबह-सुबह जिनकी पूजा में शहर के सारे नर-नारी लाइन लगा कर पुष्पों और गंगा जल के साथ जुट जाते हैं । इतिहास बनाने में बड़ी ताकत और हिम्मत लगती है और लेनिन दुनिया के मजदूर वर्ग की उसी हिम्मत के सिद्धांतकार और नेतृत्वकारी व्यक्ति थे ।

अंत में हम इस बात के लिये जरूर गुहा के प्रति शुक्रगुजार होंगे कि उन्होंने संघी गुंडों की लेनिन की मूर्ति गिराने की हरकत पर उन्हें शाबासी नहीं दी, बल्कि उसकी निंदा ही की है ।

यहां हम रामचंद्र गुहा के लेख का लिंक दे रहे हैं —

https://www.telegraphindia.com/opinion/the-price-of-dogma-216170

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