स्वयंसेवक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता भारतीय संविधान और लोकतंत्र के बजाय मनुस्मृति व्यवस्था के प्रति होगी

यह राष्ट्र अब युद्धोन्मादी सैन्य राष्ट्र है। स्वयंसेवकों की हैसियत से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री इसके कर्णधार हैं। ऐसी परिस्थिति किसी भी तरह के आपातकाल से भयंकर हैं।...

हाइलाइट्स

स्वयंसेवक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता भारतीय संविधान और लोकतंत्र के बजाय मनुस्मृति व्यवस्था के प्रति होगी, जो बहसंख्य निनन्याब्वे फीसद जन गण के लिए मौत की घंटी होगी।

पलाश विश्वास

आपातकाल लागू करने में तत्कालीन राष्ट्रपति से जैसे आदेशनामा पर दस्तखत करवा लिया गया, उसके मद्देनजर देश में बनने वाले पहले केसरिया राष्ट्रपति की भूमिका भी खतरनाक साबित हो सकती है।

क्योंकि प्रधानमंत्री प्रधान स्वयं सेवक हैं तो राष्ट्रपति भी देश के प्रथम नागरिक के बजाय प्रथम स्वयंसेवक होंगें।

प्रधानमंत्री जिस तरह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एजंडे के मुताबिक हिंदुत्व का फासीवादी रंगभेदी मनुस्मृति राजकाज चला रहे हैं, जाहिर है कि राष्ट्रपति भी भारतीय नागरिकों का राष्ट्रपति होने के बजाये संघ परिवार का राष्ट्रपति होगा।

स्वयंसेवक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता भारतीय संविधान और लोकतंत्र के बजाय मनुस्मृति व्यवस्था के प्रति होगी, जो बहसंख्य निनन्याब्वे फीसद जन गण के लिए मौत की घंटी होगी।

यह राष्ट्र अब युद्धोन्मादी सैन्य राष्ट्र है। स्वयंसेवकों की हैसियत से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री इसके कर्णधार हैं। ऐसी परिस्थिति किसी भी तरह के आपातकाल से भयंकर हैं।

इस सिलसिले में शुभा शुभा का यह फेसबुक पोस्ट गौर तलब हैः

यह नाज़ुक समय है। हम भारतीय जनतंत्र के अन्तिम दौर में पैर रख रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव के साथ ही संविधान के विसर्जन की तैयारी है। इसका इतना उत्साह 'भक्तों'में है कि औपचारिक विसर्जन से पहले ही वे हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने निकल पड़े हैं। मध्यप्रदेश में रासुका लगाकर किसी ख़ून-ख़राबे की योजना हो सकती है ताकि किसान आन्दोलन को दफनाने का काम बिना बदनाम हुए हो सके। ईद पर और भी हत्या, ख़ून-ख़राबे की कोशिश हो सकती हैं। तनाव पैदा करने की कोशिश कई जगह हुई है। इस समय विवेक की असली परीक्षा है। हिन्दू राष्ट्रवादी हर कोशिश करेंगे कि लोग आपस में ही निपट लें, वे अपने हत्याकांड को लोगों से करवाना चाहेंगे। हमें हत्यारे गिरोहों को अलग करके देखा होगा। आपसी यक़ीन क़ायम रखते हुए मिली जुली निगरानी कमैटी और हैल्पलाईन तैयार करनी होंगी। आइसोलेशन से बचना होगा और सामाजिक समर्थन जुटाने के उपाय करने होंगे। अब बीच में कुछ है नहीं। नागरिकों को मिलकर आत्मरक्षा और उससे आगे के उपाय ख़ुद करने होंगे। हमें हिन्दू राष्ट्र के ख़िलाफ़ व्यापक मोर्चो की दिशा में बढ़ना होगा । यह सब मैं अपने लिए ही लिख रही हूं ताकि मेरे होश बने रहें और मैं लाचारी में नहीं जीना चाहती। आप भी अपनी बात कहें। आपसी यक़ीन और विवेक ही हमारा साथ देंगे। संकीर्ण आलोचना, आपसी छीछालेदर और वृथा भावुकता हमारी मुश्किल बढ़ाने वाली बातें हैं। अल्पसंख्यक, दलित, महिलाएं और तमाम प्रगतिशील ताकतें हिन्दू राष्ट्र के निशाने पर हैं।

यह पोस्ट मैंने झारखंड में सलमान की हत्या की ख़बर पढ़ने के बाद लिखी है।

 

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