महिमामंडन और चरित्रहनन के शिकार रवींद्रनाथ! फासीवादी राष्ट्रवाद के निशाने पर रवींद्र नाथ शुरू से हैं

पलाश विश्वास
हाइलाइट्स

गोदान की धनिया, सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका भारतीय स्त्री अस्मिता का यथार्थ!

देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है। सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है। नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है।

नोबेल पुरस्कार से पहले अछूत ब्रह्मसमाजी रवींद्र को बांग्ला भद्रलोक सवर्ण समाज कवि साहित्यकार मानने को तैयार नहीं था तो नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद उन्होंने रवींद्र को वैदिकी धर्म और बांग्ला ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद का प्रतीक बना डाला। अछूत रवींद्र की जगह जमींदार रवींद्रनाथ ने ले ली और भद्रलोक रवींद्र विमर्श में रवींद्र लंपट जमींदार के सिवाय कुछ नहीं है।

रवींद्र का दलित विमर्श-22

पलाश विश्वास

सवर्ण भद्रलोक विद्वतजनों ने नोबेल पुरस्कार पाने के बाद से लेकर अबतक रवींद्र के महिमामंडन के बहाने रवींद्र का लगातार चरित्र हनन किया है। रवींद्र साहित्य पर चर्चा अब रवींद्र के प्रेमसंंबंधों तक सीमाबद्ध हो गया है जैसे उनके लिखे साहित्य को वैदिकी धर्म के आध्यात्म और सत्तावर्ग के प्रेम रोमांस के नजरिये से ही देखने समझने का चलन है। कादंबरी देवी, विक्टोरिया ओकैम्पो से लेकर लेडी रानू मुखर्जी तक के साथ प्रेमसंबंधों के किस्सों पर लगातार लिखा जा रहा है।

दूसरी तरफ, बहुजनों, मुसलमानों, स्त्रियों, किसानों, मेहनतकशों और अछूतों के लिए उनकी रचनाधर्मिता में समानत और न्याय की गुहार या सत्ता वर्ग वर्ण के नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के खिलाफ उनके प्रतिरोध की चर्चा कहीं नहीं होती।

इसके विपरीत, भारत में स्त्री अस्मिता का सच प्रेमचंद के उपन्यास गोदान की धनिया, उन्हींकी कहानी सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका के सामाजिक यथार्थ हैं। सामाजिक विषमता, नस्ली वर्चस्व, पितृसत्ता, अन्याय, असमानता, बहिष्कार, अत्याचार उत्पीड़न की सामंती महाजनी मनुस्मृति व्यवस्था में धार्मिक सांस्कृतिक पाखंड के हिसाब से सवर्ण स्त्री देवी है लेकिन पितृसत्ता की मनुस्मृति के विधान के तहत स्त्री आज भी शूद्र दासी है।

धर्म कर्म समाज राष्ट्र राजनीति और अर्थव्यवस्था के हिसाब से स्त्री उपभोक्ता वस्तु है और उसकी मनुष्यता की कोई पहचान नहीं है।

शूद्र, अछूत और आदिवासी स्त्री का मौजूदा सामाजिक यथार्थ तो गोदान, सद्गति और चंडालिका से भी भयंकर है।

मुक्तबाजार में एक तरफ देवी की पूजा का उत्सव और बाजार है तो दूसरी तरफ घर और बाहर सर्वत्र देवी की देह का आखेट है और अछूत आदिवासी स्त्रियों पर अन्याय, अत्याचार और उत्पीड़न की बलात्कार सुनामी ही आज का नस्ली राष्ट्रवाद है, जिसपर कानून का कोई अंकुश नहीं है।  

चंडालिका इसी उत्पीड़ित स्त्री का विद्रोह है तो यही भारत में स्त्री अस्मिता का सच है लेकिन सवर्ण स्त्री विमर्श में चंडालिका, धनिया और झुरिया के लिए कोई जगह उसी तरह नहीं है जैसे साहित्य, संस्कृति और इतिहास में कृषि और किसानों, अछूतों और आदिवासियों के लिए कोई जगह नहीं है।

देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है। तो दूसरी तरफ सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है। नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है।

सत्ता वर्ण और वर्ग के लिए नोबेल पुरस्कार की वजह से रवींद्र नाथ को निगलना और उगलना हमेशा मुश्किल रहा है।  

आधुनिक बांग्ला साहित्य के महामंडलेश्वर सुनील गंगोपाध्याय का दावा है कि विश्वभर में इने गिने लोग रवींद्रनाथ का नाम जानते हैं और जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला तब पूर्व के बारे में पश्चिम को कुछ भी मालूम नहीं था और इसीलिए तब रवींद्र की इतनी चर्चा हुई। कुल मिलाकर मान्यता यही है कि रवींद्र के सामाजिक यथार्थ के दलित विमर्श का कोई वजूद नहीं है और वैदिकी धर्म और आध्यात्म के बारे में पश्चिम की अज्ञानता के कारण ही रवींद्र को नोबेल मिला। राष्ट्रवादियों के मुताबिक ब्रिटिश हुकूमत की दलाली करने की वजह से रवींद्र को नोबेल पुरस्कार मिला।

हाल में रवींद्र साहित्य के खिलाफ राष्ट्रवादियों के फतवे से बांग्ला राष्ट्रवाद को धक्का लगा है और बंगाल में इस फतवे के खिलाफ आवाजें भी उठने लगी है। जैसे एकबार खुशवंत के रवींद्र को पवित्र गाय कह देने पर बंगाली भावनाओं को भारी सदमा लगा था। लेकिन सच यह है कि नोबेल पुरस्कार से पहले अछूत ब्रह्मसमाजी रवींद्र को बांग्ला भद्रलोक सवर्ण समाज कवि साहित्यकार मानने को तैयार नहीं था तो नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद उन्होंने रवींद्र को वैदिकी धर्म और बांग्ला ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद का प्रतीक बना डाला। अछूत रवींद्र की जगह जमींदार रवींद्रनाथ ने ले ली और भद्रलोक रवींद्र विमर्श में रवींद्र लंपट जमींदार के सिवाय कुछ नहीं है।

फासीवादी राष्ट्रवाद के निशाने पर रवींद्र नाथ शुरु से हैं और 1916 में ही उनपर अमेरिका और चीन में हमले हुए। 1941 में उनके अवसान के बाद रवींद्र विरासत को खारिज करने के लिए उनपर हमलों का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं हुआ।

मई, 2014 से बहुत पहले 17 सितंबर, 2003 में बंगाल की गौरवशाली देश पत्रिका में एक पाठक सुजीत चौधरी, करीमगंज ने रवींद्र के चरित्रहनन के विरोध में लिखाःसांप्रतिक काल में देश पत्रिका में रवींद्रनाथ के संबंध में अनेक निबंध और पत्र प्रकाशित हुए हैं। जिन्हें पढ़कर आम पाठक की हैसियत से मुझे कुछ धारणाएं मिलीं, जो इसप्रकार हैंःएक-रवींद्रनाथ सांप्रदायिक थे। इसलिए अपने मुसलिम बहुल जमींदारी इलाके में नहीं, हिंदूबहुल वीरभूम में उन्होंने विश्वविद्यालय की स्थापना की। दो- वे कापुरुष थे और उनका देशप्रेम नकली था। तीन-उनकी कथनी और करनी में कोई सामजस्य नहीं था। कथनी में वे विधवा विवाह के समर्थक थे और असली वक्त पर खुद बाधा खड़ी कर देते थे। चार-वे जाति प्रथा के समर्थक थे। पांच-वे प्रणय संबंधों में निरंकुश थे। आठ साल के शिशु से लेकर अपनी भाभी तक किसी को उन्होंने नहीं बख्शा।  छह-अपनी बालिकावधु पर उन्होंने प्रकांतर से अनेक अत्याचार किये। सात- कविता वविता कुछभी नहीं, कुछ गीतों के लिए वे जिंदा हैं। इसके विपरीत उम्मीद की बात यह है कि बांग्लाभाषी दूसरे सारे आलोचक, गवेषक, कवि, साहित्यकार, पत्रलेखक सभी आदर्सवादी, प्रगतिशील एवं निर्मल चरित्र के हैं। शुक्र है, वरना रवींद्र नाथ ने तो लगभग पूरे देश का ध्वंस कर दिया होता। (संदर्भःकी खाराप लोक छिलेन रवींद्रनाथ!देश, 17 सितंबर, 2003)

पत्र लेखक ने जिन बिंदुओं पर रवींद्र के चरित्र हनन की बात की है, वे सारे भद्रलोक रवींद्र विमर्श के तत्व हैं। आज भी रवींद्र विमर्श रवींद्र के प्रेमसंबंधों पर शोध का अनंत सिलसिला है। कम से कम हिंदी में ऐसे चरित्रहनन की नजीर नहीं है।

गौरतलब है कि देश के संपादक सागरमय घोष के निधन के बाद इस पत्रिका की भूमिका सुनील गंगोपाध्याय के नेतृत्व में बदल गयी जो रवींद्र को दौ कौड़ी का साहित्यकार नहीं मानते। उन्होंने इसी देश पत्रिका में समय को सूत्रधार मानकर तीन उपन्यासों की एक ट्रिलाजी प्रकाशित की, एई समय, पूर्व पश्चिम और भोरेर आलो और बांग्ला विद्वत समाज इसे नवजागरण, स्वतंत्रता संग्राम, भारत विभाजन, बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, नक्सलबाड़ी आंदोलन, शरणार्थी समस्या और आधुनिक भारत का समग्र इतिहास बताते हैं।

इस इतिहास में बंगाल के नमोशूद्र सुनील गंगोपाध्याय के मुताबिक हिंदू कभी नहीं थे, दो राष्ट्र सिद्धांत के तहत भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इन अछूतों को भी सवर्णों को हिंदू मान लेने की मजबूरी थी।

इस इतिहास में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आदिवासी किसान जनविद्रोहों के लिए कोई स्थान नहीं है और मां काली को उन्होंने भोरेर आलो में लैंग्टा संथाल मागी याऩी नंगी संथाल औरत बताया है।

इस इतिहास में विभाजन पीड़ित शरणार्थियों की दंडकारण्य कथा है लेकिन मरीचझांपी नरसंहार नहीं है और शरणार्थी जीवन यंत्रणा को आपराधिक गतिविधियों से जोड़ते हुए शरणार्थियों को बंगाल की सारी समस्याओं की जड़ बताया गया है।

सुनील गंगोपाध्याय ने नवजागरण के राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे चरित्रों को अपने हिसाब से गढ़ा है तो रवींद्र कादंबरी प्रेम प्रसंग भी इस ट्रिलाजी का आख्यान है।

गोदान औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत किसान का महाजनी व्यवस्था में चलने वाले निरंतर शोषण तथा उससे उत्पन्न संत्रास की कथा है।  यह महाजनी सभ्यता अब मुक्तबाार के कारपोरेटएकाधिकार में बदल गया है और एक नहीं, लाखों होरियों की मर्यादा की लड़ाई का अंतिम विकल्प अब आत्महत्या है।

आजादी से पहले किसान आदिवासी शूद्र अछूत मुसलमान समूचा बहुजन समाज जल जंगल जमीन के हकूक के लिए लगातार हजारोंहजार साल से लड़ता रहा है और आजादी के बाद में किसान आंदोलन सवर्ण सत्ता की राजनीतिक मनुस्मृति का शिकार है तो मुक्तबाजारी फासीवादी सैन्य राष्ट्रवाद में बेदखली की यह महाजनी सभ्यता निरंकुश नरसंहार संस्कृति है।

गोदान का नायक होरी एक किसान है जो किसान वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद है।  'आजीवन दुर्धर्ष संघर्ष के बावजूद उसकी एक गाय की आकांक्षा पूर्ण नहीं हो पाती'।  गोदान भारतीय कृषक जीवन के संत्रासमय संघर्ष की कहानी है।

अब होरी सिरे से दो बीघा जमीन की तरह लापता है और कोई शोकसंदेश नहीं है।

गोदान के नायक और नायिका होरी और धनिया के परिवार के रूप में हम भारत की एक विशेष जनपदीय लोक संस्कृति की साझा विरासत को सजीव और साकार पाते हैं, ऐसी संस्कृति जो अब समाप्त हो रही है या हो जाने को है, फिर भी जिसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुबास भरी है। कृषि और किसानों की बेदखली और उनके वध उत्सव के इस दुःसमय में गोदान की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है।

      गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन - उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता और भारतपरायणता के साथ स्वार्थपरता ओर बैठकबाजी, उसकी बेबसी और निरीहता- का जीता जागता चित्र उपस्थित किया गया है।  उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है उसे सहलाता, क्लेश और वेदना को झुठलाता, 'मरजाद' की झूठी भावना पर गर्व करता, ऋणग्रस्तता के अभिशाप में पिसता, तिल तिल शूलों भरे पथ पर आगे बढ़ता, भारतीय समाज का मेरुदंड यह किसान कितना शिथिल और जर्जर हो चुका है, यह गोदान में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है।  

गोदान के कथानक में नगरों के कोलाहलमय चकाचौंध ने गाँवों की विभूति को कैसे ढँक लिया है, जमींदार, मिल मालिक, पत्रसंपादक, अध्यापक, पेशेवर वकील और डाक्टर, राजनीतिक नेता और राजकर्मचारी जोंक बने कैसे गाँव के इस निरीह किसान का शोषण कर रहे हैं और कैसे गाँव के ही महाजन और पुरोहित उनकी सहायता कर रहे हैं, गोदान में ये सभी तत्व नखदर्पण के समान प्रत्यक्ष हो गए हैं।  

यही आज का सच है और नस्ली वर्चस्व के फासीवादी राष्ट्रवाद में बहुजनों की सद्गति का सिलसिला जारी है। इस कहानी को दोबारा पढ़ें और हो सके तो इस कहानी पर बनी सत्यजीत रे की फिल्म को देखते हुए समकालीन डिजिटल इंडिया की नरसंहारी संस्कृति और समय के सच का सामना करें। 

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