समूचे रवींद्र साहित्य पर बौद्धमय भारत की अमिट छाप

समूचे रवींद्र साहित्य की दिशा और समूची रवींद्र रचनाधर्मिता,  उनकी जीवनदृष्टि पर उसी बौद्धमय भारत की अमिट छाप है। विस्थापन का शिकार है हिमालय और हिमालयी लोग ...

हाइलाइट्स

विस्थापन का शिकार है हिमालय और हिमालयी लोग भी इसी नस्ली विषमता की वजह से दोयम दर्जे के नागरिक माने जाते हैं।

रवींद्रनाथ जिस परिवार में जनमे, वह मूर्तिपूजा के खिलाफ ब्रह्मसमाज आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था। वे जाति से पीराली ब्राह्मण थे जिन्हें अछूत माना जाता रहा है और सामाजिक बहिष्कार की वजह से उनका परिवार पूर्वी बंगाल छोड़क कोलकाता चला आया।

रवींद्र का दलित विमर्श-छह

समूचे रवींद्र साहित्य की दिशा और समूची रवींद्र रचनाधर्मिता,  उनकी जीवनदृष्टि पर उसी बौद्धमय भारत की अमिट छाप है।

पलाश विश्वास

चंडाल आंदोलन के भूगोल में रवींद्र की जड़ें है जो पीर फकीर बाउल साधु संतों की जमीन है और उसके साथ ही बौद्धमय भारत की निरंतता के साथ लगातार जल जंगल जमीन के हकहकूक का मोर्चा भी है। श्रावंती नगर की चंडालिका की कथा का सामाजिक यथार्थ अविभाजित बंगाल का चंडाल वृत्तांत है, जिसकी पृष्ठभूमि में बंगाल का नवजागरण और ब्रह्मसमाज  है।

रवींद्र के व्यक्तित्व कृत्तित्व में वैदिकी प्रभाव की खूब चर्चा होती रही है। लोकसंस्कृति में उनकी जड़ों के बारे में भी शोध की निरंतरता है। लेकिन चंडालिका के अलावा कथा ओ कहानी की सभी लंबी कविताओं में जो बौद्ध आख्यान और वृत्तांत हैं और उनकी रचनाधर्मिता पर महात्मा गौतम बुद्ध का जो प्रभाव है, उसके बारे में बांग्लादेश में थोड़ी बहुत चर्चा होती रही है, लेकिन भारत के विद्वतजनों ने रवींद्र जीवन दृष्टि पर उपनिषदों के प्रभाव पर जोर देते हुए बौद्ध साहित्य के स्रोतों से व्यापक पैमाने पर रवींद्र के रचनाकर्म पर कोई खास चर्चा नहीं की है।

चंडालिका में अस्पृश्यता के खिलाफ, मनुस्मृति के खिलाफ उनकी युद्धघोषणा को सिरे से नजरअंदाज किया गया है।  

जड़ों से, लोक और लोकायत में रचे बसे रवींद्र साहित्य में प्रकृति, पर्यावरण और प्रकृति से जुड़ी मनुष्यता के प्रति प्रेम उनके गीतों को रवींद्र संगीत बनाता है, जो बंगाल के आम लोगों का कंठ स्वर उसी तरह है जैसे वह स्त्री अस्मिता का पितृसत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध और उनकी मुक्ति का माध्यम है तो बांग्ला राष्ट्रीयता का प्रतीक भी वही है।

जड़ों से जड़ने की इसी अनन्य जिजीविषा की वजह से रोमांस से सरोबार मामूली से लगने वाले उनके गीत के बोल आमार बांग्ला आमि तोमाय भालोबासि सैन्य राष्ट्र के नस्ली नरसंहार अभियान के विरुद्ध बांग्ला राष्ट्रीयता की संजीवनी में तब्दील हो गयी और जाति धर्म से ऊपर उठकर मुक्तिसंग्राम में इसी गीत को होंठों पर सजाकर लाखों लोगों ने अपने प्राणों को उत्सर्ग कर दिया। भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास भूगोल बदल गया स्वतंत्र बांग्लादेश के अभ्युदय से जहां राष्ट्रीयता उनकी मातृभाषा है।

इसी तरह स्वतंत्र भारतवर्ष की समग्र परिकल्पना जहां रवींद्र की कविता भारत तीर्थ है, राष्ट्रीय एकता,  अखंडता और संप्रभुता का राष्ट्रगान जनगण मन अधिनायक है तो भारतीय दर्शन परंपरा, भारतीय इतिहास, भारतीय सभ्यता और संस्कृति की अंतरतम अभिव्यक्ति गीतांजलि है।

हमने स्पष्ट कर दिया है कि मनुस्मृति विधान के तहत जाति व्यवस्था की विशुद्धता, अस्पृश्यता और बहिस्कार के खिलाफ खड़े गांधी, अंबेडकर और रवींद्र तीनों पर महात्मा गौतम बुद्ध और उनके धम्म का प्रभाव है।

हम मौजूदा रंगभेद की राजनीति,  सत्ता और अर्थव्यवस्था की नरसंहार संस्कृति के लिए बार बार महात्मा गौतम बुद्ध के दिखाये रास्ते पर चलने और धम्म के अनुशीलन पर जोर देते रहे हैं। समूचे रवींद्र साहित्य की दिशा और समूची रवींद्र रचनाधर्मिता, उनकी जीवनदृष्टि पर उसी बौद्धमय भारत की अमिट छा                                                                       प है।

इसी सिलसिले में रवींद्र साहित्य के बौद्ध प्रसंग पर आज सुबह मैंने ढाका बांग्ला अकादमी के उपसंचालक कवि डा.तपन बागची का बांग्ला में लिखे मूल शोध निबंध को अपने हे मोर चित्त, prey for humanity video के साथ सोशल मीडिया पर शेयर किया है। हिंदी पाठकों के लिए इस आलेख में उस शोध निबंध के तथ्यों पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे। बाकी उपलब्ध सामग्री पर भी बात करेंगे और अगर नेट पर कोई प्रासंगिक सामगग्री मिली तो उसे भी शेयर करेंगे।

हम ब्लाग और सोशल मीडिया पर रवींद्र के दलित विमर्श को आम पाठकों के लिए इसलिए शेयर कर रहे हैं कि यह कुलीन सवर्ण विद्वतजनों के लिए निषिद्ध विषय है, जिसपर हमारे लिए साहित्य के परिसर में या अकादमिक स्तर पर चर्चा करने का मौका नहीं है और यह प्रयास करके हम 2002 में भी हार गये हैं।

हम चाहते हैं कि सिर्फ लाइक न करके , आप स्वयं भी इस संवाद में अपनी सहमति और असहमति दर्ज करें और जितना हो सकें, शेयर करके इसे एक व्यापक बहस बना दें ताकि समर्थ लोग आगे इस पर कायदे से बात शुरु करें।

रवींद्रनाथ ने अचानक चंडालिका नहीं लिखी है। इससे पहले रुस की चिट्ठी, शूद्र धर्म, राष्ट्रवाद और मनुष्य का धर्म जैसे महत्वपूर्ण कृतियों में उन्होंने भारत की सबसे बड़ी समस्या वर्ण वर्चस्व की वजह से नस्ली विषमता बताते हुए भारत को खंडित राष्ट्रीयताओं का समूह बताया है और इसे सामाजिक समस्या माना है।

औपनिवेशिक भारत की समस्या को वे वैसे ही राजनीतिक समस्या नहीं मानते थे, जैसे गुरुचांद ठाकुर, महात्मा ज्योतिबा फूले, अयंकाली, नारायणगुरु और पेरियार।

फूले और गुरुचांद ठाकुर अंग्रेजी हुकूमत के बदले ब्राह्मणों के हुकूमत के विरोध में गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में दलितों, पिछड़ों की हिस्सेदारी से मना किया था। बंगाल में चंडाल आंदोलन भी ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध न होकर सवर्म जमींदारों के खिलाफ था और राजनीतिक आजादी के बजाये वे जाति व्यवस्था के तहत अपनी अस्पृश्यता से मुक्ति और सबके लिए समान अवसर, समानता और न्याय की मांग कर रहे थे। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर भी अस्पृश्यताविरोधी आंदोलन से राजनीति की शुरुआत की और उन्होंने जाति उन्मूलन का एजंडा सामने रखा। बहुजनों के नेता जिस सामाजिक बदलाव की बात करते हुए अंग्रेजों से ब्राह्मणतंत्र को सत्ता हस्तांतरण का विरोध कर रहे थे, रवींद्र साहित्य में भी उसी सामाजिक बदलाव की मांग प्रबल है।

बहुचर्चित चंडालिका रवींद्रनाथ ने 1933 में लिखी। चंडालिका को उन्होंने चंडाल आंदोलन के बिखराव से पहले सामाजिक बदलाव के लिए जाति व्यवस्था पर आधारित रंगभेदी नस्ली विषमता के खिलाफ पेश किया, इस पर खास गौर किये जाने की जरुरत है।

1937 में चंडाल आंदोलन के महानायक गुरुचांद ठाकुर,  जिनके आंदोलन की वजह से 1911 की जनगणना में बंगाल के अस्पृश्य चंडालों को नमोशूद्र बतौर दर्ज किया गया और बंगाल में अस्पृश्यता निषेध लागू हो गया, का निधन हो गया, उसी वर्ष रवींद्रनाथ ने चंडालिका को नृत्यनाटिका के रुप में पेश करके बाकायदा अपनी तरफ से अस्पृश्यता के विरोध में एक सांस्कृतिक आंदोलन की शुरुआत कर दी।  

क्योंकि बंगाल में बाकी देश की तरह मंदिर प्रवेश आंदोलन या पेयजल के अधिकार के लिए आंदोलन नहीं हुए, चंडालिका का यह सांस्कृतिक रंगकर्म चंडाल आंदोलन के सिलसिले में बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर जबकि तमाम बहुजन नेता ब्राह्मणधर्म के विकल्प के रुप में गौतम बुद्ध के धम्म का प्रचार कर रहे थे और रवींद्रनाथ की चंडालिका कथा बंगाल के सामाजिक यथार्त की अभिव्यक्ति के लिए सीधे बौद्ध साहित्य से ली गयी।

चंडालिका की रचना से बहुत  पहले जिस गीतांजलि पर नोबेल पुरस्कार मिलने की वजह से रवींद्र को कविगुरु, गुरुदेव और विश्वकवि जैसी वैश्विक उपाधियां मिलीं, उसी गीताजलि में उन्होंने लिखाः

शतेक शताब्दी धरे नामे सिरे असम्मानभार

मानुषेर नारायणे तबु करो ना नमस्कार।

तबु नतो करि आंखि देखिबारे पाओ नाकि

नेमेछे धुलार तले दीन पतितेर भगवान

अपमाने होते हबे ताहादेर सबार समान।

मेरे पिता शरणार्थी नेता जो पूर्वी बंगाल से उखाड़े गये और भारतभर में छितरा दिये गये अछूत विभाजनपीड़ित शरणार्थियों के पुनर्वास, मातृभाषा, आरक्षण,  नागरिकता और नागरिक मानवाधिकार के लिए तजिंदगी लड़ते रहे, वे इस कविता को बंगाल के और बाकी भारत के अछूतों के आत्मसम्मान आंदोलन का मूल मंत्र मानते थे। वे मानते थे कि सामाजिक विषमता की वजह सेही विस्थापन होता है।

नस्ली रंगभेद की विश्वव्यापी साम्राज्यवादी हिंसा की वजह से आज आधी मनुष्यता शरणार्थी हैं तो आजादी के बाद इसी नस्ली भेदभाव के कारण पूरा का पूरा आदिवासी भूगोल विस्थापन का शिकार है।

विस्थापन का शिकार है हिमालय और हिमालयी लोग भी इसी नस्ली विषमता की वजह से दोयम दर्जे के नागरिक माने जाते हैं।

उन्नीसवीं सदी से शुरु चंडाल आंदोलन की मुख्य मांग अछूतों को सवर्णों की तरह हिंदू समाज में बराबरी और सम्मान देने की मांग थी जिस वजह से पूर्वी बंगाल के चंडाल भूगोल में महीनों तक अभूतपूर्व आम हड़ताल रही। केरल में भी अयंकाली ने किसानों और मछुआरों की मोर्चांबदी से इसीतरह की हड़ताल की तो तमिलनाडु की द्रविड़ अनार्य अस्मिता का आत्मसम्मान आंदोलन भी इसी नस्ली भेदभाव के खिलाफ था और इसी जातिव्यवस्था और मनुस्मृति विधान के तहत बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने नागपुर में हमारे जन्म से पहले अपने लाखों अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धम्म की दीक्षा ली।

लेकिन असमानता और अन्याय की व्यवस्था कारपोरेट हिंदुत्व से देश के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण के सत्तर साल बाद राष्ट्रवाद की अंध आत्मघाती सुनामी में तब्दील है और इस व्यवस्था के शिकार तमाम जन समुदाय जल जंगल जमीन नागरिकता नागरिक और मानव अधिकारों से लगातार बेदखली के बाद उसी नरसंहार संस्कृति की पैदल सेना है।

रवींद्रनाथ जिस परिवार में जनमे, वह मूर्तिपूजा के खिलाफ ब्रह्मसमाज आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था। वे जाति से पीराली ब्राह्मण थे जिन्हें अछूत माना जाता रहा है और सामाजिक बहिष्कार की वजह से उनका परिवार पूर्वी बंगाल छोड़क कोलकाता चला आया। उनके दादा प्रिंस द्वारका नाथ टैगोर को फोर्ट विलियम का ठेका मिला और वे बंगाल में ब्रिटिश राज के दौरान उद्यमियों में अगुवा बन गये, जिनका लंदन के स्टाक एक्सचेंज में भी कारोबार था तो पूर्वी बंगाल में उनकी बहुत बड़ी जमींदारी थी। इसके बावजूद उनका परिवार कुलीन हिंदू समाज के लिए अछूत था। रवींद्र के पिता महर्षि द्वारका नाथ टैगोर ब्रह्म समाज आंदोलन के स्तंभ थे। टैगोर परिवार और ब्रह्मसमाज आंदोलन के नेताओं पर बौद्धधर्म का गहरा असर था और उन सभी ने इस पर काफी कुछ लिखा। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि पर हम अलग से चर्चा करेंगे।

रवींद्रनाथ की रचनाओं में चंडालिका के अलावा नेपाली बौद्ध साहित्य से लिये गये आख्यान पर आधारित भिक्षा,  उपगुप्त,  पुजारिनी,  मालिनी,  परिशोध,  चंडाली,  नगरलक्ष्मी, मस्तकविक्रय जैसी रचनाएं लिखी गयी हैं। उनका कविता संकलन कथा ओ काहिनी की सारी रचनाएं इसी नेपाली बौद्ध साहित्य के आख्यान पर आधारित हैं। कथा ओ काहिनी की 33 कविताएं इसी तरह लिखी गयी, जिनमें लंबी कविताएं दो बिघा जमीन, विसर्जन, देवतार ग्रास और पुरातन भृत्य जैसी रचनाएं शामिल हैं। पुनश्च की कविताओं का स्रोतभी बौद्ध साहित्य है। जिनमें शाप मोचन बेहद लोकप्रिय और चर्चित है। 

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