आरबीआई के गवर्नर का इस्तीफा - अर्थव्यवस्था आंधी सुरंग में दाखिल

विपक्षी पार्टियों, सुप्रीम कोर्ट और सभी संस्थाओं को एक जुट हो कर रिज़र्व बैंक की इस लूट और उसकी स्वायतत्ता को बचाना चाहिए. जो हो रहा है वो देश हित में बिलकुल नहीं है....

अतिथि लेखक
आरबीआई के गवर्नर का इस्तीफा - अर्थव्यवस्था आंधी सुरंग में दाखिल

RBI Governor's resignation Economy entering the blind tunnel

प्रशांत टंडन

मोदी सरकार द्वारा लगातार तीसरी बार आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन 7 को लागू करने के बाद गवर्नर उर्जित पटेल असहज महसूस कर रहे थे और उनके इस्तीफे की अटकले बाज़ार में गर्म थीं. लेकिन समझा जा रहा था की कोई न कोई बीच का रास्ता निकाला जा सकता है. पूर्व की किसी सरकार ने सेक्शन 7 का इस्तेमाल कभी नहीं किया. ये एक आपातकालीन व्यवस्था है जिसके तहत सरकार रिज़र्व बैंक को अनिवार्य सलाह दे सकती है.

अगर ये सच है तो ये आरबीआई की स्वयतत्ता के लिये चिंता जनक बात है क्योंकि ये समझा जा रहा है कि 14 दिसंबर को होने वाली बैठक का एजेंडा आने के बाद उर्जित पटेल के पास कोई और विकल्प नहीं बचा था. ऐसी संभावना है कि 14 दिसंबर की बैठक में रिज़र्व बैंक का बोर्ड मौद्रिक नीति संबंधी काफी अधिकार अपने हाथ में ले लेगा. यानि बोर्ड में राजनीतिक नियुक्तियों के चलते रिज़र्व बैंक के काम काज में सीधे सरकार का दखल होगा.

असली मुद्दा रिज़र्व बैंक का 9.59 लाख करोड़ रुपए का कैश रिज़र्व है जिस पर सरकार की निगाह है. खबरे थीं कि सरकार अपना बजट घाटा पूरा करने की नीयत से चाहती थी कि वो 3.6 लाख करोड़ रुपया सरकार को ट्रांसफर कर दे.

क्यों ज़रूरी है कैश रिज़र्व:

रिज़र्व बैक को नई मुद्रा जारी करने के लिए, विदेशी मुद्रा - खासकर डालर के मुक़ाबले रुपए की कीमत बनाये रखने के लिए, अंतराष्ट्रीय व्यापार में क्रेडिट रेटिंग बनाये रखने के लिए और किसी आर्थिक संकट से निबटने के लिए एक सुरक्षित रिज़र्व की ज़रूरत होती है.

अगर सरकार ने बोर्ड के जरिये जबरन रिज़र्व बैंक का खजाना खाली किया तो देश किसी आर्थिक संकट का सामना करने में सक्षम नहीं होगा, विदेशी निवेश को तो भूल ही जाना पड़ेगा और IMF और दूसरी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भी भारत की रेटिंग गिरा देंगी जिसकी चौतरफा मार अर्थव्यवस्था में पड़ेगी.

दूसरा विवाद है रिज़र्व बैक उन 11 सरकारी बैंकों को और कर्ज़ देने की छूट दे दे जिन पर Prompt Corrective Action के तहत कड़ाई की गई है उनके NPA को देखते हुये. जाते जाते मोदी सरकार अपने चहेते उद्योगपतियों को बैंक लूटने की खुली छूट देना चाहती है.

विपक्षी पार्टियों, सुप्रीम कोर्ट और सभी संस्थाओं को एक जुट हो कर रिज़र्व बैंक की इस लूट और उसकी स्वायतत्ता को बचाना चाहिए. जो हो रहा है वो देश हित में बिलकुल नहीं है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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