राजसत्ता, धर्मसत्ता, राष्ट्रवाद और शरणार्थी समस्या के संदर्भ में रोहिंग्या मुसलमान और गुलामी की विरासत

भारत में राजसत्ता इसी नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के कारण धर्मसत्ता में तब्दील है और यूरोप का मध्यकालीन बर्बर धर्मयुद्ध भारत के वर्तमान और भविष्य का सामाजिक यथार्थ बनने लगा है, जिसकी आशंका रवींदरनाथ क...

पलाश विश्वास
हाइलाइट्स

राजसत्ता धर्म सत्ता में तब्दील

यूरोप का मध्यकालीन बर्बर धर्मयुद्ध भारत के वर्तमान और भविष्य का सामाजिक यथार्थ।

अश्वेतों, लातिन मेक्सिकान मूल के लोगों और भारतीयों के साथ मुसलमानों के खिलाफ श्वेत आतंकवादी नस्ली अमेरिकी राष्ट्रवाद और इजराइल के जायनी आतंकवाद से नाभिनाल संबंध है भारत में धर्मसत्ता की और बतौर राष्ट्र भारत अमेरिका और इजराइल का समर्थक है तो रोहिंग्या विरोधी धर्मोन्मादी ध्रुवीकरण का रसायनशास्त्र समझना उतना मुश्किल भी नहीं है।

रवींद्र का दलित विमर्श-26

पलाश विश्वास

कोलकाता में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में लाखों मुसलमानों ने रैली की और इस रैली के बाद बंगाल में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर नये सिरे से धर्मोन्मादी ध्रुवीकरण तेज हुआ है। भारत में सिर्फ मुसलमान ही म्यांमार में नरसंहार और मानवाधिकार हनन के खिलाफ मुखर है, ऐसा नहीं है।

पंजाब के गुरुद्वारों से सीमा पर जाकर सिख कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर इन शरणार्थियों के लिए लंगर चला रहे हैं तो भारत के गैर मुसलमान नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा भी रोहिंग्या नरसंहार के खिलाफ विश्व जनमत के साथ है।

हिंदू मुसलमान दो राष्ट्र के सिद्धांत पर भारत विभाजन और जनसंख्या स्थानांतरण भारत में शरणार्थी समस्या का मौलिक कारण है। धर्म आधारित राष्ट्रीयता की यह विरासत भारत की नहीं है। यूरोप के धर्म युद्ध की राष्ट्रीयता है और फिलीस्तीन विवाद को लेकर यूरोप का यह धर्म युद्ध अरब मुसलमान दुनिया के खिलाफ आज भी जारी है और इसी धर्म युद्ध के रक्तबीज बनकर तमाम आतंकवादी धर्म राष्ट्रीयता के संगठन रो दुनिया को लहूलुहान कर रहे हैं

धर्म आतंकवाद का पर्याय बन गया है।

रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या भी राजसत्ता के धर्म सत्ता में बदल जाने की कथा है जिसके तहत एक धार्मिक राष्ट्रीयता दूसरी धार्मिक राष्ट्रीयता का सफाया करने में लगी है। अखंड भारत और म्यांमार दोनों ब्रिटिश हुकूमत के उपनिवेश रहे हैं तो यह धर्म युद्ध भी उसी औपनिवेशिक गुलामी की विरासत है, जो भारत के 1947 में और म्यांमार के 1948 में आजाद होने के बावजूद लगातार मजबूत होती जा रही है।

म्यांमार में करीब 8 लाख रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं और वे इस देश में सदियों से रहते आए हैं, लेकिन बर्मा के लोग और वहां की सरकार इन लोगों को अपना नागरिक नहीं मानती है। बिना किसी देश के इन रोहिंग्या लोगों को म्यांमार में भीषण दमन का सामना करना पड़ता है। बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग बांग्लादेश और थाईलैंड की सीमा पर स्थित शरणार्थी शिविरों में अमानवीय स्थितियों में रहने को मजबूर हैं। ऐसे जो रोहिंग्या शरणार्थी भारत में हैं, म्यांमार से भारत के संबंध सुधरते जाने के बाद उन्हें अब भारत में रहने की इजाजत नहीं है और उन्हें खदेड़ने की तैयारी है। जबकि रोहिंग्या मुसलमानों की राष्ट्रीयता की लड़ाई म्यांमार की आजादी से पहले से जारी है। अचानक म्यांमार में यह गृहयुद्ध शुरु नहीं हुआ है। बदला है तो भरतीय राजनय का दृष्टिकोण बदला है जो सीधे तौर पर म्यांमार की सैन्य सत्ता के साथ है।

फिलीस्तीन पर कब्जा का धर्म युद्ध भी इसके पीछे है क्योंकि रोहिंग्या मुसलमानों के सफाया कार्यक्रम में इजराइल का भी सक्रिय समर्थन है।

अश्वेतों, लातिन मेक्सिकान मूल के लोगों और भारतीयों के साथ मुसलमानों के खिलाफ श्वेत आतंकवादी नस्ली अमेरिकी राष्ट्रवाद और इजराइल के जायनी आतंकवाद से नाभिनाल संबंध है भारत में धर्मसत्ता की और बतौर राष्ट्र भारत अमेरिका और इजराइल का समर्थक है तो रोहिंग्या विरोधी धर्मोन्मादी ध्रुवीकरण का रसायनशास्त्र समझना उतना मुश्किल भी नहीं है।

गौरतलब है कि 1937 से पहले ब्रिटिश ने अंग्रेजों ने बर्मा को भारत का राज्य घोषित किया था लेकिन फिर अंगरेज सरकार ने बर्मा को भारत से अलग करके उसे ब्रिटिश क्राउन कालोनी (उपनिवेश) बना दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने बर्मा के जापानियों द्वारा प्रशिक्षित बर्मा आजाद फौज के साथ मिल कर हमला किया। बर्मा पर जापान का कब्जा हो गया। बर्मा में सुभाषचंद्र बोस के आजाद हिन्द फौज की वहां मौजूदगी का प्रभाव पड़ा। 1945 में आंग सन की एंटीफासिस्ट पीपल्स फ्रीडम लीग की मदद से ब्रिटेन ने बर्मा को जापान के कब्जे से मुक्त किया लेकिन 1947 में आंग सन और उनके 6 सदस्यीय अंतरिम सरकार को राजनीतिक विरोधियों ने आजादी से 6 महीने पहले उन की हत्या कर दी। आज आंग सन म्यांमार के 'राष्ट्रपिता' कहलाते हैं। आंग सन की सहयोगी यू नू की अगुआई में 4 जनवरी, 1948 में बर्मा को ब्रिटिश राज से आजादी मिली ।

जिस नस्ली राष्ट्रवाद के राष्ट्रीयता सिद्धांत के तहत भारत का विभाजन हुआ, उसी के तहत सत्ता समीकरण के मुताबिक रोहिंग्या मुसलमानों के सवाल पर देश भर में मुसलमानों के खिलाफ नस्ली घृणा अभियान की राजनीति और राजनय के तहत यह धर्मोन्मादी ध्रुवीकरण है जो ब्रिटिश हुक्मरान की गुलामी की विरासत है।

गुलामवंश के शासन का पुनरूत्थान है यह।

भारत में राजसत्ता इसी नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के कारण धर्मसत्ता में तब्दील है और यूरोप का मध्यकालीन बर्बर धर्मयुद्ध भारत के वर्तमान और भविष्य का सामाजिक यथार्थ बनने लगा है, जिसकी आशंका रवींदरनाथ को थी। नेशन की इस नस्ली वर्चस्व की भावना पर प्राचीनता आरोपित करने का कार्यभार जर्मन रोमानी राष्ट्रवाद के हाथों पूरा हुआ।

गौरतलब है कि मुसोलिनी का नाजी राष्ट्रवाद भी धर्मसत्ता को मजबूत करने के हक में था तो अमेरिकी लोकतंत्र में भी उसी नस्ली धर्म सत्ता का बोलबाला है और नवनिर्वाचित अमेरिका राष्ट्रपति को कार्यभार संभालने से पहले गिरजाघर जाकर अपनी निष्ठा समर्पित करनी पड़ती है।

मजे की बात यह है कि ये रोहिंग्या मुसलमान मूलतः अखंड बंगाल के चटगांव से भारत में ब्रिटिश हुकूमत के मातहत अंग्रेजों के प्रोत्साहन से ही म्यांमार के अराकान प्रदेश में बड़ी संख्या में उसी तरह जा बसे थे जैसे म्यांमार के रंगून और दूसरे प्रांतों के साथ सिंगापुर में भी बड़ी संख्या में भारत के दूसरे प्रांतों से लोग आजीविका और रोजगार के लिए जाकर बसे थे। अराकान में वैसे बंगाली मध्ययुग से बसते रहे हैं और वहां दुनिया के दूसरे हिस्सों से मुसलमान जाते रहे हैं लेकिन उनकी जनसंख्या में सबसे ज्यादा बंगाली मूल के लोग हैं।

यह शरणार्थी समस्या द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1948 में कुछ रोहिंग्या मुसलमानों के अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आरंभ कर देने से लगातार चली आ रही है। वर्ष 1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति तक यह आंदोलन बहुत सक्रिय था।

जनरल नी विंग की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख मुसलमानों ने वर्तमान बांग्लादेश में शरण ली। उनमें से बहुत से लोगों ने बाद में कराची का रूख़ किया और उन लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पाकिस्तान को अपना देश मान लिया।

 मलेशिया में भी पच्चीस से तीस हज़ार रोहिंग्या मुसलमान आबाद हैं।

बर्मा के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह से मुक्ति प्राप्त कर ली है और देश में लोकतंत्र की बेल पड़ गयी है। वर्ष 2012 के चुनाव में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी की सफलता के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिक के दरवाज़े बंद हैं और उन पर निरंतर अत्याचार जारी है जो लोकतंत्र के बारे में सू के बयानों में भारी विरोधाभास है। इसी वजह से उनसे नोबेल पुरस्कार वापस करने की मांग भी की जा रही है।

बांग्लादेश के युद्ध के दौरान करीब नब्वे लाख शरणार्थी भारत आये थे और उनमें बड़ी संख्या में मुसलमान भी थे। सत्तर के दशक के उन शरणार्थियों के मुकाबले बांग्लादेश में सबसे ज्यादा करीब पांच लाख रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थी हैं तो भारतभर में इनकी संख्या तिब्बत से आये बौद्ध और श्रीलंका से आने वाले तमिल शरणार्थियों की तुलना में कम हैं।

बांग्लादेश के लिए रोहिंग्या शरणार्थी उनकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी समस्या जरूर हैं लेकिन भारत विभाजन के बाद सीमापार से लगातार आ रहे शरणार्थियों की समस्या से जूझने वाले भारत के लिए रोहिंग्या शरणार्थी संख्या के हिसाब से उतनी बड़ी समस्या है नहीं। उनकी नस्ल की वजह से यह समस्या बड़ी समस्या जरूर बन गयी है।

क्योंकि रोहिंग्या शरणार्थियों को उऩकी राष्ट्रीयता आंदोलन की वजह से आतंकवाद और भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरा बता रही है भारत की हिंदुत्ववादी सरकार और इन शरणार्थियों को खदेड़ने का ऐलान किया जा चुका है।

भारतीय राजनय भी इस मामले में म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार और मानवाधिकार हनन के मुद्दे को सिरे से नजरअंदाज करते हुए म्यांमार की सैनिक जुंटा सरकार का साथ देने की नीति पर चल रही है।

जैसे भारत में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का हिंदू धर्म से कुछ लेना देना नहीं है उसी तरह रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सैन्य जुंटा सरकार के धर्मोन्मादी राजकाज की इस नरसंहारी संस्कृति से बौद्धधर्म का कुछ लेना देना नहीं है और न ही यह बौद्ध और इस्लाम धर्म के अनुयायियों के बीच कोई फिलीस्तीन युद्ध है।

फिलीस्तीन के धर्मयुद्ध के वारिशान जो बाकी दुनिया के खिलाफ धर्मयुद्ध जारी रखे हुए हैं, यह उनका ही धर्मयुद्ध है। ऐसा समझ सकें तो रोहिंग्या पहेली बूझ सकेंगे।

भारत में ऐसे धर्मयुद्ध का कोई इतिहास नहीं है, इसे पहले समझना जरूरी है।

क्योंकि भारत में धर्म मनुष्यता के लिए हमेशा मुक्तिमार्ग रहा है। धर्म को नस्ली वर्चस्व का माध्यम अब पश्चिम के अनुकरण में बनाया जा रहा है।

क्योंकि भारत में यूरोप की तरह धर्म की सत्ता नहीं रही है। धर्म को लेकर सारे विवाद अब धर्म की सत्ता कायम करने के कारपोरेट एजंडे से हो रहे हैं।

भारत में ब्राह्मण धर्म और वैदिकी सभ्यता की वर्ण व्यवस्था के खिलाफ खिलाफ समानता और न्याय पर आधारित समाज की स्थापना के लिए विश्व में पहली रक्तहीन क्रांति का नेतृत्व महात्मा गौतम बुद्ध ने किया तो प्रतिक्रांति के तहत पुष्यमित्र शुंग ने मनुस्मृति अनुशासन लागू करते हुए वर्ण व्यवस्था को पहले से मजबूत करने के लिए भारतीय समाज को जाति व्यवस्था के तहत हजारों टुकड़ों में बांट डाला। फिर भी बौद्धमय भारत की विरासत खत्म नहीं हुई और आर्यावर्त के भूगोल से बाहर बंगाल में ग्यारहवीं शताब्दी तक बौद्धकाल जारी रहा तो दक्षिण भारत में राजसत्ता और दैवीसत्ता को एकाकार करते हुए भव्य मंदिरों में केंद्रित चोल और पल्लव राजाओं के भक्ति आंदोलन को बौद्ध श्रमणों और जैन धर्म के अनुयायियों ने मनुस्मृति व्यवस्था के खिलाफ बहुजन आंदोलन में तब्दील कर दिया।

बंगाल, बिहार और ओडीशा में भी बड़े पैमाने पर जैन धर्म का प्रभाव रहा है।

इस्लामी शासन के अंतर्गत उत्तर भारत में सूफी संत आंदोलन ने मनुस्मृति विरोधी सामंतवाद विरोधी दैवीसत्ता विरोधी और राजसत्ता विरोधी बहुजन आंदोलन को समूचे भारत में धर्म जाति नस्ल की विविध बहुल विभिन्न संस्कृतियों के विलय की प्रक्रिया में बदल दिया जौ ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत के दौरान औद्योगीकरण और शहरीकरण के साथ जाति तोड़ो आंदोलन में तब्दील हो गयी।

आजादी के बाद वह जाति तोड़ो आंदोलन जाति मजबूत करो आंदोलन में बदल गया तो बहुजन आंदोलन का भी पटाक्षेप हो गया और जाति आधारित मनुसमृति व्यवस्था की बहाली के लिए धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सुनामी है और यही सुनामी म्यांमार में शुरु से चल रही है। जिसके शिकार रोहिंग्या मुसलमान हैं।

इसके विपरीत भारतीय इतिहास की प्रवाहमान धारा आर्य अनार्य द्रविड़ शक हुण कुषाण सभ्यताओं के एकीकरण के हजारों साल की भारतीय सभ्यता और संस्कृति है, जिसमें पठान और मुगल शासन काल में इस्लाम के सिद्धांतों का समावेश भी होता रहा जिसके तहत भारतीय जनमानस पर सूफी संत फकीर बाउल आंदोलन का इतना घना असर रहा है। इस इतिहास को बदलने के लिए धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सुनामी है।

रवींद्रनाथ शासकों के इतिहास के बदले भारतीय जन गण की इस सभ्यता और संस्कृति में देश और समाज को देखते थे। इसीलिए पश्चिम के पूंजीवादी साम्राज्यवादी और फासिस्ट नाजी राष्ट्रों के राष्ट्रवाद का विरोध करते थे और हम इसके बारे में मनुष्यता के धर्म और सभ्यता के संकट के संदर्भ में उऩके विचारों की चर्चा पहले ही कर चुके हैं। रवींद्रनाथ मानते थे कि पश्चिम का राष्ट्रवाद पूंजीवाद के निजी हितों को साधने का नस्ली राष्ट्रवाद है और भारत में विषमता की सामाजिक समस्या, असमानता, अन्याय और अस्पृश्यता की सामाजिक संरचना के लिए नस्ली वर्चस्व के इस राष्ट्रवाद का वे विरोध लगातार करते रहे।

अपने अंतिम निबंध में सभ्यता के संकट में भारत के भविष्य को लेकर वे इसीलिए चिंतित थे कि ब्रिटिश हुकूमत नस्ली राष्ट्रवादियों की सांप्रदायिक राजनीति के तहत राष्ट्रीयता के सिद्धांत के तहत भारत के विभाजन पर आमादा थे और सत्ता हस्तातंरण के बाद यूरोपीय राष्ट्रवाद की नकल के तहत भारत में नस्ली वर्चस्व के फासीवादी राष्ट्रवाद के दुष्परिणामों से वे भारत के भविष्य को लेकर चिंतित थे। हम इस पर चर्चा कर चुके हैं।

भारत में दैवीसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ भक्ति आंदोलन, सूफी संत आंदोलन, आदिवासी किसान विद्रोह और बाउल फकीर सन्यासी आंदोलन, चंडाल और बहुजन आंदोलनों की चर्चा हमने रवींद्र रचनाधर्मिता के तहत की है ताकि पश्चिमी राष्ट्रवाद के मुकाबले भारतीय इतिहास, सभ्यता और संस्कृति की साझा विरासत की जमीन पर रवींद्र के दलित विमर्श की प्रासंगिकता निरंकुश नस्ली वर्चस्व के फासीवादी राष्ट्रवाद की नरसंहारी संस्कृति के प्रतिरोध के सिलसिले में हम समझ सकें।

पश्चिम के इस राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि में धर्मयुद्धों का इतिहास है तो संस्कृतियों के युद्धों की निरतंरता है। पश्चिम का यह राष्ट्रवाद नस्ली वर्चस्व का राष्ट्रवाद है जिसका विकास धर्मयुद्धों के दौरान धर्मोन्मादी नस्ली वर्चस्व की दैवी सत्ता और राजसत्ता के पूंजीवादी तंत्र में बदलते जाने में हुआ जिसकी परिणति फासीवाद और साम्राज्यवाद में हुई। दक्षिण एशिया के भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास धर्मयुद्धों का इतिहास नहीं है और न यहां उस तरह के नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद का इतिहास कभी रहा है।

राष्ट्रीयता के सिद्धांत के जरिये भारत विभाजन के साथ भारत में नस्ली वर्चस्व के लिए पश्चिम के पूंजीवादी राष्ट्रवाद का आयात हुआ। भारत में भी संविधान के संघीय ढांचा को तोड़ते हुए पूजीवादी कारपोरेट एजंडे के तहत एक निरंकुश सर्वसत्तावादी सैन्य राष्ट्र का उदय हुआ जो सम्प्रभुता, केंद्रीकृत शासन और स्थिर भू-क्षेत्रीय सीमाओं के लक्षणों से सम्पन्न है। पश्चिम में धर्मयुद्धों के नतीजतन बने पश्चिमी राष्ट्रों की नकल के तहत दुनियाभर में आज के आधुनिक राज्य में भी यही ख़ूबियां हैं। इसीलिए पूरी दुनिया नस्ली फासिज्म के शिकंजे में है और दुनियाभर की आधी मनुष्यता धर्मोन्मादी राष्ट्रवादी आतंकवाद, पूजीवाद और साम्राज्यवाद के युद्धों गृहयुद्धों के कारण शरणार्थी है।

रोहिंग्या की पहचान को लेकर भी साफ समझ की कमी इतिहास के घालमेल की वजह से है। आखिर रोहिंग्या शब्द कहां से निकला?

इस बारे में रोहिंग्या इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द अरबी के शब्द रहमा अर्थात दया से लिया गया है और आठवीं शताब्दी ईसवी में जो अरब मुसलमान इस क्षेत्र में आये थे, उन्हें यह नाम दिया गया था जो बाद में स्थानीय प्रभाव के कारण रोहिग्या बन गया किन्तु दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इसका स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और उनका कहना है कि अरब मुसलमानों की पीढ़ीयां अराकान के तटवर्ती क्षेत्र में आबाद हैं जबकि रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान जाती है।

इसके मुक़ाबले में बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिंग्या शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य अर्थात 1950 के दशक से पहले कभी प्रयोग नहीं हुआ और इसका आशय वे पूर्वी बंगाल औऱ खास तौर पर चटगांव के बंगाली मुसलमान हैं जो अपना घर बार छोड़कर अराकान में आबाद हुए।

राष्ट्रपति थीन सेन और उनके समर्थक इस दावे को आधार बनाकर रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने से इन्कार कर रहे हैं।

उनका यह दावा गलत है। रोहिंग्या शब्द का प्रयोग अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रयोग होने का ठोस प्रमाण मौजूद है। बर्मा में अरब मुसलमानों के घुसने और रहने पर सभी सहमत हैं। उनकी बस्तियां अराकीन के मध्यवर्ती क्षेत्रों में हैं जबकि रोहिंग्या मुसलमानों की अधिकांश आबादी बांग्लादेश के चटगांव डिविजन से मिली अराकान के सीमावर्ती क्षेत्र मायो में आबाद है।

सामंती और पूंजीवादी हित में आधुनिक पश्चिमी राष्ट्रवाद है तो यह भारत के सत्ता वर्ग का कारपोरेट एजंडा भी है। ख़ुद को नेशन कह कर यह नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व का सत्तावर्ग डिजिटल सैन्य राष्ट्र के राजनीतिक राजनीतिक इस्तेमाल से अपने निजी और कारपोरेट हित साध सकता है। 

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