केरल में पीड़ित नहीं हमलावर हैं, संघ/भाजपा #RSSterror

क्या टाट के पर्दों से आंधियां रुक सकती हैं?...

क्या टाट के पर्दों से आंधियां रुक सकती हैं?

0 राजेंद्र शर्मा

आरएसएस को गोयबल्स का चेला गलत नहीं कहा जाता है। बड़ा झूठ सौ बार दुहराकर, लोगों से सच मनवाने के हिटलर के प्रचार मंत्री, गोयबल्स के कुख्यात सूत्र पर, आरएसएस और भाजपा समेत उसके चेला संगठन हर वक्त चलते देखे जा सकते हैं। केरल में कथित ‘‘लाल-जेहादी आतंक’’ का मुकाबला करने के नाम पर, भाजपा अध्यक्ष अमितशाह द्वारा छेड़ी गयी ‘‘जन सुरक्षा यात्रा’’ इसी का एक और सबूत है। इस बहुप्रचारित यात्रा में संघ-भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। चार-चार राज्यों के भाजपायी मुख्यमंत्रियों और आधे दर्जन से ज्यादा केंद्रीय मंत्रियों को इस मुहिम में केरल में उतारा जाना इसी की ओर इशारा करता है। दूसरी ओर, इस मुहिम को देशभर में फैलाने की कोशिश में, भाजपा अध्यक्ष ने अपने कार्यकर्ताओं को सभी राज्यों की राजधानियों में सीपीएम कार्यालयों पर प्रदर्शन करने का निर्देश दिया है। राजधानी दिल्ली में सीपीएम केंद्रीय कार्यालय पर, उक्त यात्रा के दौरान दस दिन लगातार, प्रदर्शन का अभूतपूर्व आह्वïान किया गया है।

साफ है कि सीपीएम और केरल की उसकी एलडीएफ सरकार, इस मुहिम के निशाने पर हैं। आरएसएस-भाजपा, पूरे देश को यह समझाने की कोशिशों में लगे हुए हैं कि उनके कार्यकर्ता केरल में और वामपंथ की महत्वपूर्ण उपस्थिति वाली दूसरी जगहों पर भी, लगातार कम्युनिस्टों की ‘लाल हिंसा’ के शिकार हो रहे हैं, कि वामपंथी प्रभाववाले इलाकों में उनके प्रभाव का विस्तार रोकने के लिए, उनके खिलाफ व्यवस्थित रूप से हिंसा का प्रयोग किया जा रहा है, आदि। बेशक, यह प्रचार कोई नया नहीं है। फिर भी, केरल के पिछले विधानसभाई चुनाव में एलडीएफ की जीत के बाद से इस अभियान को बहुत तेज कर दिया गया है। सभी जानते हैं कि केरल अगर आजादी के बाद से ही वामपंथ का गढ़ बना रहा है तो दूसरी ओर उसके दरवाजे आरएसएस और उसके राजनीतिक बाजुओं के अब तक बंद ही रहे हैं। फिर भी आरएसएस, कम से कम चार दशकों से हिंदू धार्मिक संगठनों के कंधे पर सवार होकर और लगभग आधी अल्पसंख्यक आबादी वाले इस राज्य में सांप्रदायिक प्रचार के जरिए, अपना ताना-बाना फैलाने की कोशिशों में लगा रहा है। राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए वह अपने सांप्रदायिक प्रभाव के गिर्द, छोटे-छोटे जातिवादी हिंदू संगठनों को गोलबंद करता आया है। इसी क्रम में वह कई बार अल्पसंख्यक समूहों से और उससे भी बढक़र राजनीतिक-विचारधारात्मक रूप से अपने सबसे कट्टïरविरोधी, कम्युनिस्टों से हिंसक झड़पों में भी शामिल रहा है।

बहरहाल, पिछले विधानसभाई चुनाव के बाद से केरल में परिस्थिति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। इससे पहले, 2014 के आम चुनाव में देश भर में अपनी सफलता के साथ ही भाजपा केरल में अपना खाता न खोल पाने के बावजूद, अपने मत फीसद में ध्यान देने लायक बढ़ोतरी करने और पहली बार एक अंक की देहली लांघने में कामयाब रही थी। उसके बाद से केंद्र में मोदी सरकार की मौजूदगी से और उत्साहित आरएसएस-भाजपा ने विधानसभाई चुनाव में बड़ी कामयाबी के लिए बहुसंख्यक सांप्रदायिकता तथा जातिवाद के मेल समेत सभी तिकड़में ही नहीं आजमायी थीं, सीपीएम का प्रमुख आधार माने जाने वाले, निचली जाति के एझवा समुदाय में सेंध लगाने की उम्मीद में, एसएनडीपी योगम से जुड़े राजनीतिक संगठन, भारत धर्म जागरण सेना के साथ गठजोड़ भी किया था। संघ-भाजपा के दुर्भाग्य से और केरल के सौभाग्य से सारी कोशिशों के बावजूद, इस चुनाव में भी भाजपा को केरल विधानसभा में पहली बार प्रवेश पाने से ज्यादा सफलता नहीं मिली।

अपनी उम्मीद के अनुसार कामयाबी नहीं मिलने की आरएसएस-भाजपा की हताशा ने ही केरल में राजनीतिक हिंसा के मौजूदा चक्र की शुरूआत करायी है। यह शुरूआत हुई, मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र, पिनरायी में चुनाव नतीजे की घोषणा के बाद निकल रहे विजय जुलूस पर आरएसएस के हमले से, जिसमें सीपीएम कार्यकर्ता रवींद्रनाथ की मौत हुई थी। उसके बाद से चले हिंसा और प्रतिहिंसा के चक्र में अब तक ही आरएसएस के हमलों में सीपीएम के 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो चुकी है और 250 कार्यकर्ता घायल हुए हैं। इसके अलावा आरएसएस के लोगों ने सीपीएम और उसके जनसंगठनों के 60 कार्यालयों पर और 165 पार्टी कार्यकर्ताओं के घरों पर हमले किए हैं। साफ है कि भाजपा-आरएसएस द्वारा पेश की जा रही केरल की राजनीतिक हिंसा की यह कहनी पूरी तरह से झूठी है कि आरएसएस-भाजपा कार्यकर्ता ‘लाल आतंक’ के निर्दोष शिकार हैं और सीपीएम उनकी हत्याएं कर रही है। सीपीएम महासचिव, सीताराम येचुरी का यह कहना गलत नहीं है कि संघ-भाजपा का यह प्रचार, उल्टा चोर कोतवाल का डांटे का ही उदाहरण है।     

आरएसएस-भाजपा हिंसा की पहल करने, उसे अपने विस्तार के हथियार के तौर पर आजमाने और सुनियोजित व सुव्यवस्थित तरीके से हिंसा करने के लिए जिम्मेदार अवश्य हैं। इसी का नतीजा है कि केरल पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2000 से 2017 तक राज्य में राजनीतिक हिंसा में अगर आरएसएस के 65 लोग मारे गए हैं, तो सीपीएम के 85 कार्यकर्ता मारे गए हैं। और आरएसएस के लिए ऐसा रिकार्ड स्वाभाविक है, जो अपनी स्थापना के समय से ‘हिंदुओं के सैन्यीकरण’ के आदर्श का हामी रहा है और जिसकी गतिवधियों में आज भी शस्त्र पूजन से लेकर, शस्त्र प्रशिक्षण तक का महत्वपूर्ण स्थान है। इसीलिए, यह भी अचरज की बात नहीं है कि केरल में आरएसएस कार्यालयों में बहुत बार बम व अन्य हथियार पकड़े गए हैं। इसी 8 जून को केरल में ही कोडियरी में आरएसएस के ठिकानों पर बड़ी संख्या मे बम पकड़े गए थे और उसी महीने की 10 तारीख को पय्यान्नूर में आरएसएस के कार्यालय से हथियारों का बड़ा जखीरा पकड़ा गया था।

फिर भी याद रहे कि भाजपा-आरएसएस की मुहिम सिर्फ ‘लाल आतंक’ के खिलाफ नहीं है। इसमें लाल से साथ जिस तरह ‘जेहादी’ को भी जोड़ दिया गया है, वह महत्वपूर्ण है। देश की सत्ताधारी पार्टी का जेहाद के साथ कम्युनिस्टों का संबंध जोडऩा सिर्फ निराधार ही नहीं है बल्कि सरासर गैर-जिम्मेदराना है। लेकिन, अपने खिलाफ लाल आतंक का शोर मचाकर और कम्युनिस्टों को आक्रांता बताकर वे शेष देश में तो वामपंथ के प्रभाव को कुछ फीका करने की उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन केरल की जनता तो उनके ‘निर्दोष हिंसा के शिकार’ के स्वांग से प्रभावित होने से रही। इसीलिए, लाल के साथ ‘जेहादी’ जोड़ दिया गया है, ताकि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की अपनी आजमायी हुई दुहाई को दूसरे हाथ से पकड़े रह सकें।

जाहिर है कि केरल में संघ-भाजपा इसी दुहाई के सहारे आगे बढऩे की उम्मीद कर सकते हैं, न कि कम्युनिस्ट सरकार की नीतियों या व्यवहार की कोई आलोचना पेश करने के जरिए। इसीलिए, अमित शाह की यात्रा में सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, योगी आदित्यनाथ को ही बुलाया जाता है, जिनकी पहचान सबसे बढक़र उग्र हिंदुत्ववादी की है। और यह भी संयोग ही नहीं है कि योगी आदित्यनाथ केरल में पहुंचकर ‘लव जेहाद’ का राग छेड़ते हैं और एलडीएफ सरकार की इसे रोकने में विफल रहने के लिए आलोचना करते हैं। संघ-भाजपा को अंतत: सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ही सहारा है।

लेकिन, कथित ‘लाल जेहादी आतंक’  के खिलाफ संघ-भाजपा के जबर्दस्त अभियान की टाइमिंग भी महत्वपूर्ण है। जानकारों के मुताबिक इसे हाई पिच अभियान बनाने का फैसला, अगस्त के महीने हुई आरएसएस-भाजपा समन्वय बैठक में लिया गया था। याद रहे कि यह वही समय है जब नोटबंदी की विफलता से लेकर जीएसटी की तकलीफों तक और आर्थिक वृद्घि दर गिरने से लेकर, रोजगार में कमी तक, आम जनता की जिंदगी के लिए बुरी खबरें आ रही थीं। एक के बाद एक राज्य में किसान उपयुक्त एमएसपी तथा ऋण माफी की मांगों को लेकर मैदान में उतर रहे थे। छोटे कारोबारी आंदोलित थे। मजदूर और कर्मचारी आंदोलन की हूंकारें भर रहे थे। संक्षेप में यह कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर जनता के असंतोष का पारा चढ़ रहा था। जनता के इस बढ़ते असंतोष को मोदी सरकार और भाजपा के राजनीतिक विरोध की आवाज बनने से रोकने के लिए, वामपंथ को कमजोर करने की कोशिश करना खासतौर पर जरूरी था। आखिरकार अब, जब ज्यादातर विपक्षी पार्टियों को या तो सत्ता पक्ष द्वारा साधा जा चुका है या सीबीआइ केसों समेत तरह-तरह के मामलों में उलझाया जा चुका है, उन्हेें वामपंथ से ही खास खतरा है जिसकी आवाज राजनीतिक-वैचारिक रूप से प्रखर भी है और आम जनता के बीच उसकी अनुगूंज भी है। इसीलिए, आज वामपंथ पर यह हमला है। पर क्या टाट के पर्दों से आंधियां रुक सकती हैं?                                                                               0

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