मॉब लिंचिंग की ही अगली कड़ी है चुटिया कटने वाली अफवाह

यह सिर्फ अफवाह नहीं है, यह अफवाह और शरारतपूर्ण कार्रवाई के मेल से बना हुआ नुस्खा है। चुटिया कटने वाली अफवाह का मामला हमें बेहद छोटा और क्षुद्र लग सकता है। लेकिन यह मॉब लिंचिंग की ही अगली कड़ी है।...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

चुटिया कटने वाली अफवाह का मामला हमें बेहद छोटा और क्षुद्र लग सकता है। लेकिन यह मॉब लिंचिंग की ही अगली कड़ी है। ऐसी अफवाहें भी आम लोगों की सोचने की ताकत हर लेती हैं, उनके दिमाग पर कब्जा कर लेती हैं और फिर उसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकती हैं। अफवाहों का इस्तेमाल करने वाला जानता है कि आम लोगों को किस तरह भीड़ में बदलना है।

चीन से तनाव और चुटिया कटने का खौफ

बाल मुकुंद

आजकल रोजाना अखबारों यह देखना क्या अजीब नहीं लगता कि जिस समय देश चीन के साथ डोकलाम की सड़क को ले कर उलझा हुआ है, कश्मीर में हमारे जवान पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से जूझ रहे हैं, कैग कह रहा है कि हमारे पास दस दिनों तक युद्ध लड़ने का भी गोला बारूद नहीं है, बाजार जीएसटी के साथ तालमेल बिठाने में लगा है और संसद नए उपराष्ट्रपति के स्वागत की तैयारियां कर रहा है, अचानक कुछ इलाकों में औरतों की चोटियां कटने लगी हैं।

जब अचानक जादू के जोर से पैदा हुई कोई भीड़ किसी व्यक्ति की पिटाई करती है, तो पीड़ित व्यक्ति किसी पार्टी का कार्यकर्ता निकल आता है। जब मामला लड़का लड़की के प्यार का होता है, तो वह हिंदू या मुसलमान हो जाता है। और मरे हुए जानवर के लिए हिंसा होती है तो वह दलितों से जुड़ जाती है। लेकिन जिनकी चुटिया कट रही है, वे सिर्फ औरतें हैं। कम पढ़े लिखे और कमजोर आय वर्ग की औरतें। उनके मामले में किसी पार्टी, संप्रदाय या जाति बिरादरी की बात नहीं की जा रही है।

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यह भी अजीब है कि अभी तक किसी भी राज्य या केंद्र सरकार ने इस मामले में किसी तरह का आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। किसी भी सांसद या विधायक ने इलाके में जा कर अपने वोटरों को आश्वस्त करने का प्रयास नहीं किया है कि हम आपको सुरक्षा प्रदान करेंगे, मामले की जांच करेंगे और दोषियों को उचित सजा देंगे। जेएनयू से ले कर आईआईटी और इसरो तक  किसी भी वैज्ञानिक सोच वाली संस्था ने उन जगहों पर अपनी कोई टीम नहीं भेजी है और न ही घबराई हुई आबादी को समझाने का ही कोई प्रयास किया है। ये सब जनता द्वारा दिए गए टैक्स से ही अपना वेतन पाते हैं।

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यह सिर्फ अफवाह नहीं है, यह अफवाह और शरारतपूर्ण कार्रवाई के मेल से बना हुआ नुस्खा है। हो सकता है कि कुछ औरतों ने किन्हीं भी कारणों से अपने बाल खुद काट लिए हों। हो सकता है कि कुछ लोगों ने आपसी झगड़े या द्वेष के कारण उनके बाल काटे हों। जहां वीर युवक ‘मेरी नहीं तो किसी की नहीं’ का जय घोष करते हुए चेहरे पर एसिड फेंक सकते है, वहां बाल काट देना कोई मुश्किल काम नहीं है। लेकिन यह भी तो हो सकता है कि कुछ लोग दहशत फैलाने के लिए यह काम कर रहे हों। इसके लिए वे किसी केमिकल वगैरह का इस्तेमाल करते हों। जिस सफाई से जेबकतरे जेब काटते हैं, उसे सफाई से बालों पर वह केमिकल लगा देते हों।

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यह कतई संभव है कि ऐसे दो चार कारनामे उन लोगों ने किए हों, उसकी आड़ में दो चार लोगों ने अपनी दुश्मनी निकाल ली हो और उसका फायदा उठा कर कुछ ने अपने बाल खुद काट लिए हों। बाल का कटना महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि इस अफवाह से लोगों में दहशत पैदा की जा रही है।

यह भी अजीब है कि जो प्रबुद्ध समाज अराजक हो रहे सोशल मीडिया को ले कर इतना चिंतित रहता है, वह अफवाहों के इस मध्यकालीन औजार के इस्तेमाल पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा। अभी तक तो इस मुद्दे पर किसी स्टार फिगर की कोई टिप्पणी देखने को नहीं मिली है। जो सरकारी मशीनरी फेसबुक और ह्वाटसऐप पर आने वाले बेलगाम कमेंट्स की लगाम थामने के लिए नए कानून बना रही है, वह भी ऐसी अफवाहों पर उद्वेलित नजर नहीं आ रही है।

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अफवाहें हमेशा मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए और व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने के लिए फैलाई जाती हैं। यह व्यवस्था सिर्फ सरकारी व्यवस्था नहीं होती, वह सामाजिक रिश्तों की, जातीय तानेबाने की, अलग अलग तरह के मानवीय समूहों की कोई भी, कैसी भी व्यवस्था हो सकती है। इसीलिए फैक्टरी में हड़ताल के समय उसे तोड़ने के लिए या कामगारों को उत्तेजित करने के लिए भी अफवाहें फैलाई जाती हैं।

चुटिया कटने वाली अफवाह का मामला हमें बेहद छोटा और क्षुद्र लग सकता है। लेकिन यह मॉब लिंचिंग की ही अगली कड़ी है। ऐसी अफवाहें भी आम लोगों की सोचने की ताकत हर लेती हैं, उनके दिमाग पर कब्जा कर लेती हैं और फिर उसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकती हैं। अफवाहों का इस्तेमाल करने वाला जानता है कि आम लोगों को किस तरह भीड़ में बदलना है।

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