सबरीमाला : उच्चतम न्यायालय का फैसला तो बहाना है, एलडीएफ का शासन असली निशाना है

सबरीमाला : सांप्रदायिक गोलबंदी बनाम स्त्री अधिकार... एक महीने में ही अपने उदार चेहरे पर पानी फेर लिया संघ ने ......

सबरीमाला : उच्चतम न्यायालय का फैसला तो बहाना है, एलडीएफ का शासन असली निशाना है

सबरीमाला : सांप्रदायिक गोलबंदी बनाम स्त्री अधिकार

राजेंद्र शर्मा

सबरीमला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की इजाजत देने के उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरोध के नाम पर, आरएसएस-भाजपा जोड़ी आज जैसा खुला सांप्रदायिक खेल खेल रही है, उस पर शायद ही किसी को आश्चर्य होगा। महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में देश के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ वे धार्मिक परंपराओं की दुहाई दे रहे हैं और ‘हिंदू धर्म खतरे में’ बता रहे हैं। पर उनका मकसद शुद्ध राजनीतिक है--देश के दक्षिणी छोर पर स्थित इस राज्य में अपने पांव फैलाना, जहां अपनी स्थापना के बाद साढ़े तीन दशक से ज्यादा की कोशिशों के बाद, भाजपा पहली ही बार विधानसभा में अपना खाता खोलने में कामयाब हुई है। उच्चतम न्यायालय का फैसला तो बहाना है, एलडीएफ का शासन असली निशाना है।

एक महीने में ही अपने उदार चेहरे पर पानी फेर लिया संघ ने

आरएसएस के सरसंघचालक, मोहन भागवत ने आज से मुश्किल से महीना भर पहले, राजधानी के विज्ञान भवन के अपने तीन दिन के व्याख्यान के जरिए, आरएसएस का और प्रकारांतर से भाजपा का भी, उदार चेहरा दिखाने की जो कोशिश की थी, उस पर उन्होंने जितनी तत्परता से पानी फिरने दिया है, वह दो-तीन चीजें दिखाता है।

पहली तो यही कि उदारता, जनतांत्रिकता, संविधान में विश्वास आदि के सतही दिखावे अपनी जगह, संघ परिवार एक सांप्रदायिक, जनतंत्रविरोधी, दकियानूसी ताकत है और रहेगा।

दूसरी, अपनी सांप्रदायिक गोलबंदी को आगे बढ़ाने के जरा से भी मौके के लिए, उन्हें अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अपनाए गए इन मुखौटों को त्यागने में रत्तीभर हिचक नहीं होगी।

तीसरी यह कि मोदी के माध्यम से देश की सत्ता तक अपनी पहुंच के लिए संघ परिवार, आज वाकई गंभीर खतरा महसूस कर रहा है और इसलिए केरल जैसे राज्यों में और जाहिर है कि शेष देश भर में भी, अपने पांव फैलाने के छोटे से छोटे मौके को भुनाने के लिए, शब्दश: कुछ भी करने से पीछे नहीं हटेगा।

कांग्रेस का अंध-कम्युनिज्मविरोध संघ के सबरीमला बचाओ’ के नारे के साथ

आश्चर्यजनक तो नहीं फिर भी विचित्र है कि केरल की कांग्रेस इकाई भी, अपने अंध-कम्युनिज्मविरोध का प्रदर्शन करते हुए, ‘सबरीमला बचाओ’ के नारे के साथ, आरएसएस-भाजपा की इस मुहिम का साथ दे रही है। यह तब है जबकि राष्ट्रीय पैमाने पर कांग्रेस ने, उच्चतम न्यायालय के उक्त निर्णय को एक ‘प्रगतिशील तथा दूरगामी’ फैसला बताया था और उसका ‘तहेदिल से स्वागत’ करने का एलान किया था। जाहिर है कि यह अवसरवादी पैंतरा इस बचकानी उम्मीद में चला जा रहा लगता है कि धर्म के नाम पर वोटों की जो बारिश होगी, उसमें भाजपा से ज्यादा उसकी चादर भर जाएगी। यह लालच और अवसरवाद एक बार फिर उसकी गति न खुदा ही मिला न बिसाले सनम वाली कराने जा रहा है।

सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश : मूलतः सभी धर्म पितृसत्तात्मक हैं

दूसरी ओर सी पी आइ (एम) ने, उसके नेतृत्व में एलडीएफ ने और उसकी केरल सरकार ने, उच्चतम न्यायालय के उक्त निर्णय का दो-टूक शब्दों में स्वागत ही नहीं किया है, उसे लागू कराने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का संकल्प भी जताया है। हां! इसके बावजूद उन्होंने इतना जरूर साफ कर दिया है कि वे न तो इस मुद्दे पर श्रद्धालुओं से अनावश्यक टकराव चाहते हैं और न नयी परंपरा कायम करने के लिए कोई मुहिम चलाना चाहते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने मोटे तौर पर दस से पचास वर्ष तक (मासिक धर्म) की आयु की महिलाओं के अयप्पा मंदिर में घुसने पर लगी पाबंदी को खत्म कर दिया और अब श्रद्धालु महिलाएं इसका निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं कि वे इस मंदिर में जाना चाहती हैं या नहीं जाना चाहती हैं। सरकार जिस तरह से यह सुनिश्चित करेगी कि जाना चाहने वाली महिलाओं को रोका नहीं जाए, उसी तरह से यह भी सुनिश्चित करेगी कि नहीं जाना चाहने वाली महिलाओं को मंदिर में जाने के लिए मजबूर नहीं किया जाए।

सीधे-सादे शब्दों में यह महिलाओं के बराबरी के जनतांत्रिक अधिकार का प्रश्न है।

उच्चतम न्यायालय ने, स्त्री की प्राकृतिक विशेषता पर आधारित उक्त रोक को, महिलाओं के बराबरी के अधिकार का उल्लंघन माना है, जिसकी इजाजत भारत का संविधान नहीं देता है। दूसरी ओर, उक्त रोक के पक्ष में दी गयी हिंदू धार्मिक परंपरा की दलीलों को उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि यह रोक, कोई हिंदू धार्मिक आचार/ परंपरा का अरिहार्य हिस्सा नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसके न होने से हिंदू धर्म खतरे में पड़ जाएगा, जिसके नाम पर आज केरल में उन्माद जगाने की कोशिशें की जा रही हैं।

भयावह तथा अतिवादी हैं उन्माद जगाने की ये कोशिशें

उन्माद जगाने की ये कोशिशें कितनी भयावह तथा अतिवादी हैं, इसका अंदाजा केरल में कोल्लम में, इसी मुद्दे पर आयोजित एक विरोध रैली में अभिनेता से भाजपा नेता बने, कोल्लम तुलसी के आह्वान से लगाया जा सकता है, जिसके लिए बाद में उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला भी दर्ज हुआ है।

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2016 के विधानसभाई चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार रहे तुलसी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद अगर कोई स्त्री सबरीमाला जाती है, तो उसके दो टुकड़े कर के एक टुकड़ा दिल्ली भेज देना चाहिए और दूसरा टुकड़ा तिरुअनंतपुरम में मुख्यमंत्री विजयन के कार्यालय के सामने फेंक देना चाहिए!

याद रहे कि तुलसी ने यह बात भाजपा के राज्य अध्यक्ष की मौजूदगी में ही नहीं कही, बाद में इस सभा को भाजपा राज्य अध्यक्ष ने संबांधित भी किया। लेकिन उन्होंने, इस तालिबानी फरमान से खुद को अलग करने तक की जरूरत नहीं समझी।

बहरहाल, धार्मिक परंपरा की अपरिहार्यता की बहस से अलग, मूल मुद्दा यह है कि संविधान की स्त्री और पुरुष के बीच समानता की बुनियादी व्यवस्था के ही नकारे जाने की, इस देश के जनतांत्रिक संविधान के अंतर्गत इजाजत नहीं दी जा सकती है।

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पुन:, इस कथित परंपरा का एक और पहलू भी महत्वपूर्ण है, जिसकी ओर बहुमत के निर्णय के साथ होते हुए भी, अपने अलग निर्णय में न्यायमूर्ति डी वाइ चंद्रचूड़ ने प्रमुखता से ध्यान खींचा है। उन्होंने मासिक धर्म की आयु की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक को, निचली जातियों या अछूतों के मंदिर में प्रवेश पर लगी रही रोक के साथ जोडक़र देखा है। वह ध्यान दिलाते हैं कि इस तरह की सभी रोकें, शुद्धता-अशुद्धता की ऐसी धारणाओं पर आधारित हैं, जो निचली जातियों तथा महिलाओं को निचला दर्जा देती हैं और उन्हें बाहर रखती हैं। उनका निष्कर्ष था कि, ’मासिक धर्म की आयु के आधार पर महिलाओं का सामाजिक बहिष्कार, अस्पृश्यता का ही एक रूप है और यह संवैधानिक मूल्यों के लिए अभिषाप है।’

भाजपा-आरएसएस अगर उच्चतम न्यायालय के उक्त निर्णय के विरोध की आड़ में, खुद को हिंदू मानने वालों को अपने पीछे गोलबंद करने का मौका देखकर दल-बल के साथ कूद पड़े हैं, तो इस पर शायद ही किसी को अचरज हुआ होगा। उल्टे यह तो इसी का सबूत है कि संघ परिवार मूलत: अल्पसंख्यक विरोधी होने के साथ ही साथ, दलितविरोधी तथा स्त्रीविरोधी भी है। इसी संदर्भ में यह भी दिलचस्प है कि 2016 में आरएसएस ने यह रुख अपनाया था कि महिलाओं के सभी मंदिरों में प्रवेश की छूट होनी चाहिए। यहां तक कि उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय आने के फौरन बाद, केरल में आरएएस के प्रमुख गोपालनकुट्टी ने तो यह एलान भी कर दिया था कि संघ, अदालत के इस निर्णय का आदर करेगा। लेकिन, केरल में उसके राजनीतिक बाजू, भाजपा ने राजनीतिक लाभ का मौका देखकर, उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ जंग का एलान कर दिया और आरएसएस ने यह कहते हुए पांव पीछे खींच लिए कि, करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

सबरीमाला मंदिर विवाद और घिसी पिटी परम्पराएं

बहरहाल, इस प्रतिगामी स्त्रीविरोधी मुहिम को केरल की जनता का बहुत समर्थन मिलने वाला नहीं है। केरल का सामाजिक-धार्मिक सुधारों का लंबा इतिहास है और इसमें निचली जातियों के मंदिरों में प्रवेश के मुद्दे पर राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान छेड़े गए, वैकोम तथा गुरुवयूर के गौरवशाली आंदोलन भी शामिल हैं, जिनके दबाव में अनेक धार्मिक परंपराएं बदली थीं।

इतना ही नहीं, केरल में जनतांत्रिक व प्रगतिशील मूल्यों तथा वामपंथी राजनीति की जनता के बीच गहरी पैठ है। अब जबकि सी पी आइ (एम) के नेतृत्व में एलडीएफ, इस मुहिम के खिलाफ बड़े पैमाने पर राज्य की जनता को गोलबंद करने के लिए मैदान में उतर पड़ा है, स्त्रीविरोधी प्रतिगामी परंपराओं की इस दुहाई की हार तय है।

इस मुहिम पर राज्य में एनडीए में फूट पड़ जाना, एडवा समुदाय के संगठन एसएनडीपी व पुलया महासभा का इस मुहिम से खुद को अलग करना तथा सी के जानू के नेतृत्व वाले आदिवासियों के संगठन का एनडीए से नाता ही तोड़ लेना तो शुरूआत भर है।

हां! इस घटनाक्रम ने शुरूआत में ही इस ब्राह्मणवादी मुहिम से वंचितों को अलग कर दिया है। इस सबके बीच तीन तलाक के मुद्दे पर संघ परिवार की अति-तत्परता की भी कलई खुल गयी है--यह मुस्लिम महिलाओं के हितों की चिंता का नहीं, समूचे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने का ही मामला है।                                              

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