पटेल को पूजकर क्या संघ हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्रवाद को भूलने को तैयार है ?

संघ परिवार और मोदी बेहूदे तर्क दे रहे हैं कि पटेल किसी दल की थाती नहीं हैं वे हमारे स्वाधीनता संग्राम के नायक हैं और वे सबके हैं। इनसे कोई पूछे कि जब स्वाधीनता संग्राम चल रहा था तो संघ कहाँ सोया था...

हाइलाइट्स

सरदार बल्लभ भाई पटेल ने देश से जो कहा है उस पर कम से कम मोदी और संघ परिवार जरुर ध्यान दे - "यह हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह यह अनुभव करे की उसका देश स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्तव्य है. हर एक भारतीय को अब यह भूल जाना चाहिए कि वह एक राजपूत है, एक सिख या जाट है. उसे यह याद होना चाहिए कि वह एक भारतीय है और उसे इस देश में हर अधिकार है पर कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। "।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

मोदी को गांधी की हत्या से पहले वाला पटेल पसंद है। उस समय सरदार बल्लभ भाई पटेल की मुसलमानों के प्रति जो मनोदशा थी खासकर भारत विभाजन के बाद हुए दंगों के समय , मोदी को वह पटेल बार बार अपील करता है।

पटेल का दंगों के समय मुसलमानों के प्रति सही रवैय्या नहीं था। अब्दुल कलाम आजाद ने जो उस समय मंत्री थे अपने संस्मरणों में उसका सुंदर ज़िक्र किया है।

विभाजन के बाद दिल्ली में संघ मुसलमानों को नेस्तनाबूद करने पर आमादा था। पटेल उस समय एकदम संघ के मूक दर्शक बने हुए थे। उस समय प्रचार कराया गया कि मुस्लिम मुहल्लों में भयंकर हथियार पाए गए हैं और यह पटेल के इशारों पर किया गया।

यह भी कहा गया कि अगर हिन्दुओं और सिखों ने पहले हमला न किया होता तो मुसलमानों ने उन्हें साफ़ कर दिया होता। पुलिस ने कुछ हथियार करोलबाग और सब्जी मंडी से बरामद किए थे। सरदार पटेल के हुक्म से वे सभी हथियार सरकारी भवन में लाए गए और उस कमरे के सामने रखे गए जो मंत्रिमंडल की मीटिंग के लिए तय था। जब मंत्रिमंडल के सब सदस्य इकट्ठा हो गए तो सरदार पटेल ने प्रस्ताव किया कि पहले इन हथियारों को देख लिया जाय।

मंत्रियों ने वहाँ जाकर देखा।

मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने लिखा है - "वहाँ जाने पर हमने मेज पर रसोईघर की दर्जनों जंगलगी छुरियां देखीं जिनमें बहुतों की मूठ नदारत थी। हमने लोहे की खूंटियां देखीं जो पुराने घरों की चहारदीवारियों में पाई गंई थी और देखे कास्ट आयरन के पानी के कुछ पाइप। सरदार पटेल के अनुसार ये वे हथियार थे जिन्हें दिल्ली के मुसलमानों ने हिन्दुओं और सिखों को खत्म करने के लिए इकट्ठा किया था।

लार्ड माउंटबेटन ने एक दो छुरियां उठाईं और मुस्कराकर बोले : जिन्होंने यह सामान इकट्ठा किया है अगर वे यह सोचते हैं कि दिल्ली शहर पर इनसे कब्जा किया जा सकता है तो मुझे लगता है कि उन्हें फौजी चालों का अद्भुत ज्ञान है। "

संघ परिवार के लोग और मोदी बेहूदे तर्क दे रहे हैं कि पटेल किसी दल की थाती नहीं हैं वे हमारे स्वाधीनता संग्राम के नायक हैं और वे सबके हैं।

इन भले मानुषों से कोई पूछे कि जब स्वाधीनता संग्राम चल रहा था तो संघ कहाँ सोया हुआ था ?

जब देश को जगाने और संघर्ष करने की जरुरत थी तब संघ हिन्दूओं को जगाने में लगा था और साम्प्रदायिक एजेण्डे के लिए काम कर रहा था।

कम से कम संघ परिवार के नेताओं के मुखकमल से भारत का स्वाधीनता संग्राम शब्द सुनने में अटपटा लगता है। जब जंग थी तब वे भागे हुए थे अब स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों के वारिस क्यों होना चाहते हैं ? यह असल में संघ परिवार की नकली सेनानी बनने की वर्चुअल कोशिश है।

सरदार बल्लभ भाई पटेल ने देश से जो कहा है उस पर कम से कम मोदी और संघ परिवार जरुर ध्यान दे - "यह हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह यह अनुभव करे की उसका देश स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्तव्य है. हर एक भारतीय को अब यह भूल जाना चाहिए कि वह एक राजपूत है, एक सिख या जाट है. उसे यह याद होना चाहिए कि वह एक भारतीय है और उसे इस देश में हर अधिकार है पर कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। "।

क्या संघ हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्रवाद को भूलने को तैयार है ?

पटेल जब मरे तो उनके बैंक खाते में मात्र 345 रुपये जमा थे। वे मूर्तिपूजा और व्यक्तिपूजा के सख्त विरोधी थे। वे विचारों और कर्म से धर्मनिरपेक्ष थे।

 

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