हैं  ''साहेब'' बड़े अज़ीज़ सारे ही महफ़िलों में/ पर सबके सामने झूठ  बोलना आसाँ नहीं होगा 

जो चुनरी थी अब तक, चिंगारी बन चुकी है यहाँ  बच्चियों पे अब और ज़ुल्म ढाना आसाँ नहीं होगा 

अतिथि लेखक
Updated on : 2018-07-23 22:31:50

सलिल सरोज

मेरी यादों से उसका जुदा होना आसाँ नहीं होगा

जिस्म से रूह का अलग होना आसाँ नहीं होगा

हैं ''साहेब'' बड़े अज़ीज़ सारे ही महफ़िलों में

पर सबके सामने झूठ बोलना आसाँ नहीं होगा

जो चुनरी थी अब तक, चिंगारी बन चुकी है यहाँ

बच्चियों पे अब और ज़ुल्म ढाना आसाँ नहीं होगा

हर मकान के ईंटों में खून भी चुनवाया होता है

गाँव का रातों-रात शहर बनना आसाँ नहीं होगा

वहशतों की बस्ती में ज़ुल्म का मज़मा लगा है

ऐसे दौर में खुद को इंसां कहना आसाँ नहीं होगा

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