फर्जी मुठभेड़ें : घृणित जातिगत कहावतों को हकीकत में तब्दील करती योगी की पुलिस

फर्जी मुठभेड़ों में पैर में गोली मारकर "अहीर, गड़ेरिया, पासी चोर। धत सारे के तगड़ी तोर" जैसी घृणित जातिगत कहावतों को हकीकत में तब्दील करती योगी की पुलिस...

फर्जी मुठभेड़ों में पैर में गोली मारकर "अहीर, गड़ेरिया, पासी चोर। धत सारे के तगड़ी तोर" जैसी घृणित जातिगत कहावतों को हकीकत में तब्दील करती योगी की पुलिस

राजीव यादव

आज साथी शरद जायसवाल के साथ पिछले दिनों सरायमीर में फर्जी मुठभेड़ में पैर में गोली मारे गए अजय यादव के घर के हालात को और उनके मां-बाप की निरीहिता को देखते हुए बचपन की गली-मोहल्ले की ये घृणित कहावत जेहन में आ गई।

गैर बराबरी वाले जिस समाज ने ये कहावतें रची वो आज सत्ता में आने के बाद पुलिस की नाल से अपनी घृणित मानसिकता से वंचित समाज के लड़कों के पैर में गोली मरवाकर 'तगड़ी तोर' की अपनी कुंठा को पूरा कर रहा है।

पुलिसिया कहानी है कि अजय यादव को सरायमीर थाने में पिछले दिनों उस वक़्त मुठभेड़ का दावा करते हुए पुलिस ने पैर में गोली मारी जब वो पकड़ कर लाया गया था। कागजी कार्रवाई हो ही रही थी कि वो भागने की कोशिश में थाने की दीवार फांद गया और मोजे से तमंचा निकालकर गोली चलाने लगा। जिस पर पुलिस की जवाबी गोली में उसको पैर में गोली लगी और उसे गिरफ्तार किया गया।

पैर में बोरी बांधकर गोली मारने वाली पुलिस की हकीकत तो जगजाहिर है पर थाने में कागजी कार्रवाई के वक्त मोजे से तमंचा निकालने की बात पचती नहीं।

गवाह की अनुपलब्धता और खुद की जामातलाशी लेकर गिरफ्तार करने वाली पुलिस कैसे गिरफ्तार की कि वह तमंचा लेकर थाने में आ गया ?

और ऐसा हुआ तो क्या इस गैरजिम्मेदारना पुलिस के व्यवहार को लेकर पुलिस पर कोई कार्रवाई की गई ?

खैर योगी सरकार की फर्जी मुठभेड़ों की हकीकत जग जाहिर है, पर एक मां-बाप की निरीहिता को देखना मुश्किल था। जिसके पैर में गोली मारी गई है और उसका सही से इलाज नहीं हो रहा है। माँ मुश्किल से एक बार जेल मिलने जा पाईं हैं, पिता वो भी नहीं जा पाए हैं।

गर्मी का अंदाजा आप-हम सभी लगा सकते हैं और जेलों की हालत से भी परिचित हैं। ऐसे में योगी की पुलिस की फर्जी मुठभेडों में पैर में गोली मारे गए इन लड़कों के पैर में इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है।

आज जरूरत है कि समाज को इन लड़कों के पैरों का इलाज सही से हो सके इसलिए मदद के लिए आना चाहिए।

और जहां तक सवाल इनके अपराधी होने या न होने का है तो सवाल उन पर भी है जो अपराधी भी हैं औऱ सदन में भी हैं और जिनके पैर फिर भी सही सलामत हैं। उनको और उन पार्टियों को सहयोग करने में आप नहीं हिचकते तो समाज के इन लड़कों की मदद में क्यों हिचकेंगे ? और ये ही वो प्रक्रिया है जो इनको भी मुख्यधारा में लाएगी।

राजीव यादव, जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। वे रिहाई मंच के महासचिव हैं।

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