‘हिन्दु राज्य की बात को पागलपन भरा विचार’ घोषित किया था सरदार पटेल ने

हमारे नेता जवाहरलाल नेहरू हैं...यह बापू के सिपाहियों का फर्ज़ है कि वह उनके आदेशों को कबूल करें - सरदार पटेल...

हमारे नेता जवाहरलाल नेहरू हैं...यह बापू के सिपाहियों का फर्ज़ है कि वह उनके आदेशों को कबूल करें - सरदार पटेल

नेहरू, अम्बेडकर और बहुसंख्यकवाद की चुनौती

 

सुभाष गाताडे

 

भारत और अन्य स्थानों पर, जिसे धर्म कहा जाता है - कमसे कम जिसे संगठित धर्म कहा जाता है - उसके तमाशे ने, मुझे हमेशा आतंकित किया है और मैंने उसकी बार बार भर्त्सना की है और उससे मुक्ति की बात की है। लगभग हमेशा ही उसने वहम और प्रतिक्रिया, हठधर्मिता और कटटरता, अंधश्रद्धा, शोषण और निहित स्वार्थी हितों को बचाये रखने की हिमायत की है।  

- टूवर्डस फ्रीडम: द आटोबायोग्राफी आफ जवाहरलाल नेहरू / 1936/, पेज 240-241)

अगर हिन्दू राज हक़ीकत बनता है तो यह इस देश के लिए सबसे बड़ी तबाही का दिन होगा। हिन्दू जो भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतंत्रता, समता और बंधुता के लिए ख़तरा है। इस पहलू से देखें तो वह जनतंत्र के साथ असंगत है। हिन्दू राज को किसी भी सूरत में रोका जाना चाहिए।

- अम्बेडकर, ‘पाकिस्तान ऑर पार्टीशन आफ इंडिया’, पेज 358

प्रस्तावना

एक उदारवादी/लिबरल जनतंत्र से एक किस्म के बहुसंख्यकवादी जनतंत्र में भारत का रफता रफता रूपांतरण आज हक़ीकत बन चुका है।

दरअसल देश के बदलते हालात हर ऐसे व्यक्ति की चिन्ता का मसला बने हैं - जो आज भी बहुलता, जनतंत्र, समानता पर यकीन करता है और धर्म तथा राजनीति के बीच स्पष्ट सीमारेखा खींचने की बात करता है ; व्यक्ति के अधिकार की हिमायत में खड़ा है - जो बात कानून की किताबों में भी दर्ज है - जो एक खुले समाज में कानून के राज की बात जीवन के हर क्षेत्रा में करता है तथा जो सभी लोगों के मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, नागरिक आज़ादी और राजनीतिक आज़ादी के लिए प्रतिबद्ध है।

आज की तारीख में जिस तरीके से लोगों को असहमति रखने के चलते प्रताड़ित किया जा रहा है, अपने पसन्द का भोजन खाने, अपना जीवनसाथी चुनने या अपनी आस्था के हिसाब से उत्सव मनाने के रास्ते में जिस तरह बाधाएं खड़ी की जा रही हैं, वह अभूतपूर्व है। स्थितियां ऐसी बनती दिख रही हैं कि अगर आप किसी खास अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बधित हो या आप किसी ऐसी गतिविधि में मुब्तिला हो, जिसे बहुमत द्वारा ‘‘संदिग्ध’’ घोषित किया जाए, तो सार्वजनिक तौर पर आप हिंसक प्रताडना का भी शिकार हो सकते हैं, और कानून व्यवस्था के रखवाले कहे जानेवाले लोग मूकदर्शक बने रह सकते हैं।

बहुसंख्यकतंत्र में तब्दील हो रहा है जनतंत्र

तयशुदा बात है कि संविधान के बुनियादी ढांचे पर कोई सीधी चोट नहीं आयी है, उसका औपचारिक ढांचा बरकरार है, कानूनी निगाहों से देखें तो भारत आज भी जनतंत्र तथा गणतंत्र बना हुआ है, मगर हक़ीकत यही दिख रही है कि जनतंत्र बहुसंख्यकतंत्र में तब्दील हो रहा है और एक गणतंत्र की बुनियादी शर्त - कि उसके नागरिक सर्वोपरि हैं - को तेजी से कमजोर किया जा रहा है। इस बात को दोहराने की जरूरत नहीं कि भारतीय राजनीति के केन्द्र में हिन्दुत्व वर्चस्ववादी ताकतों के उभार के साथ इस प्रक्रिया में जबरदस्त तेजी आयी है।

कुछ वक्त़ पहले की बात है जबकि केन्द्रीय सरकार के एक कैबिनेट मंत्री अनंत हेगडे ने - जिन्होंने भारत के संविधान पर अमल करने की कसम खायी है  - एक जनसभा में खुल कर यह ऐलान किया कि देश का ‘‘संविधान बदलने’’ के लिए वह सत्ता में आए हैं।

रेखांकित करने वाली बात यह थी कि सत्ताधारी पार्टी के अन्य अग्रणी सदस्यों ने इस वक्तव्य पर मौन ओढ़ कर यह जता दिया था कि वह इस मामले में क्या सोचते हैं। मगर यह कोई अकेली घटना नहीं है, सत्ताधारी पार्टी के एक सांसद ने बाकायदा मुसलमानों को इस देश को छोड़ देने के लिए कहा।

वैसे फिलवक्त़ उस शख्स के बारे में जितना कम बोला जाए वही बेहतर होगा जिसने पदभार संभालते हुए संविधान को ‘‘सबसे पवित्र किताब’’ घोषित किया था और जो अपने आप को डा अम्बेडकर का शिष्य कहने में संकोच नहीं करता है।

इस कठिन मुक़ाम पर यह जानना सुकून देनेवाला लगता है कि भारत की राजनीतिक आज़ादी और सामाजिक मुक्ति के अग्रणी जन - जो व्यापक आन्दोलन ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित हुआ - इस आने वाले ख़तरे से वाकिफ थे और उन्होंने लोगों को आगाह किया था किस तरह का अंधकारमय भविष्य उनके सामने खड़ा है अगर वह सचेत नहीं रहे। जैसा कि वल्लभ भाई पटेल के चरित्रकार राजमोहन गांधी लिखते हैं:

महात्मा गांधी, नेहरू और पटेल की यह अहम त्रिमूर्ति थी जिसने यह तय किया था कि भारत हिन्दु राष्ट नहीं बनेगा बल्कि ऐसा मुल्क बनेगा जहां सभी के लिए समान अधिकार हासिल हों। गांधी के इन्तक़ाल के बाद और पटेल की मृत्यु तक, पटेल और नेहरू के बीच भले ही कई मसलों पर मतभेद उभरे हों, मगर चन्द बुनियादी बातों पर उनकी एकता बनी रही। कई अन्यों की सहायता से जिनमें अम्बेडकर, मौलाना आज़ाद, राजेन्द्र प्रसाद, राजाजी आदि शामिल थे, उन्होंने संविधान में धर्मनिरपेक्षता और समानता को स्थापित किया।

इन सभी के मौजूद सामूहिक चिन्तन की एक झलक उस ‘आब्जेक्टिव रिसोल्यूशन’ में मिलती है जिसे संविधान सभा के सामने 13 दिसम्बर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पेश किया था तथा 22 जनवरी 1947 को जिसे संविधान सभा ने सर्वमत से स्वीकारा था। इसमें भारत को एक स्वाधीन सम्प्रभु गणतंत्र बनाने का इरादा जाहिर किया गया था। इसके अलावा भारत के तमाम लोगों के लिए

सामाजिक, आर्थिक औैर राजनीतिक न्याय ; अवसरों और ओहदे की समानता और कानून के सामने बराबरी ; और बुनियादी आज़ादियों - अभिव्यक्ति की, आस्था की, पूजा की, व्यवसाय, संगठन की और कार्रवाई की - को सुनिश्चित करने की बात थी, जो कानून के दायरे के अन्तर्गत हों और सार्वजनिक नैतिकता के मापदण्डों के अनुकूल हों।

और इसके अलावा यह भी सुनिश्चित किया जाना था कि ‘अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और आदिवासी अंचलों के लिए और वंचित तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए उचित सुरक्षा प्रावधान बनाए जाएंगे।’

आब्जेक्टिव रिसोल्यूशन / जिसे उन दिनों ‘संविधान के लक्ष्य और उददेश्यों को लेकर प्रस्ताव’ कहा गया था/ की अहमियत को इस तथ्य से जाना जा सकता है कि स्वयं संविधान की मसविदा कमेटी के मुताबिक वह ‘संविधान के प्राक्कथन/प्रीएम्बल’ का आधार है। याद रहे मसविदा कमेटी के चेअरमैन डा भीमराव अम्बेडकर थे, जिन्हें महात्मा गांधी के सुझाव पर यह पद सौंपा गया था।

हम गांधी के अन्तिम संघर्ष को देख सकते हैं - जब आज़ादी के बाद शुरू हुए दंगों को रोकने के लिए उन्होंने आमरण अनशन किया था - या यह भी पढ़ सकते हैं कि किस तरह भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जनता को इस बात के लिए आगाह किया था कि अगर वह सचेत नहीं रही तथा उसने साम्प्रदायिक ताकतों पर अंकुश लगाने को लेकर सक्रिय नहीं रही तो भारत ‘‘हिन्दु पाकिस्तान’’ बन सकता है। इतना ही नहीं वह कांग्रेस के अन्दर भी बहुसंख्यकवाद की भावना के खिलाफ लड़ते रहे। साम्प्रदायिकता को ‘‘फासीवाद का भारतीय संस्करण’’ बताते हुए, पंडित नेहरू ने 1947 में कहा कि देश में फासीवाद की जो लहर जोर पकड़ रही है वह मुस्लिम लीग और उसके समर्थकों द्वारा गैरमुसलमानों के खिलाफ दिए गए जहर भरे बयानों का सीधा परिणाम है।

महात्मा गांधी के जन्मदिन पर नेहरू ने कहा (1951) कि अगर कोई व्यक्ति धर्म के नाम पर दूसरे पर हमला करता है तो वह अपनी आखरी सांस तक उस व्यक्ति के खिलाफ लड़ेंगे - सरकार के मुखिया के तौर पर और एक सच्चे भारतीय के तौर पर भी। उन्होंने धर्म पर आधारित संगठनों पर पाबन्दी की हिमायत की और साम्प्रदायिक लेखन और साम्प्रदायिकताा से ओतप्रोत भाषणों पर रोक लगाने के लिए संविधान को संशोधित करने के लिए प्रयास कर सरकार को ताकतवर बनाया।

हम अलग-अलग मौकों पर मुख्यमंत्रियों के साथ उनके पत्रव्यवहार को पलट सकते हैं या उनके निर्देशों को देख सकते हैं या संसद में उनके भाषणों को देख सकते हैं ताकि यह जाना जा सके कि ‘‘बहुमत के लिए विशेष सुरक्षा’’ की बातों का उन्होंने किस तरह माखौल उड़ाया।

अगर मुझे नियम बनाने की इजाजत दी जाए, तो यह बहुमत की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह हर मामले में अल्पमत को सन्तुष्ट करे। बहुमत, महज अपने बहुमत के चलते, ही इस स्थिति में होता है कि वह अपने हिसाब से चले, उसके लिए किसी सुरक्षा की जरूरत नहीं होती।

पटेल, भारत के ‘‘लौहपुरूष’’ ने पार्टी के जयपुर सत्र में ही ऐलान किया था कि धर्मनिरपेक्षता की किसी भी कीमत पर हिफाजत करने के लिए कांग्रेस प्रतिबद्ध है। ‘‘भारत एक वास्तविक धर्मनिरपेक्ष मुल्क है।’ उन्होंने 1949 में ‘हिन्दु राज्य की बात को पागलपन भरा विचार’ घोषित किया था।’

उस दिन दिल्ली में पंजाब की बीमारी लग गयी। ‘मैं इस बात को किसी भी सूरत में बरदाश्त नहीं करूंगा कि दिल्ली दूसरा लाहौर बने।’ नेहरू और माउण्टबैटन की मौजूदगी में पटेल ने कहा। पक्षपाती अफसरों को दंडित करने की उन्होंने सार्वजनिक तौर पर चेतावनी दी और उनके निर्देश पर दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए। पुरानी दिल्ली के रेलवे स्टेशन के पास चार हिन्दु दंगाई पुलिस की गोली का शिकार हुए।

मद्रास के अपने व्याख्यान में (1949), उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि मुल्क के सामने खड़ी अन्य चुनौतियों के अलावा वह ‘आरएसएस आन्दोलन’ से भी निपट रही है:

हम लोग जो सरकार में हैं वह आरएसएस आन्दोलन से भी निपट रहे हैं। वह चाहते हैं कि हिन्दू राज्य या हिन्दू संस्कृति को बलपूर्वक थोपा जाए। कोई भी सरकार इसे बरदाश्त नहीं कर सकती है। इस देश में लगभग उतने ही मुसलमान हैं जितने उस हिस्से में हैं जो अलग हो चुका है। हम उन्हें भगाने वाले नहीं हैं। बंटवारे के बावजूद, ऐसा काम करना शैतानी होगा। हमें यह समझना होगा कि वे यहां रहनेवाले हैं और यह हमारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है कि उन्हें महसूस हो कि यह मुल्क उनका भी है।

शायद इस बात को अंदाज़ लगाते हुए कि निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा उनके तथा नेहरू के बीच दरार पैदा करने की कोशिश की जाएगी, उन्होंने 2 अक्तूबर 1950 को, अपनी मौत के महज तीन माह पहले कहा:

हमारे नेता जवाहरलाल नेहरू हैं। बापू ने उन्हें अपने वारिस के तौर पर अपनी जिन्दगी में ही नियुक्त किया और इस बात का ऐलान भी किया। यह बापू के सिपाहियों का फर्ज़ है कि वह उनके आदेशों को कबूल करे। जो कोई दिल से इस आदेश को स्वीकारता नहीं है वह ईश्वर के सामने पापी घोषित होगा। मैं गैरवफादार सिपाही नहीं हूं। मेरे लिए यह बात गैरमहत्वपूर्ण है कि मेरा स्थान कहा है, मैं महज इतनाही जानता हूं कि मैं उस स्थान पर हूं जहां खड़ा रहने के लिए बापू ने मुझे कहा था।

 

(सुभाष गाताडे की पुस्तक “नेहरू, अम्बेडकर और बहुसंख्यकवाद की चुनौतीके अंश)

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