मोदी सरकार के मूर्खतापूर्ण फैसलों से सबका धंधा चौपट... स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया सब कुछ दिव्यांग इंडिया में तब्दील

4 साल के दौरान कारोबारी समझ ही नहीं पाए कि आगे सरकार कौन सा पागलपन करने वाली है। ...

मोदी सरकार के मूर्खतापूर्ण फैसलों से सबका धंधा चौपट... स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया सब कुछ दिव्यांग इंडिया में तब्दील

सत्येंद्र पीएस

बैंकों का खराब कर्ज या बैड लोन या गैर निष्पादित परिसम्पत्ति या एनपीए मार्च 2018 तक बढ़कर 10 लाख करोड़ रुपये हो गया है। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट का कहना है कि आने वाली तिमाहियों में यह और बढ़ेगा।

एनपीए कम करने और सरकारी बैंकों में पैसा पम्प करके बैंको को उबारने की सरकार व बैंकों की सभी कवायदें बेकार साबित हुई हैं।

अब सरकार को सलाह दी गई है कि एक संपत्ति प्रबंधन कम्पनी बनाई जाए, जो बैंकों का खराब कर्ज अपने हाथ में ले और दिवाला एवं धन शोधन अक्षमता संहिता के तहत कर्ज लेने वालों की सम्पत्ति जब्त कर पैसे की वसूली करे।

इस बर्बादी की प्राथमिक वजह तो यह लगती है कि बैंकों ने लोन से बहुत कम सम्पत्ति गिरवी रखकर कर्ज बांटा है।

लेकिन बड़ी वजह यह नहीं है। सामान्यतया उद्योगपतियों को हवा हवाई गिरवी पर बैंक कर्ज देते हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है। कर्ज लेकर कम्पनियां समय से ब्याज चुकाती हैं, लोगों को रोजगार देती हैं और खुद भी कमाती हैं। अंत मे वो बैंक का पूरा पैसा चुका देती हैं। या ऐसा भी होता है कि कारोबार बढ़ाने के लिए और ज्यादा कर्ज लेती रहती हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि उद्योगपति फंस जाता है और वह कर्ज और ब्याज नहीं चुका पाता है। ऐसी स्थिति में बैंक उसे और कर्ज कार्यशील पूंजी के रूप में दे देते हैं जिससे कि उनका धंधा चल जाए और बैंक का धंधा भी चलता रहे।

इस सरकार में गड़बड़ यह हुई है कि कारोबारियों ने कर्ज लिया। इस सरकार में भी और पहले लिया था वह भी। सरकार के मूर्खतापूर्ण फैसलों से सबका धंधा चौपट है। डूबते धंधे को बचाने के लिए कर्ज लिया तब तक सरकार का कोई अगला मूर्खतापूर्ण फैसला आ गया और टॉप अप लोन भी डूब गया।

सब कुछ दिव्यांग इंडिया में तब्दील

बैंकों को सरकार ने पैसा दिया। लेकिन ऐसी हालत में कोई कर्ज लेने को तैयार नहीं है। कम्पनियां कह रही हैं कि हमारी सम्पत्ति जब्त कर लीजिए, हमको जेल में डाल दीजिए, जो सजा बनती हो दे दीजिए लेकिन न तो हमारे पास बैंकों को वापस करने को पैसे हैं और न आगे और कर्ज लेकर फैक्ट्री चलाने की हिम्मत है।

केवल युवा ही बेरोजगार नहीं हो रहे हैं। स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया सब कुछ दिव्यांग इंडिया में तब्दील हो चुका है। जो उद्योग बचे हुए हैं वो आसमान की ओर ताक रहे हैं कि वो बचे रहें और कम से कम कर्मचारियों को सेलरी देने भर को मुनाफा होता रहे।

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