बच्चों की सृजनात्मकता का गला घोंट देते हैं स्कूल

अतिथि लेखक
Updated on : 2018-08-28 23:37:00

बच्चों की सृजनात्मकता का गला घोंट देते हैं स्कूल

मोहम्मद अफ़ज़ल

मेरी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय में हुई है। यह कोई सातवीं-आठवीं क्लास की बात है। बच्चों को सामाजिक विज्ञान और विज्ञान, इन दो विषयों के लिए कुछ 'मॉडल्स' बनाने का होमवर्क दिया जाता था ("था" क्या..अभी भी दिया जाता है, दो साल पहले तक पढ़ाने-लिखाने के काम से जुड़ा रहा हूँ, इसलिए मुझे जानकारी है)। खैर मुद्दे पे आते हैं। ये मॉडल्स एक तरह से किसी मंदिर, डैम (बांध), पवन चक्की, या ऐसे ही देश-विदेश की किसी दूसरी जानी-मानी जगहों या चीज़ो के प्रतिरूप होते थें। जब हमें भी ऐसे ही किसी चीज़ को बनाने को कहा गया, तो पहले तो खुशी हुई की चलो कुछ अच्छी सी चीज़ का मॉडल तैयार करेंगे। अब यहाँ सबसे पहली ही गड़बड़ ये होती है की आपको, अपने मन-मुताबिक कुछ नहीं करना होता है। "मैडम जी" हुक्म सुनाती हैं कि, "फलां-फलां...तुम फलां-फलां चीज़ बनाओगे।" मतलब मैं क्या बनाना चाहता हूँ, या मेरा मन क्या है...वो पहले ही रिजेक्ट। इसके बाद और खेल शुरू होता है। पांच-सात बच्चों का एक समूह तैयार करवाया जाता है, फिर से मैडम जी का हुक्म आता है कि आप सब ग्रुप में मॉडल बनाएंगे। "चलो, ये भी सही... इसी बहाने समूह में काम करना सीखेंगे", ये सोच के मन को तैयार किया। सबसे बड़ा झटका अब लगना था। मैडम जी का फ़रमान हुआ, "प्यारे बच्चों...आप सब बहुत छोटे हैं, अपने से मॉडल्स बनाएंगे तो परेशान भी होंगे और मॉडल्स भी किसी काम के नहीं बनेंगे। 'फलां' जगह पे, 'फलां' नाम के भैया रहते हैं। पिछले कई सालों से वो बच्चों के मॉडल्स बनाते आ रहे हैं। एक मॉडल पे यही कोई 500-600 रुपए का खर्च आएगा। एक ग्रुप में 6-7 बच्चे हैं, यानी सबके हिस्से 100 रुपए से भी कम का खर्च आएगा। इतना तो आप लोग चाय-समोसा खा कर खर्च कर देते हैं। तो आप सब उनके पास जाएं, और अच्छे से मॉडल्स "बनवा" के लाएं।" गौर कीजियेगा..."बना" के लाएं की जगह "बनवा" के लाएं। अब मेरा माथा ठनका, ग्रुप बनाए जाने के पीछे की गणित समझ में आई।

हम सबने ग्रुप में मिलकर यह तय किया कि मॉडल अपने से बनाएंगे, ना की पैसा खर्च करके। कहीं से ये बात मैडम जी तक पहुंच गई। फिर से हुक्म ज़ारी हुआ। "बच्चों, आप लोग समझते नहीं, ये आप लोग नहीं बना पाओगे। किसी काम का नहीं बनेगा और 'क्लस्टर' लेवल तक भी नहीं पहुंचेगा। अपने से बनाओगे तो मार्क्स भी वैसे ही पाओगे। कोई बहुत खर्च तो आ नहीं रहा है।" हमारी रचनात्मकता को मैडम जी खर्च की बात पर ले के चली गईं। अब अगर मैडम जी को इस बात का पूरा भरोसा था की उन मॉडल्स को बनाना हमारे बस की बात नहीं थी, तो ये काम हमें सौंपना ही नहीं था। अब अगर दे ही दिया था, तो हमारी रचनात्मकता का कुछ तो लिहाज़ करना था, मगर बात प्रतियोगिता की थी। हमसे कहा जाता था की दूसरे स्कूलों से बहुत अच्छे-अच्छे मॉडल्स आते हैं। क्लस्टर लेवल से आगे रीज़नल तक पहुंचना है, तो एक नंबर मॉडल होना चाहिए।

कुछ सप्ताह बाद हर ग्रुप, बारी-बारी अपने मॉडल्स सुबह-सुबह क्लास में लाता और मैडम जी से वाह-वाही लूटता। हम सब ने भी इसी प्रक्रिया से मॉडल बनवाया। दूसरे की बनाई हुई चीज़ के लिए अपनी तारीफ़ कोई कैसे सुने ? भले ही थोड़ा खराब बनता, मगर अपना बनाया मॉडल तो अपना ही होता ना। अब पैसा दे कर किसी और से कुछ बनवाया तो क्या ही तारीफ़ लूटी जाए। रीज़नल और क्लस्टर लेवल प्रतियोगिताओं के नाम से आज भी स्कूलों में ये तमाशे हो रहे हैं। निजी स्कूलों का तो खैर क्या ही कहा जाए। बुराई प्रतियोगिता में नहीं है। जब भी, जिस किसी ने भी ऐसी प्रतियोगिताओं की शुरुआत की होगी तो ये ही सोचा होगा की इसी बहाने बच्चों के अंदर की रचनात्मकता, सृजनात्मकता बाहर आएगी। शाबाशी पाने से उनको और बढ़ावा मिलेगा। साथ ही वे चीज़े जिनके मॉडल्स बच्चे तैयार करेंगे, उनके बारे में बच्चों की समझ और ज़्यादा विकसित होगी। मगर स्कूलों ने इन्हें अपनी नाक का सवाल बना लिया है। दूसरा ये की अगर वो मॉडल बच्चे अपने से नहीं बल्कि किसी दूसरे से पैसे देकर बनवाते हैं, तो ऐसे मॉडल्स का फ़ायदा ही क्या ?

घूम-घुमा के इसका बोझ माँ-बाप की जेबों पर ही जाना है, बच्चा इस पूरी प्रक्रिया में क्या खाक कुछ सीखेगा।

कुल मिलाकर कहने का मतलब ये है कि आज की शिक्षा प्रणाली का ये चेहरा बड़ा ही बेकार सा लगता है। आप बच्चे की सारी रचनात्मकता को पहले ही ख़त्म कर देने पर तुले हुए हैं। मैं या हम लोग आखिर क्यों नहीं उन "फलां" भैया जैसा मॉडल बना सकते हैं ? और पहली बात तो शुरुआती स्तर पर ही एक बच्चे और एक वयस्क के काम की तुलना करना ही अपने आप में गलत बात है। हो सकता है दूसरे स्कूल के किसी बच्चे नें दिन-रात लग के, अपनी मेहनत से उस मॉडल को तैयार किया हो। मगर एक वयस्क के काम के आगे उसे कम आंक दिया जाएगा। इससे उस बच्चे को भी कितनी ठेस पहुंचेगी ?

"मैं अगर किसी के घर खाने पर जाता हूँ और वो मुझे अपने हाथ से बनाया 'दाल-चावल' ही खिलाता है, तो उस खाने के लिए उसके हाथों की ही तारीफ़ की जाएगी। लेकिन वहीं अगर दावत का खाना होटल से मंगाया हुआ होगा, भले ही 'मुर्ग-मुसल्लम' ही हो....तो उस खाने के लिए मैं होटल के बावर्ची की तारीफ़ करूँगा..ना की अपने मेज़बान की।" स्कूलों के शिक्षकों को भी ये बात समझनी चाहिए। बच्चों को अपने से कुछ नया करने का मौका दें। भले ही मॉडल उतना अच्छा ना बनें, मगर बच्चा कुछ तो सीखेगा ही। और कुछ नहीं तो कम-से-कम उस काम की बुराई या तारीफ़ पर उसका हक होगा, ना की किसी 'फलां' भैया का।

(कानपुर, उत्तर प्रदेश के रहने वाले मोहम्मद अफ़ज़ल, ने हाल ही में दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान (iimc) से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त किया है।)

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